500 नहीं, अब 100! अमेरिका ने बदला रूस वाला बिल
रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर कठोर आर्थिक दबाव बनाने की अमेरिकी योजना में बड़ा बदलाव सामने आया है। पहले जहाँ पाँच सौ प्रतिशत आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव था, वहीं संशोधित विधेयक में इसे घटाकर सौ प्रतिशत कर दिया गया है। यदि यह विधेयक कानून बनता है तो भारत सहित कई देशों पर पहले की तुलना में कम प्रभाव पड़ सकता है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 15 जुलाई 2026
रूस से तेल खरीदने वाले देशों के विरुद्ध कठोर आर्थिक कदम उठाने की अमेरिकी तैयारी में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। पहले प्रस्तावित पाँच सौ प्रतिशत आयात शुल्क को घटाकर सौ प्रतिशत करने का संशोधित प्रस्ताव अमेरिकी संसद में प्रस्तुत किया गया है। इस परिवर्तन को भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल आयातक देशों के लिए राहत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि यह व्यवस्था तभी लागू होगी जब यह प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर कानून का रूप ले लेगा।
पाँच सौ प्रतिशत के स्थान पर सौ प्रतिशत शुल्क का नया प्रस्ताव
अमेरिकी सांसदों द्वारा प्रस्तुत संशोधित विधेयक में रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर अधिकतम सौ प्रतिशत आयात शुल्क लगाने का प्रावधान रखा गया है। पहले यही सीमा पाँच सौ प्रतिशत निर्धारित की गई थी, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाज़ार में व्यापक असर पड़ने की आशंका जताई जा रही थी। संशोधित प्रस्ताव से संकेत मिलता है कि अमेरिका अपने आर्थिक दबाव की नीति को पहले की तुलना में कुछ संतुलित स्वरूप देने की कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाए रखने की रणनीति जारी रहने की संभावना है।
भारत और चीन पर विशेष ध्यान
अमेरिका का मानना है कि भारत और चीन रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार देशों में शामिल हैं। संशोधित प्रस्ताव के अनुसार अब यह कठोर शुल्क सभी देशों पर लागू नहीं होगा, बल्कि केवल उन पाँच देशों पर लागू करने का विचार है जो रूस से सबसे अधिक तेल और प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। इस बदलाव से भारत पर पहले की तुलना में संभावित आर्थिक दबाव कम हो सकता है। फिर भी अंतिम स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि विधेयक का अंतिम स्वरूप क्या होता है और उसमें आगे कौन-कौन से संशोधन किए जाते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति को मिलेगी विशेष छूट देने की शक्ति
संशोधित प्रस्ताव में अमेरिकी राष्ट्रपति को विशेष अधिकार देने की व्यवस्था भी की गई है। यदि राष्ट्रपति को यह लगे कि किसी देश को राहत देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो वह प्रस्तावित शुल्क अथवा अन्य प्रतिबंधों में छूट प्रदान कर सकते हैं। इससे भविष्य में परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ व्यवहार करने की संभावना बनी रहेगी। यह प्रावधान अमेरिका को कूटनीतिक स्तर पर अधिक लचीलापन भी प्रदान करेगा।
दोनों प्रमुख दलों का मिल रहा है समर्थन
यह संशोधित विधेयक अमेरिका के सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के कई सांसदों के समर्थन के साथ आगे बढ़ रहा है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार अनेक सांसद इसके सह-प्रस्तावक बन चुके हैं और आगे भी समर्थन बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। दोनों प्रमुख राजनीतिक दल रूस के विरुद्ध कठोर आर्थिक नीति अपनाने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि इस प्रस्ताव को अमेरिकी संसद में गंभीरता से देखा जा रहा है।
कानून बनने के बाद ही होंगे प्रभावी प्रावधान
फिलहाल यह प्रस्ताव अमेरिकी संसद की प्रक्रिया से गुजर रहा है और अभी इसे अंतिम स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है। संसद से पारित होने तथा राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही यह विधेयक कानून बनेगा और इसके प्रावधान लागू होंगे। इसलिए भारत सहित दुनिया के अनेक देशों की निगाह अब इस विधेयक की आगे की संसदीय प्रक्रिया पर टिकी हुई है। यदि इसमें आगे भी बदलाव होते हैं तो उसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा व्यापार और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्या हो सकता है प्रभाव
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न देशों से कच्चा तेल आयात करता है, जिनमें रूस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि प्रस्तावित शुल्क पहले की तरह पाँच सौ प्रतिशत रहता तो भारत पर आर्थिक और व्यापारिक दबाव अधिक बढ़ सकता था। संशोधित प्रस्ताव में इसे घटाकर सौ प्रतिशत किए जाने से संभावित जोखिम कुछ कम होता दिखाई दे रहा है। हालांकि अंतिम स्थिति कानून बनने के बाद ही स्पष्ट होगी और भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए आगे की रणनीति तय करेगा।