महंगी दवाओं पर सख्त हुआ सर्वोच्च न्यायालय!

जीवन रक्षक दवाओं तक आम लोगों की पहुंच सुनिश्चित करने के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और औषधि महानियंत्रक को नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने जीवन के अधिकार से जुड़े मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए देशव्यापी दिशा-निर्देश जारी करने के भी संकेत दिए हैं।

महंगी दवाओं पर सख्त हुआ सर्वोच्च न्यायालय!

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 17 जुलाई 2026

देश में गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए राहत की उम्मीद जगाने वाले एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता और उनकी बढ़ती कीमतों के मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। न्यायालय ने केंद्र सरकार और औषधि महानियंत्रक को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक को केवल आर्थिक तंगी या न्यायिक प्रक्रिया में देरी के कारण जीवन रक्षक उपचार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यह मामला केवल दवाओं की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक के जीवन और सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार से जुड़ा हुआ है।न्यायालय ने अपने प्रारंभिक विचार में कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल जिम्मेदारी है। यदि कोई व्यक्ति जीवन बचाने वाली दवाओं का खर्च वहन नहीं कर सकता और इसी कारण उसका उपचार प्रभावित होता है, तो यह संविधान के मूल अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है। अदालत ने कहा कि वह इस विषय पर व्यापक स्तर पर विचार कर देशभर के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश तैयार करेगी, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी न हो।


केरल की कैंसर पीड़ित महिला की याचिका से शुरू हुआ पूरा मामला

यह पूरा मामला केरल के एर्नाकुलम की रहने वाली एक स्तन कैंसर पीड़ित महिला की याचिका से जुड़ा हुआ है। महिला ने वर्ष दो हजार बाईस में केरल उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर बताया था कि उनके उपचार के लिए आवश्यक जीवन रक्षक दवाओं की कीमत इतनी अधिक है कि हर महीने लगभग डेढ़ लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा था कि उनकी तरह देश में हजारों मरीज ऐसे हैं जो गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, लेकिन आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि लगातार इतने महंगे उपचार का खर्च उठा सकें।महिला ने अपनी याचिका में यह भी मांग की थी कि सरकार जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और जरूरतमंद मरीजों तक उन्हें उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी नीति बनाए। उन्होंने कहा था कि किसी भी व्यक्ति का जीवन केवल इस वजह से खतरे में नहीं पड़ना चाहिए कि वह महंगी दवाएं खरीदने में सक्षम नहीं है। दुर्भाग्यवश, वर्ष दो हजार बाईस के अंत में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।


महिला की मृत्यु के बाद भी न्यायालय ने नहीं रोकी सुनवाई

याचिकाकर्ता की मृत्यु के बावजूद केरल उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुनवाई जारी रखने का निर्णय लिया। अदालत ने माना कि यह केवल एक महिला का व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि देशभर के उन लाखों मरीजों से जुड़ा मुद्दा है जो गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए महंगी दवाओं पर निर्भर हैं। इसी कारण न्यायालय ने इसे जनहित से जुड़ा विषय मानते हुए स्वतः संज्ञान के रूप में सुनवाई जारी रखी।जनवरी दो हजार तेईस से यह मामला कई दर्जन बार सुनवाई की सूची में शामिल हुआ, लेकिन लंबे समय तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका। लगातार हो रही देरी के कारण उपचार और जीवन के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न अधर में लटके रहे। इसी परिस्थिति को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं इस पूरे मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला किया।


सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक देरी पर जताई गंभीर चिंता

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की याचिका का निर्णय उसके जीवित रहते नहीं हो पाता, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति है। न्यायालय ने कहा कि जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में प्रत्येक दिन महत्वपूर्ण होता है और ऐसे मामलों में अनावश्यक देरी किसी व्यक्ति के जीवन पर सीधा प्रभाव डाल सकती है।पीठ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद इक्कीस प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। इसलिए स्वास्थ्य, उपचार और जीवन रक्षक दवाओं से जुड़े मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अदालत ने संकेत दिए कि वह भविष्य में ऐसे मामलों के लिए अलग प्रक्रिया और समय सीमा निर्धारित करने पर भी विचार कर सकती है।


केरल उच्च न्यायालय को शीघ्र निर्णय देने का अनुरोध

सर्वोच्च न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि उसके समक्ष लंबित इस मामले की शीघ्र सुनवाई कर अंतिम निर्णय दिया जाए। अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय का फैसला भविष्य में इसी प्रकार के मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है और इससे देशभर के मरीजों को राहत मिलने का रास्ता खुलेगा।साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह स्वयं भी इस मामले की सुनवाई जारी रखेगा ताकि जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता, उनकी कीमतों, सरकारी नीतियों और मरीजों के अधिकारों से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर देशव्यापी व्यवस्था तैयार की जा सके। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मरीज को आर्थिक कमजोरी के कारण उपचार से वंचित न रहना पड़े।


देशभर के लिए बन सकते हैं नए दिशा-निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने संकेत दिए हैं कि वह जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए पूरे देश में लागू होने वाले दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो गंभीर बीमारियों से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई को प्राथमिकता मिलेगी और मरीजों को समय पर न्याय के साथ-साथ उपचार भी मिल सकेगा।यदि न्यायालय इस मामले में व्यापक आदेश जारी करता है तो जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों, उनकी उपलब्धता, सरकारी जिम्मेदारी और मरीजों के अधिकारों को लेकर देशभर में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यह फैसला भविष्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और आम नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक बड़ी पहल साबित हो सकता है।