अमेरिका-ईरान तनाव से कच्चा तेल महंगा, बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर वैश्विक कच्चे तेल के बाजार पर दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर भारत समेत तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 08 जुलाई 2026
अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ रहे सैन्य तनाव ने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार में एक बार फिर अस्थिरता पैदा कर दी है। जैसे ही दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई की खबरें सामने आईं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को आशंका है कि यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसी डर के कारण तेल की मांग बढ़ी और कीमतों में अचानक तेजी देखने को मिली।अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ब्रेंट कच्चा तेल 76 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि अमेरिकी मानक कच्चा तेल भी 72 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार करता दिखाई दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ोतरी केवल मौजूदा सैन्य घटनाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि भविष्य में आपूर्ति बाधित होने की आशंका भी इसकी बड़ी वजह है। यदि आने वाले दिनों में हालात सामान्य नहीं हुए तो कच्चे तेल की कीमतों में और अधिक बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच कच्चे तेल में आई बड़ी तेजी
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर दिखाई देने लगा है। बीते कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही थी, जिससे तेल आयात करने वाले देशों को राहत मिलने की उम्मीद बनी हुई थी। लेकिन अमेरिका द्वारा ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर की गई कार्रवाई के बाद बाजार का माहौल पूरी तरह बदल गया और निवेशकों में एक बार फिर चिंता बढ़ गई।बुधवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग तीन प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। ब्रेंट कच्चा तेल 76 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी मानक कच्चा तेल भी लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया।
क्यों बढ़ गई कच्चे तेल की कीमत
अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट व्यावसायिक तेल जहाजों पर हुए हमलों के बाद ईरान के 80 से अधिक सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की। अमेरिकी सेना का दावा है कि उसने ईरान के वायु सुरक्षा तंत्र, तटीय रडार व्यवस्था, जहाज रोधी प्रक्षेपास्त्र प्रक्षेपण केंद्रों तथा कई अन्य रणनीतिक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इसके साथ ही ईरान की क्रांतिकारी गार्ड से जुड़ी अनेक नौकाओं को भी नष्ट करने का दावा किया गया है।इन घटनाओं के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव और अधिक बढ़ गया है। बाजार को आशंका है कि यदि दोनों देशों के बीच संघर्ष और बढ़ता है तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसी डर के कारण निवेशकों ने बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की खरीद शुरू कर दी, जिससे कीमतों में अचानक तेज उछाल देखने को मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि जब भी तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से ऊपर जाती हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख तेल उत्पादक देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल इसी मार्ग के जरिए एशिया, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुंचाया जाता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर करता है।यदि इस जलमार्ग पर किसी प्रकार का सैन्य संघर्ष, हमला या आवाजाही में बाधा आती है तो पूरी दुनिया में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य गतिविधि का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। वर्तमान हालात को देखते हुए भी बाजार को यही डर सता रहा है कि यदि तनाव और बढ़ा तो तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका ने ईरान को मिली तेल बिक्री की छूट भी वापस ली
सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक मोर्चे पर भी बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेचने के लिए दी गई विशेष अनुमति समाप्त करने का निर्णय लिया है। इससे पहले जून 2026 में दोनों देशों के बीच हुए अंतरिम समझौते के तहत ईरान को सीमित अवधि के लिए कानूनी रूप से तेल निर्यात करने की छूट दी गई थी।यह अनुमति 21 अगस्त 2026 तक प्रभावी रहने वाली थी, लेकिन अब अमेरिका ने इसे समय से पहले समाप्त कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद वैश्विक बाजार में ईरानी तेल की आपूर्ति कम हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ेगा, जिससे कच्चे तेल की कीमतों पर और अधिक दबाव पड़ सकता है।
भारत पर क्या होगा असर
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाला हर बदलाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। यदि कच्चा तेल महंगा होता है तो तेल कंपनियों की आयात लागत बढ़ जाती है, जिसका असर आगे चलकर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।इसके अलावा महंगा कच्चा तेल देश के आयात बिल को भी बढ़ाता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। परिवहन लागत बढ़ने से कई वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगले 48 घंटों में पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं हुआ तो कच्चे तेल की कीमत 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है, जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।