स्पोर्ट्स कॉलेज के शिक्षक सरकारी कर्मचारी नहीं:हाईकोर्ट ने अधिकरण का अधिकार क्षेत्र तय किया; वेतन और रिकवरी विवाद में उचित फोरम जाने की छूट
हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स कॉलेजेज सोसाइटी के कॉलेजों के शिक्षक राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं हैं। वे वेतन, पेंशन या सेवा से जुड़े विवादों में राज्य लोक सेवा अधिकरण में याचिका दाखिल नहीं कर सकते। कोर्ट ने अधिकरण की कार्यवाही रद्द कर दी।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने गुरु गोविंद सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज, लखनऊ के प्रधानाचार्य की याचिका पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने राज्य लोक सेवा अधिकरण का 4 सितंबर 2025 का आदेश रद्द कर दिया और शिक्षक हरवीर सिंह की याचिका पर चल रही कार्यवाही समाप्त कर दी।
हरवीर सिंह को 1994 में सहायक शिक्षक (फुटबॉल) के पद पर नियुक्त किया गया था। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पुनर्गठन के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश में रहने का विकल्प चुना। अगस्त 2001 में उन्होंने लखनऊ के स्पोर्ट्स कॉलेज में काम शुरू किया। वे 30 अप्रैल 2023 को सेवानिवृत्त हुए।
वेतन में गड़बड़ी मिलने के बाद उनका वेतन दोबारा तय किया गया और ज्यादा भुगतान की रकम वसूलने के आदेश दिए गए। इस कार्रवाई के खिलाफ हरवीर सिंह ने राज्य लोक सेवा अधिकरण में याचिका दाखिल की। कॉलेज के प्रधानाचार्य ने अधिकरण की कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स कॉलेजेज सोसाइटी, सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है। कॉलेजों का संचालन सोसाइटी का प्रबंध मंडल करता है और शिक्षकों की नियुक्ति तय प्रक्रिया के तहत होती है।
खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार से वेतन और अन्य खर्चों के लिए अनुदान मिलने से सोसाइटी के शिक्षक सरकारी कर्मचारी नहीं बन जाते। सोसाइटी स्थानीय प्राधिकरण नहीं है और संबंधित कानून के तहत राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाला निगम भी नहीं है। इसलिए उसके शिक्षकों के सेवा विवाद राज्य लोक सेवा अधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वेतन दोबारा तय करने और ज्यादा भुगतान की रकम वसूलने के आदेश से असंतुष्ट शिक्षक उन्हें उचित फोरम में चुनौती दे सकते हैं।
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