हाईकोर्ट ने कहा- कस्तूरबा विद्यालय शिक्षकों को 17 हजार मिले:चार माह में पद और सेवा शर्तें तय करने के निर्देश, नियमितीकरण पर भी विचार होगा
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (केजीबीवी) में संविदा पर काम कर रहे शिक्षकों को हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राहत दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को सभी केजीबीवी शिक्षकों को हर महीने 17 हजार रुपये मानदेय देने का निर्देश दिया है। चार माह में शिक्षकों के पद स्वीकृत या सृजित करने और उनकी सेवा शर्तें तय करने के लिए भी कदम उठाने होंगे।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने अर्चना बुद्ध और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सक्षम अग्रवाल ने पैरवी की।
कोर्ट ने शिक्षकों को लंबे समय तक संविदा पर रखने, उनके पद सृजित नहीं करने और नियमित शिक्षकों के समान वेतन नहीं देने पर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में काम कराना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत निषिद्ध जबरन श्रम के समान है। शिक्षकों को दिया जा रहा मानदेय अर्द्धकुशल श्रमिकों के तय पारिश्रमिक से भी कम है। कोर्ट ने इसे मानदेय कहना क्रूर मजाक बताया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं जैसी स्थिति वाले अन्य शिक्षकों के नियमितीकरण के दावों पर भी विचार किया जाए। यह विचार उनकी शैक्षिक योग्यता और सेवा अवधि के आधार पर कानून के अनुसार होगा। शिक्षकों की सेवा शर्तें इंटरमीडिएट स्तर तक के नियमित शिक्षकों के समान करने को कहा गया है।
अदालत ने साफ किया कि आदेश का लाभ सिर्फ मुकदमा दाखिल करने वाले शिक्षकों को नहीं, बल्कि प्रदेश के सभी केजीबीवी शिक्षकों को मिलेगा। मानदेय या वेतन में समय-समय पर बदलाव कर उसे सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों के वेतन और अन्य सुविधाओं के अनुरूप करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार को सहमति के अनुसार योजना के खर्च में अपना हिस्सा देना होगा। हालांकि, केंद्र से पैसा मंजूर नहीं होने के आधार पर राज्य सरकार आदेश का पालन करने से पीछे नहीं हट सकती।
कोर्ट के मुताबिक, केजीबीवी योजना का मकसद वंचित वर्गों, खासकर बालिकाओं को अच्छी शिक्षा देना है। इस लक्ष्य के लिए शिक्षकों से वर्षों तक असुरक्षित सेवा शर्तों और कम मानदेय पर काम कराना उचित नहीं है।
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