21 साल, हजारों करोड़ खर्च... फिर भी हर बारिश में क्यों डूब जाती है मुंबई

21 वर्षों में सरकारें बदलीं, हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन हर मानसून में मुंबई आज भी जलभराव, जाम और हादसों से जूझ रही है। आखिर क्यों नहीं बदल पा रही देश की आर्थिक राजधानी की तस्वीर, पढ़िए पूरी पड़ताल।

21 साल, हजारों करोड़ खर्च... फिर भी हर बारिश में क्यों डूब जाती है मुंबई

दि राइजिंग न्यूज़ | मुंबई | 3 जुलाई 2026


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई हर साल मानसून में जलभराव की गंभीर समस्या से जूझती है। वर्ष 2005 की विनाशकारी बाढ़ के बाद हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, कई परियोजनाएं शुरू हुईं और जल निकासी व्यवस्था को मजबूत बनाने के दावे किए गए। इसके बावजूद वर्ष 2026 में भी हिंदमाता, अंधेरी, सायन और कुर्ला जैसे इलाके हर बारिश में डूब जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर दो दशक बाद भी हालात क्यों नहीं बदले?


21 साल बाद भी नहीं बदली मुंबई की तस्वीर

मुंबई में मानसून का मौसम आते ही हर वर्ष एक जैसी स्थिति देखने को मिलती है। कुछ घंटों की तेज बारिश के बाद सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, वाहन फंस जाते हैं, रेल सेवाएं प्रभावित होती हैं और आम लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। वर्ष 2005 की भयावह बाढ़ के बाद यह उम्मीद जताई गई थी कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं बनेगी, लेकिन दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हालात लगभग वैसे ही बने हुए हैं।हर वर्ष करोड़ों रुपये जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने पर खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद शहर के कई प्रमुख इलाके पहली ही तेज बारिश में पानी से भर जाते हैं। इससे यह सवाल लगातार उठता है कि आखिर समस्या संसाधनों की कमी है, योजनाओं की कमजोरी है या फिर क्रियान्वयन में गंभीर लापरवाही है।


26 जुलाई 2005 की बाढ़ ने बदल दी थी मुंबई की पहचान

26 जुलाई 2005 को मुंबई ने अपने इतिहास की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक का सामना किया था। केवल 24 घंटे के भीतर रिकॉर्ड स्तर की वर्षा हुई, जिससे पूरा शहर जलमग्न हो गया। इस भीषण बाढ़ में पांच सौ से अधिक लोगों की जान चली गई और लाखों लोगों का जीवन कई दिनों तक प्रभावित रहा।यह आपदा केवल भारी वर्षा का परिणाम नहीं थी। समुद्र में ऊंचा ज्वार, मीठी नदी पर बढ़ता अतिक्रमण और कमजोर जल निकासी व्यवस्था ने स्थिति को और अधिक भयावह बना दिया। इसी घटना के बाद सरकार और महानगरपालिका ने बड़े स्तर पर सुधार का वादा किया था।


हजारों करोड़ खर्च हुए, लेकिन राहत आज भी अधूरी

विनाशकारी बाढ़ के बाद मुंबई में जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर परियोजनाएं शुरू की गईं। नालों का विस्तार किया गया, नए पंपिंग केंद्र बनाए गए और जलभराव वाले इलाकों की पहचान कर विशेष योजनाएं तैयार की गईं। दावा किया गया कि भविष्य में शहर को जलभराव से काफी हद तक राहत मिलेगी।हालांकि वर्ष 2026 तक आते-आते भी स्थिति पूरी तरह नहीं बदल सकी। हर मानसून में प्रमुख सड़कें और सबवे पानी से भर जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि योजनाओं पर खर्च तो हुआ, लेकिन उनका प्रभाव अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सका।


अंधेरी, हिंदमाता, सायन और कुर्ला क्यों बन जाते हैं सबसे बड़े संकट क्षेत्र

मुंबई के कई इलाके समुद्र तल के बेहद करीब स्थित हैं। अंधेरी और मिलन सबवे जैसे मार्ग सड़क स्तर से नीचे बनाए गए हैं, जिसके कारण वर्षा का पानी तेजी से इन स्थानों पर जमा हो जाता है। जब वर्षा की तीव्रता अधिक होती है तो बड़े पंप भी पानी निकालने में असफल हो जाते हैं।हिंदमाता, सायन और कुर्ला जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में पुरानी जल निकासी व्यवस्था आज की आबादी और बढ़ते निर्माण कार्यों के अनुरूप पर्याप्त नहीं मानी जाती। यही कारण है कि कुछ ही घंटों की बारिश पूरे यातायात तंत्र को प्रभावित कर देती है।


