'दो से ज्यादा बच्चे करने पर कानूनी पाबंदी सही नहीं':सुप्रीम कोर्ट बोला- प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 हुई; बुजुर्ग बढ़ेंगे, कामकाजी आबादी घटेगी

Nov 04, 2026 - 12:02
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'दो से ज्यादा बच्चे करने पर कानूनी पाबंदी सही नहीं':सुप्रीम कोर्ट बोला- प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 हुई; बुजुर्ग बढ़ेंगे, कामकाजी आबादी घटेगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानून अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। देश में प्रजनन दर लगातार घट रही है। ऐसे में इन कानूनों के पीछे की वजह अब कमजोर पड़ गई है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने 2003 के उस फैसले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया, जिसमें हरियाणा के दो बच्चों वाले नियम को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता भी रद्द कर दी। उन्हें तीसरे बच्चे के जन्म के कारण पद से अयोग्य ठहराया गया था। 2003 में प्रजनन दर 3 थी, अब घटकर 1.9 हुई कोर्ट ने बताया कि 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। जबकि 2.1 की दर को रिप्लेसमेंट रेट माना जाता है। इसका मतलब है कि इस दर पर एक पीढ़ी अपनी जगह अगली पीढ़ी को ले सकती है। कोर्ट ने कहा कि भारत की प्रजनन दर रिप्लेसमेंट रेट से नीचे जा चुकी है। इससे आने वाले समय में बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी और कामकाजी लोगों का अनुपात घटेगा। अगर इन बदलावों पर ध्यान नहीं दिया गया तो देश को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। कोर्ट बोला- दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानून अप्रासंगिक जस्टिस नरसिम्हा ने फैसला सुनाते हुए कहा, "हमारी स्पष्ट राय है कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर सजा देने वाले कानून अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। इन कानूनों का आधार बढ़ती आबादी का डर था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या से जुड़े बदलावों के कारण यह आधार खत्म हो गया है।" कोर्ट ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए बनाए गए कानून अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। अगर देश ने जनसंख्या से जुड़े इन बदलावों पर ध्यान नहीं दिया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। दो बच्चों की शर्त से राजनीतिक अधिकारों से वंचित करना गलत कोर्ट ने दो बच्चों की शर्त को सही ठहराने के लिए 2003 के फैसले में दिए गए तर्कों पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कानूनों के जारी रहने से नागरिकों का एक पूरा वर्ग राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर हो जाता है। कोर्ट के मुताबिक, किसी व्यक्ति के बच्चे कितने हैं, इसका उसके सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से कोई खास संबंध नहीं है। ऐसे कानून लोगों को बच्चे पैदा करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने के बीच एक विकल्प चुनने के लिए मजबूर करते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन है। तीसरे बच्चे के जन्म पर महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच हुई थीं अयोग्य सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के काकोड़ा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता रद्द कर दी। उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के कारण अयोग्य ठहराया गया था। इस कानून में 13 सितंबर 2000 से दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की अयोग्यता का प्रावधान लागू हुआ था। मंगला के खिलाफ अतिरिक्त कलेक्टर के सामने शिकायत की गई थी। इसके बाद उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। उन्होंने अतिरिक्त आयुक्त के पास अपील की, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका लगाई। 5 अगस्त 2025 को हाईकोर्ट ने उनकी अयोग्यता बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा था कि तीसरे बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में माता-पिता दोनों के नाम दर्ज हैं और इसके उलट कोई सबूत नहीं है। मंगला ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 4 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अयोग्यता रद्द कर दी है। 7 राज्यों ने दो बच्चों की शर्त खत्म की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी रुक्मिणी बोबडे और याचिकाकर्ता के वकील प्रतीक बोरंबडे से उन राज्यों की सूची मांगी थी, जहां दो बच्चों से ज्यादा होने पर चुनाव लड़ने की पाबंदी है। रुक्मिणी बोबडे की ओर से पेश सूची के मुताबिक, 7 राज्यों ने दो बच्चों की शर्त खत्म कर दी है, जबकि 15 राज्यों में ऐसी कोई नीति नहीं है। असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड में यह नियम अब भी लागू है। 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों की शर्त को सही ठहराया था 2003 में जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के दो बच्चों वाले नियम को संवैधानिक रूप से सही ठहराया था। इस कानून के तहत दो से ज्यादा जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति स्थानीय निकाय चुनाव नहीं लड़ सकता था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है, ताकि इस पर दोबारा विचार किया जा सके।

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