दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा आदेश! सीजेपी प्रदर्शन मामले में सुरक्षित रहेगा हर सबूत

दिल्ली हाईकोर्ट ने सीजेपी आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने घटनास्थल के सीसीटीवी और बॉडी कैमरा दृश्य सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। साथ ही पुलिस से चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है।

दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा आदेश! सीजेपी प्रदर्शन मामले में सुरक्षित रहेगा हर सबूत

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 22 जुलाई 2026

जंतर-मंतर और संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। न्यायालय ने घटनास्थल के सभी निगरानी दृश्य और पुलिस के शरीर पर लगे चित्रांकन उपकरणों के दृश्य सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से छात्राओं के साथ छेड़छाड़, अत्यधिक बल प्रयोग और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने की मांग उठाई गई।

छात्राओं से छेड़छाड़ और पुलिस कार्रवाई के आरोपों पर दिल्ली उच्च न्यायालय सख्त, पुलिस को नोटिस जारी

जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन और संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई का मामला अब दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंच गया है। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने इस मामले से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि घटनास्थल से जुड़े सभी निगरानी दृश्य, पुलिस के शरीर पर लगे चित्रांकन उपकरणों के दृश्य और अन्य उपलब्ध अभिलेख सुरक्षित रखे जाएं, ताकि भविष्य में जांच के दौरान किसी प्रकार का साक्ष्य नष्ट न हो। अदालत ने अगली सुनवाई की तिथि 11 सितंबर निर्धारित की है।

जनहित याचिका में लगाए गए गंभीर आरोप

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और प्रदर्शनकारियों को बिना किसी पूर्व चेतावनी के बलपूर्वक हटाया गया। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों के साथ इस प्रकार की कार्रवाई उचित नहीं कही जा सकती।उन्होंने अदालत के समक्ष यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान छात्राओं के साथ छेड़छाड़ हुई और कई प्रदर्शनकारियों के साथ कठोर व्यवहार किया गया। याचिका में मांग की गई कि जिन अधिकारियों की पहचान हो सकती है, उनके विरुद्ध तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर निष्पक्ष जांच कराई जाए।

अदालत में बल प्रयोग पर उठे सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर जिस प्रकार बल प्रयोग किया गया, उसने कई संवैधानिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। उनका कहना था कि किसी भी सरकारी कार्रवाई की वैधता संविधान के समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर परखी जानी चाहिए।याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि घटनास्थल पर मौजूद कई दृश्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया। उनका कहना था कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि सच्चाई सामने आ सके।

प्रदर्शन शांतिपूर्ण होने का दावा

वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि प्रदर्शनकारी लगभग बीस दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से जंतर-मंतर पर आंदोलन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संसद मार्च की घोषणा पहले ही कर दी गई थी और प्रशासन को इसकी पूरी जानकारी थी।उनका कहना था कि मार्च शुरू होने से पहले तक किसी प्रकार की हिंसा की सूचना सामने नहीं आई थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध अचानक बल प्रयोग किया गया, जिससे बड़ी संख्या में छात्र और अन्य लोग घायल हो गए।

घायलों और वीडियो साक्ष्यों का दिया गया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि इस पूरी घटना में नब्बे से अधिक छात्र घायल हुए हैं और घायलों की संख्या लगातार बढ़ने की जानकारी मिल रही है। उन्होंने कहा कि कई वीडियो में ऐसे लोग भी दिखाई दे रहे हैं जो सामान्य कपड़ों में थे और हाथों में डंडे लिए हुए प्रदर्शनकारियों पर हमला करते नजर आए।याचिका में यह भी कहा गया कि इन सभी दृश्य अभिलेखों को सुरक्षित रखा जाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि किसी भी उच्चस्तरीय जांच के दौरान उनका उपयोग किया जा सके। साथ ही अदालत से आग्रह किया गया कि पुलिस द्वारा बल प्रयोग के नियमों और प्रक्रिया की भी न्यायिक समीक्षा कराई जाए।

निगरानी दृश्य सुरक्षित रखने का आदेश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि घटनास्थल से जुड़े सभी निगरानी दृश्य, पुलिस के शरीर पर लगे चित्रांकन उपकरणों के दृश्य और अन्य उपलब्ध अभिलेख सुरक्षित रखे जाएं। अदालत का मानना है कि किसी भी निष्पक्ष जांच के लिए साक्ष्यों का सुरक्षित रहना आवश्यक है।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस अपना विस्तृत उत्तर चार सप्ताह के भीतर दाखिल करेगी, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर दाखिल करने का अवसर दिया जाएगा। इसके बाद अगली सुनवाई में मामले की आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी।

आगे क्या हो सकता है

इस मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी। तब तक दिल्ली पुलिस को अपना पक्ष अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। यदि अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों और जवाब में किसी प्रकार की कमी दिखाई देती है तो वह आगे अतिरिक्त निर्देश भी जारी कर सकती है।यह मामला अब केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन, नागरिक अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और कानून व्यवस्था जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों से भी जुड़ गया है। इसलिए आने वाली सुनवाई पर सभी पक्षों की नजर बनी रहेगी।