राम कथा में वनगमन प्रसंग सुन श्रोता हुए भावुक:शांतनु महाराज ने कहा- राम के चरित्र का वर्णन बिना उनकी कृपा संभव नहीं

Oct 25, 2026 - 19:22
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राम कथा में वनगमन प्रसंग सुन श्रोता हुए भावुक:शांतनु महाराज ने कहा- राम के चरित्र का वर्णन बिना उनकी कृपा संभव नहीं
जौनपुर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के पांचवें दिन रविवार को दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक भगवान श्रीराम के वनगमन का प्रसंग सुनाया गया। कथावाचक आचार्य शांतनु महाराज ने श्रीराम के त्याग, माता सीता के समर्पण और लक्ष्मण जी की भ्रातृभक्ति का वर्णन किया। कथा सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। कई लोगों की आंखें नम हो गईं। विवाह के बाद अयोध्या में छाया था उत्सव का माहौल आचार्य शांतनु महाराज ने श्रीराम और माता सीता के विवाह के बाद अयोध्या आगमन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि मिथिला में विवाहोत्सव के बाद जब भगवान श्रीराम, माता सीता और उनके भाई अयोध्या पहुंचे, तो पूरी नगरी में उत्सव का माहौल था। राजमहल से लेकर नगर की गलियों तक खुशियां मनाई जा रही थीं। महाराज दशरथ सहित पूरा राजपरिवार नववधुओं के आगमन से आनंदित था। कैकेयी ने मांगे दो वरदान, उत्सव शोक में बदला कथावाचक ने बताया कि समय बीतने के साथ महाराज दशरथ ने भगवान श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय लिया। राज्याभिषेक की तैयारियों से पूरी नगरी उत्साहित थी। इसी बीच दासी मंथरा की बातों में आकर महारानी कैकेयी ने महाराज दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए। उन्होंने भरत के लिए राजसिंहासन और श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगा। इससे अयोध्या का उत्सव अचानक शोक में बदल गया। पिता के वचन की रक्षा के लिए श्रीराम ने स्वीकार किया वनवास आचार्य ने कहा कि महाराज दशरथ श्रीराम से अत्यंत प्रेम करते थे। उनके लिए पुत्र को वनवास भेजने की कल्पना भी असहनीय थी, लेकिन दिए गए वचन की मर्यादा ने उन्हें विवश कर दिया। दूसरी ओर, भगवान श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए बिना विरोध वनवास स्वीकार कर लिया। उनके लिए राजसिंहासन से बढ़कर धर्म, सत्य और मर्यादा थी। सीता का समर्पण और लक्ष्मण की भ्रातृभक्ति बताई माता सीता ने भी पति के साथ वन जाने का संकल्प लिया। वहीं, लक्ष्मण जी ने बड़े भाई की सेवा और सुरक्षा के लिए राजमहल के सुखों का त्याग कर दिया। कथावाचक ने बताया कि जिस अयोध्या में कुछ समय पहले राज्याभिषेक की खुशियां थीं, वहां श्रीराम के वनवास की खबर से शोक छा गया। प्रजा अपने प्रिय राजकुमार को रोकना चाहती थी, लेकिन श्रीराम कर्तव्य और पिता के वचन के पालन के लिए दृढ़ रहे। महाराज दशरथ के पुत्र-वियोग और श्रीराम के त्याग का प्रसंग सुनकर कथा पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि श्रीराम का जीवन कर्तव्यपालन, त्याग, आज्ञाकारिता और मर्यादा का संदेश देता है। माता सीता का समर्पण और लक्ष्मण जी की भ्रातृभक्ति भी सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। कथा में शामिल हुए गणमान्य लोग भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के नेतृत्व में आयोजित कथा में दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं और कई गणमान्य लोगों ने सहभागिता की।

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