कोर बैंकिंग सिस्टम की सेंध से 10.24 करोड़ का घोटाला:नोएडा में 3 साल तक अधिकारियों की ID से ट्रांजेक्शन, 5 पॉइंट में समझें केस
कोर बैंकिंग सिस्टम (CBS) में सेंध लगाकर पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की ग्रेटर नोएडा स्थित सेक्टर-पी शाखा में तीन साल तक ग्राहकों के खातों से रुपए निकाले गए। बैंक की ऑफिस असिस्टेंट दीपांशी पर आरोप है कि उसने अलग-अलग अधिकारियों की यूजर आईडी का इस्तेमाल कर ग्राहकों के खातों से बिना अनुमति रकम ट्रांसफर की। कहीं सीधे खातों में रुपए भेजे गए तो कहीं पहले दूसरे खातों में रकम पहुंचाई गई। फिर वहां से अपने खातों में ट्रांसफर किए। एफडी में संयुक्त खाताधारक जोड़कर उसे समय से पहले बंद कराने और मोबाइल ट्रांजेक्शन अलर्ट बंद करने का तरीका भी अपनाया गया। बैंक की शुरुआती जांच में अब तक 10.24 करोड़ रुपए के अनधिकृत ट्रांजेक्शन सामने आए हैं। रकम आशुतोष पाठक समेत 7 लोगों से जुड़े खातों तक पहुंची। सीबीआई ने बैंक की शिकायत पर 8 नामजद आरोपियों और अज्ञात लोक सेवकों के खिलाफ केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। खातों और लेनदेन का मिलान अभी जारी है बैंक के मुख्य प्रबंधक अजय कुमार पांडेय ने 23 अक्टूबर को सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा, गाजियाबाद में शिकायत दी थी। इसके आधार पर 28 अक्टूबर को नियमित मामला दर्ज किया गया। एफआईआर में बताया गया है कि धोखाधड़ी अलग-अलग घटनाओं में नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से करीब तीन साल तक की गई। खातों और लेनदेन का मिलान अभी जारी है। अब तक 58 लोगों में से 27 लोगों को केवाईसी करके करीब 13.60 करोड़ रुपए की रकम वापस की गई है। जबकि 31 लोगों की केवाईसी का प्रोसेस किया जा रहा है। एक खाते के तीन ट्रांजेक्शन ने खोली पोल सीबीआई एफआईआर के मुताबिक, 16 सितंबर 2026 को बैंक की ग्राहक संगीता अपने पति और बेटी के साथ पासबुक अपडेट कराने पहुंची। इस दौरान उन्हें खाते से तीन ऐसे ट्रांजेक्शन का पता चला, जो उनकी जानकारी या अनुमति के बिना किए गए थे। उन्होंने शाखा प्रमुख से शिकायत करनी चाही, लेकिन उनके उपलब्ध नहीं होने पर दीपांशी ने उनसे बात की और लेनदेन को लेकर सफाई दी। बाद में संगीता के पति की शिकायत शाखा प्रमुख तक पहुंची। पूछताछ में दीपांशी ने दावा किया कि संगीता ने संपत्ति में निवेश किया है और विवादित रकम आशुतोष पाठक के खाते में भेजी गई है। शाखा प्रमुख ने जब इन ट्रांजेक्शन के वाउचर तलाशे तो वे रिकॉर्ड में नहीं मिले। इसके बाद पूछताछ में दीपांशी ने कथित तौर पर अनधिकृत लेनदेन करने और उनके वाउचर नष्ट करने की बात स्वीकार की। बैंक की शिकायत के अनुसार, उसने बताया कि इन ट्रांजेक्शन के लिए न तो ग्राहकों के निर्देश थे और न ही अधिकारियों की मंजूरी। पूरा खेल कैसे ऑपरेट होता था, 5 पॉइंट में समझें 1. अधिकारियों की यूजर आईडी से ट्रांजेक्शन: बैंक की जांच में सामने आया कि दीपांशी ने शाखा के अलग-अलग अधिकारियों की सीबीएस यूजर आईडी का इस्तेमाल कर ग्राहकों के खातों से रकम डेबिट की। वह ऑफिस असिस्टेंट थी और इन लेनदेन को स्वतंत्र रूप से करने के लिए अधिकृत नहीं थी। यूजर आईडी का एक्सेस उसे कैसे मिला, इसकी जांच जारी है। 2. सात लोगों के खातों में पहुंचाई रकम: ग्राहकों के खातों से निकाली गई रकम सीधे आशुतोष पाठक के खाते में भेजी गई या पहले प्रदीप कुमार, मेमबंती देवी, प्रियंका कुमारी, शांति देवी, शालिनी और सरोज देवी के खातों में ट्रांसफर की गई। इसके बाद रकम आशुतोष पाठक के खाते तक पहुंचाई गई या अन्य माध्यमों से निकाली गई। 