धनतेरस आज और कल, दोनों दिन खरीदारी के 4-4 मुहूर्त:समुद्र मंथन में लक्ष्मी को मिले आभूषण और कलश, इसलिए बर्तन और ज्वेलरी खरीदी की परंपरा

Nov 06, 2026 - 06:20
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धनतेरस आज और कल, दोनों दिन खरीदारी के 4-4 मुहूर्त:समुद्र मंथन में लक्ष्मी को मिले आभूषण और कलश, इसलिए बर्तन और ज्वेलरी खरीदी की परंपरा
इस बार धनतेरस पर सोना-चांदी और नई चीजें खरीदने के लिए दो दिन मिलेंगे। 6 और 7 नवंबर को चार-चार शुभ चौघड़िया मुहूर्त हैं। हर मुहूर्त करीब डेढ़ घंटे का है। त्रयोदशी तिथि 6 को शुरू होगी और 7 तारीख तक रहेगी, इस कारण 2 दिन खरीदारी कर सकेंगे। धनतेरस पर ज्वेलरी और बर्तन खरीदने की परंपरा से जुड़ी बात श्रीमद्भागवत पुराण में लिखी है। इसके अनुसार समुद्र मंथन से लक्ष्मी के प्रकट होने पर नदियां सोने के कलश लेकर आई थीं और विश्वकर्मा ने देवी को आभूषण भेंट किए थे। जानिए खरीदारी के मुहूर्त, खास परंपराएं और लक्ष्मी से जुड़े 7 शुभ प्रतीकों की कथाएं। धनतेरस पर धनिया-झाड़ू खरीदने का महत्व पद्म पुराण और स्कंद पुराण में लक्ष्मी को अन्न और धान्य को बढ़ाने वाली देवी कहा गया है। धनिया के बीज भी अंकुरित होकर बढ़ते हैं, इसलिए इसे आमदनी और संपत्ति में बढ़ोतरी का प्रतीक माना जाता है। इस मान्यता के चलते धनतेरस पर धनिया के साबुत बीज खरीदे जाते हैं। धनतेरस पर झाड़ू खरीदने की भी परंपरा है। हालांकि, किसी धर्म ग्रंथ में इसका जिक्र नहीं है, लेकिन परंपरा में झाड़ू को घर की दरिद्रता, नकारात्मकता और दुखों को बाहर निकालने का प्रतीक माना गया है। लक्ष्मी के 7 प्रतीक, सभी को पूजने की मान्यता श्रीमद्भागवत महापुराण में समुद्र मंथन की कथा है। देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन किया। इससे सुरभि गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, चार दांतों वाला ऐरावत हाथी, कौस्तुभ और पद्मराग मणि, पारिजात और अप्सराएं निकलीं। इसके बाद देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं। लक्ष्मी को इंद्र ने आसन दिया। नदियां सोने के कलशों में जल लेकर आईं। ऋषियों ने वैदिक मंत्रों से अभिषेक किया और दिशाओं के हाथियों ने देवी को स्नान कराया। फिर लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को पति चुना। 200 साल पहले धनतेरस पर सिक्कों की पूजा ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड ने 1832 में अपनी किताब ‘अनल्ज एंड एंटिक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में लिखा कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी पर लोग सिक्कों को देवी लक्ष्मी का प्रतीक मानकर पूजते थे। यह परंपरा खासतौर से व्यापारी समुदाय में प्रचलित थी। टॉड ने 1818 से 1822 के बीच राजस्थान में राजपूताना परंपराओं का अध्ययन किया था। इससे पता चलता है कि करीब दो सदी पहले भी धनतेरस पर धन की पूजा महत्वपूर्ण थी।

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