मूवी रिव्यू – ‘झाड़ फूंक’:एक खंडहरनुमा तहखाना, गायब प्रेमी और रहस्य, आखिर किस सच से सामना करेगी आस्था?

Oct 30, 2026 - 11:36
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मूवी रिव्यू – ‘झाड़ फूंक’:एक खंडहरनुमा तहखाना, गायब प्रेमी और रहस्य, आखिर किस सच से सामना करेगी आस्था?
फिल्म- झाड़ फूंक कलाकार: यशपाल शर्मा, पद्मिनी कोल्हापुरे, सुम्बुल तौकीर खान, हर्ष राजपूत, अप्रतिम सिंह निर्देशक: राजन रामगोपाल वर्मा निर्माता: शैलेश परिहार शैली: हॉरर ड्यूरेशन: 1 घंटा 53 मिनट रिलीज: 30 अक्टूबर 2026, हॉटस्टार रेटिंग: 3/5 कभी कभी डर किसी अंधेरे कमरे में नहीं, बल्कि उन सवालों में छिपा होता है, जिनके जवाब हमारे पास नहीं होते। जब जिंदगी, रिश्ते और अनजाना खौफ एक ही मोड़ पर आकर खड़े हो जाएं, तो सच तक पहुंचना आसान नहीं होता। फिल्म ‘झाड़ फूंक’ की कहानी भी ऐसे ही रहस्यों के बीच आगे बढ़ती है, जहां हर नया सवाल अपने साथ एक अनजाना डर लेकर आता है। फिल्म की कहानी आस्था (सुम्बुल तौकीर खान) प्रेग्नेंट है और राजवीर (हर्ष राजपूत) के साथ उत्तराखंड से दिल्ली की ओर सफर कर रही है। आस्था चाहती है कि राजवीर उससे शादी कर ले, लेकिन रास्ते में हुए एक हादसे के बाद राजवीर अचानक गायब हो जाता है। इसके बाद आस्था ऐसी परिस्थितियों में पहुंच जाती है, जहां उसकी मुलाकात मोहन ठाकुर (यशपाल शर्मा) और कामिनी ठाकुर (पद्मिनी कोल्हापुरे) से होती है। एक खंडहरनुमा तहखाना, वहां का रहस्यमयी माहौल और मंजरी से जुड़ी घटनाएं उसके डर को बढ़ाने लगती हैं। धीरे धीरे इस जगह से जुड़े राज सामने आते हैं और आस्था ऐसे अनुभवों से गुजरती है, जो उसके लिए सब कुछ बदल देते हैं। इन घटनाओं के पीछे क्या है, यही फिल्म के सस्पेंस का अहम हिस्सा है। फिल्म का डायरेक्शन, स्टोरी और स्क्रीनप्ले निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा की फिल्म का कॉन्सेप्ट दिलचस्प है। एक गर्भवती महिला, अचानक गायब हुआ प्रेमी और रहस्यमयी तहखाने का माहौल कहानी को रोमांचक बना सकता था। फिल्म के प्रीक्लाइमैक्स में सस्पेंस पैदा होता है और कुछ देर के लिए कहानी दर्शकों को बांधने में सफल रहती है। हालांकि, फिल्म की रफ्तार कई जगह धीमी पड़ जाती है। कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं, जबकि कई घटनाओं के बीच जुड़ाव साफ नजर नहीं आता। कहानी जिस सवाल के साथ शुरू होती है, वह बीच में अपनी अहमियत खोने लगता है। इससे मुख्य कहानी का प्रभाव कम होता है और दर्शकों की उत्सुकता भी कमजोर पड़ सकती है। हॉरर के साथ आस्था और अंधविश्वास का पहलू जोड़ा गया है, लेकिन डर पैदा करने वाले दृश्य हर बार असर नहीं छोड़ते। कई जगह माहौल बनाने की कोशिश दिखती है, मगर वह प्रभावशाली डर में नहीं बदल पाती। स्क्रीनप्ले ज्यादा कसा हुआ होता और गैरजरूरी दृश्यों को छोटा किया जाता, तो फिल्म का असर बेहतर हो सकता था। कहानी में मौजूद संभावनाओं को पूरी तरह पर्दे पर उतारने के लिए निर्देशन और तकनीकी प्रस्तुति में और कसावट की जरूरत महसूस होती है। फिल्म में एक्टिंग यशपाल शर्मा अपने अनुभव के साथ किरदार में गंभीरता लाते हैं। पद्मिनी कोल्हापुरे भी रहस्यमयी माहौल के अनुरूप अभिनय करती हैं। सुम्बुल तौकीर खान आस्था के डर और परेशानी को पर्दे पर उतारने की कोशिश करती हैं, जबकि हर्ष राजपूत की भूमिका कहानी की शुरुआती कड़ी में अहम है। हालांकि, कमजोर लेखन के कारण कलाकारों को अपने किरदारों के जरिए पूरी छाप छोड़ने का मौका नहीं मिल पाता। फिल्म में म्यूजिक फिल्म में सिर्फ एक गाना बेतहाशा है, जो सुनने में अच्छा लगता है और कहानी के माहौल के साथ मेल खाता है। बैकग्राउंड म्यूजिक थोड़ा और इम्पैक्टफुल हो सकता था फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘झाड़ फूंक’ के पास एक दिलचस्प कॉन्सेप्ट और रहस्य रचने की गुंजाइश है। प्रीक्लाइमैक्स में कहानी रोमांच पैदा करती है, लेकिन धीमी रफ्तार, लंबे दृश्य और कमजोर स्क्रीनप्ले इसके असर को सीमित कर देते हैं। फिल्म कुछ सवाल खड़े करती है, मगर उनके जरिए लगातार रोमांच बनाए रखने में पूरी तरह सफल नहीं होती। हॉरर पसंद करने वाले दर्शक इसे एक बार देख सकते हैं।

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