3. एफडी में भी किया गया हेरफेर: बैंक की शिकायत में बताया गया है कि कई एफडी में आशुतोष पाठक और अन्य लोगों को संयुक्त खाताधारक के रूप में जोड़ा गया। इसके बाद एफडी से रकम वापस पाने वाले खाते का विवरण बदला गया। एफडी को समय से पहले बंद कराकर उसकी रकम संदिग्ध लाभार्थी खातों में भेज दी गई। 4.मोबाइल अलर्ट बंद कर दिए: कुछ ग्राहकों के खातों से जुड़े मोबाइल ट्रांजेक्शन अलर्ट लेनदेन से पहले बंद या संशोधित किए गए। इससे खाते से रुपये निकलने का मैसेज ग्राहकों तक नहीं पहुंचा और धोखाधड़ी का तत्काल पता नहीं चल सका। 5.वाउचर गायब कर मिटाए सबूत: जिन ट्रांजेक्शन के लिए ग्राहक की अनुमति और अधिकारियों की मंजूरी नहीं थी, उनसे जुड़े वाउचर बैंक के रिकॉर्ड में नहीं मिले। बैंक का आरोप है कि दीपांशी ने कुछ वाउचर नष्ट भी कर दिए, ताकि लेनदेन का रिकॉर्ड सामने न आए। आशुतोष का खाता बना रकम पहुंचने का प्रमुख ठिकाना बैंक की शिकायत में आशुतोष पाठक के खाते को इस पूरे मामले में अहम बताया गया है। बैंक के मुताबिक, यह खाता दीपांशी ने ही खोला था। ग्राहकों के खातों से निकली रकम सीधे या अन्य आरोपियों के खातों के माध्यम से आशुतोष के खाते तक पहुंचती रही। जांच में सामने आए ट्रांजेक्शन के आधार पर बैंक ने इसे रकम के डायवर्जन और एक जगह जुटाने का पैटर्न बताया है। एफआईआर में दीपांशी के अलावा आशुतोष पाठक, प्रदीप कुमार, मेमबंती देवी, प्रियंका कुमारी, शांति देवी, शालिनी और सरोज देवी के नाम शामिल हैं। हालांकि, किस आरोपी के खाते में कितनी रकम पहुंची और किसकी क्या भूमिका थी, इसका पूरा हिसाब अभी जांच में जुटाया जा रहा है। बैंक ने यह भी कहा है कि दूसरे लाभार्थी खाते सामने आने की संभावना है। छह बैंक अधिकारियों की यूजर आईडी भी जांच के दायरे में एफआईआर में जिन छह बैंक अधिकारियों की यूजर आईडी के दुरुपयोग की बात कही गई है, उनमें वरिष्ठ शाखा प्रबंधक निशा तिर्की, वरिष्ठ ग्राहक सेवा सहयोगी संदीप प्रकाश शर्मा, ग्राहक सेवा सहयोगी मीनाक्षी और सतीश कुमार, आरएम शैलेंद्र कुमार और अधिकारी लवली जैन शामिल हैं। बैंक ने स्पष्ट किया है कि अभी यह पता लगाना बाकी है कि इनकी यूजर आईडी साझा की गई थीं, किसी तरह हासिल की गई थीं या उनका एक्सेस किसी दूसरे तरीके से लिया गया था। इन अधिकारियों की भूमिका और संभावित लापरवाही की भी जांच होनी है। तीन साल तक किसी को नहीं लगी भनक संगीता के अलावा किसी अन्य ग्राहक की औपचारिक शिकायत अब तक नहीं मिली थी। मोबाइल अलर्ट बंद होने और ट्रांजेक्शन के वाउचर गायब होने से भी गड़बड़ी पकड़ने में देरी हुई। संगीता के खाते से हुए तीन ट्रांजेक्शन पर सवाल उठने के बाद बैंक ने जांच शुरू की तो अलग-अलग ग्राहकों के खातों से 10.24 करोड़ रुपये के अनधिकृत डेबिट का पता चला। बैंक अभी खातेवार मिलान कर रहा है। इससे प्रभावित ग्राहकों की संख्या और रकम बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया गया है। सीबीआई ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 61(2), 316, 318 और 344 के तहत मामला दर्ज किया है। इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 के साथ धारा 43 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(2) के साथ 13(1)(a) लगाई गई है।
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