मुंबई की भौगोलिक स्थिति भी बड़ी चुनौती

मुंबई सात द्वीपों को जोड़कर विकसित किया गया शहर है। इसके अनेक हिस्से समुद्र के बिल्कुल समीप या उससे नीचे स्थित हैं। जब तेज वर्षा और समुद्र में ऊंचा ज्वार एक साथ आता है, तब नालियों के माध्यम से समुद्र का पानी वापस शहर की ओर आने लगता है। यह प्राकृतिक चुनौती अवश्य है, लेकिन शहरी विकास की योजनाओं में इन परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप हर वर्ष मानसून के दौरान शहर को गंभीर जलभराव का सामना करना पड़ता है।


मैंग्रोव और मीठी नदी का लगातार घटता दायरा

मुंबई के मैंग्रोव वन वर्षों तक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करते रहे। ये वर्षा के अतिरिक्त पानी को अपने भीतर समाहित कर धीरे-धीरे छोड़ते थे, जिससे बाढ़ का खतरा कम रहता था। लेकिन लगातार बढ़ते निर्माण कार्यों के कारण इनका बड़ा हिस्सा समाप्त हो चुका है।इसी तरह मीठी नदी पर बढ़ते अतिक्रमण और अवैध निर्माण के कारण उसका प्राकृतिक बहाव भी काफी सीमित हो गया है। इससे नदी की अतिरिक्त पानी को संभालने की क्षमता कम होती चली गई और जलभराव की समस्या लगातार बढ़ती गई।


हर वर्ष होती हैं मौतें, लेकिन समाधान नहीं

मुंबई में मानसून केवल जलभराव तक सीमित नहीं रहता। दीवार गिरने, बिजली का करंट फैलने, सड़क दुर्घटनाओं और डूबने जैसी घटनाओं में हर वर्ष कई लोगों की जान चली जाती है। अनेक परिवारों को अपूरणीय क्षति उठानी पड़ती है। यदि जल निकासी व्यवस्था समय के अनुरूप विकसित होती और जोखिम वाले क्षेत्रों में प्रभावी प्रबंधन किया जाता, तो इन हादसों की संख्या काफी कम की जा सकती थी। इसके बावजूद हर वर्ष लगभग वही स्थिति दोहराई जाती है।


चेतावनी व्यवस्था मजबूत, लेकिन तैयारी अब भी कमजोर

वर्तमान समय में मौसम विभाग और महानगरपालिका के पास आधुनिक चेतावनी प्रणाली उपलब्ध है। लोगों को समय-समय पर भारी वर्षा और संभावित जलभराव की सूचना भी दी जाती है। इससे लोगों को सतर्क रहने में मदद मिलती है।इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि केवल चेतावनी पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता ऐसी स्थायी व्यवस्था की है, जिससे बारिश का पानी तेजी से निकाला जा सके और शहर का सामान्य जीवन बाधित न हो। फिलहाल अधिकांश व्यवस्थाएं आपदा आने के बाद सक्रिय होती हैं।


दुनिया के कई शहरों ने निकाला समाधान, मुंबई अब भी संघर्ष में

दुनिया के कई समुद्री शहरों ने भूमिगत जल भंडारण, विशाल जल निकासी सुरंगों और आधुनिक जल प्रबंधन प्रणाली का विकास किया है। इन उपायों से भारी वर्षा के दौरान भी सामान्य जनजीवन पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है।इसके विपरीत मुंबई आज भी कई स्थानों पर दशकों पुरानी नालियों और सीमित पंपिंग व्यवस्था पर निर्भर है। यही वजह है कि थोड़ी देर की तेज बारिश भी पूरे महानगर की रफ्तार रोक देती है।


सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित

पिछले 21 वर्षों में मुंबई में छह मुख्यमंत्री बदले, नौ महापौर बदले, हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए और अनेक योजनाएं बनाई गईं। इसके बावजूद यदि हर वर्ष वही इलाके जलमग्न हो रहे हैं, तो यह केवल प्राकृतिक आपदा का विषय नहीं बल्कि व्यवस्था की गंभीर चुनौती भी माना जा सकता है।जब तक जल निकासी व्यवस्था का स्थायी समाधान, अतिक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण और वैज्ञानिक शहरी योजना लागू नहीं होती, तब तक मुंबई का मानसून हर वर्ष लोगों के लिए परेशानी और खतरे का कारण बना रहेगा।