"अगर कानून सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा तो संसद को बंद कर देना चाहिए" — निशिकांत दुबे

दि राइजिंग न्यूज।  बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने हाल ही में एक बयान देकर सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा, "अगर कानून बनाना सुप्रीम कोर्ट का ही काम रह गया है, तो संसद भवन को बंद कर देना चाहिए।" यह टिप्पणी उन्होंने सोशल मीडिया पर की, और यह सीधे तौर पर संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच शक्तियों के संतुलन को लेकर जारी बहस से जुड़ी है।

"अगर कानून सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा तो संसद को बंद कर देना चाहिए" — निशिकांत दुबे

दि राइजिंग न्यूज। 

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने हाल ही में एक बयान देकर सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा, "अगर कानून बनाना सुप्रीम कोर्ट का ही काम रह गया है, तो संसद भवन को बंद कर देना चाहिए।" यह टिप्पणी उन्होंने सोशल मीडिया पर की, और यह सीधे तौर पर संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच शक्तियों के संतुलन को लेकर जारी बहस से जुड़ी है।

???? बात की शुरुआत कैसे हुई?

यह विवाद वक्फ संशोधन कानून और 'पॉकेट वीटो' से जुड़े दो संवैधानिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता है।


⚖️ वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

  • 16 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने अपील की कि वक्फ कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोई भी अंतरिम आदेश देने से पहले उसकी दलीलें सुनी जाएं

  • कोर्ट ने अंतरिम आदेश नहीं दिया, लेकिन कुछ मामलों, जैसे गैर-मुस्लिमों की वक्फ बोर्ड में एंट्री और ‘वक्फ बाय यूजर’ संपत्तियों में बदलाव, पर फिलहाल रोक लगा दी।

इससे पहले, केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने कहा था कि उन्हें भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट विधायी (legislative) मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, और लोकतंत्र में तीनों संस्थानों को एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए


????️ निशिकांत दुबे का बयान क्यों आया?

इन घटनाओं के बाद निशिकांत दुबे ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा:

"कानून यदि सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा तो संसद भवन बंद कर देना चाहिए।"

उनका तर्क है कि कानून बनाना संसद का अधिकार है, और अगर सुप्रीम कोर्ट अपने फैसलों के ज़रिए कानून की व्याख्या से आगे जाकर नई सीमाएं तय करता है, तो इससे संसद की भूमिका कमजोर होती है।


???? पॉकेट वीटो का मामला क्या है?

  • सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों को लेकर फैसला सुनाया।

  • ये विधेयक राज्यपाल आर.एन. रवि की मंजूरी के बिना वर्षों से अटके हुए थे।

  • कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी भी विधेयक पर तीन महीने के अंदर निर्णय लेना होगा। वे अनिश्चित काल तक फाइल लंबित नहीं रख सकते

इस फैसले से केंद्र सरकार असहमत है और मानती है कि इससे राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका सीमित हो जाएगी। सरकार इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल करने की तैयारी में है।


इस पूरी बहस का सार यही है कि भारत के लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — तीनों के बीच संतुलन बना रहना जरूरी है। जब एक संस्था दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप करती नजर आती है, तो टकराव की स्थिति बनती है। निशिकांत दुबे का बयान इसी असंतुलन के प्रति एक राजनीतिक प्रतिक्रिया है।