उस्ताद अहमद और मोहम्मद हुसैन ने गजलें पेश कीं:लखनऊ में ‘याद-ए-बेगम अख्तर’ कार्यक्रम; विद्यार्थियों को रियाज और धैर्य का महत्व बताया
दूर है मंजिल, राहें मुश्किल’ और यू ही बेसबब न फिरा करो’ जैसी गजलों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने गुरुवार को भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय के कलामंडपम् सभागार में समां बांध दिया। उस्ताद अहमद हुसैन और उस्ताद मोहम्मद हुसैन की गायकी ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। मौका था पद्मभूषण बेगम अख्तर की पुण्यतिथि पर आयोजित ‘याद-ए-बेगम अख्तर’ कार्यक्रम का। गजलों के जरिए संगीत प्रेमियों ने बेगम अख्तर की गायकी और उनकी समृद्ध संगीत विरासत को याद किया। विश्वविद्यालय की बेगम अख्तर पीठ की ओर से आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. मांडवी सिंह और दोनों कलाकारों ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके बाद बेगम अख्तर के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। गणेश स्तुति से गजलों तक सजा सुरों का सफर संगीत संध्या की शुरुआत ‘गाइए गणपति जगवंदन’ से हुई। इसके बाद शकील बदायूंनी की रचना ‘दूर है मंजिल, राहें मुश्किल, आलम है तन्हाई का’ सुनाई गई। ‘चल मेरे साथ ही चल, ऐ मेरे जाने गजल’, ‘यूँ ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर में रहा करो’ और ‘मौसम आएंगे-जाएंगे, हम तुमको भूल न पाएंगे’ जैसी गजलों ने महफिल को यादगार बना दिया। ‘आया तेरे दर पर दीवाना’ और ‘क्या तुझ पर नज्म लिखूं और कैसा गीत लिखूं’ की प्रस्तुति को भी श्रोताओं ने सराहा। विद्यार्थियों को बताए संगीत साधना के गुर प्रस्तुति से पहले दोनों उस्तादों ने विद्यार्थियों को संगीत साधना में रियाज, अनुशासन और धैर्य का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि संगीत की सेवा के लिए समर्पण जरूरी है। गुरु के सान्निध्य में सीखना और गुरु-शिष्य परंपरा के मूल्यों को अपनाना कला में निखार लाता है। कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने कहा कि बेगम अख्तर भारतीय संगीत जगत की महान विभूति थीं। उनका भातखण्डे से गहरा जुड़ाव रहा। गजल, ठुमरी और दादरा को विशिष्ट पहचान दिलाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। कुलसचिव अतुल कुमार ने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को महान संगीत विभूतियों के योगदान से परिचित कराने के साथ भारतीय संगीत परंपरा के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाते हैं। समापन पर कुलपति ने दोनों कलाकारों को सम्मानित किया।
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