घाटमपुर में मनाया बाटस चौदस त्योहार:टेसू-झांझी की शादी के बाद शुरू होते हैं मांगलिक काम, गांव-गांव घूमी टोली
कानपुर के घाटमपुर नगर समेत क्षेत्र में धूमधाम के साथ बाटस चौदस का त्योहार मनाया गया। बुंदेली धरती पर यह परंपरागत कई वर्षों से चल रही है। अपने कटे सिर से महाभारत को देखने वाले बर्बरीक की अधूरी प्रेम कहानी को पूरा कराकर भविष्य के नव जोड़ों के लिए राह प्रशस्त करने की ब्रज क्षेत्र में प्रचलित टेसू झांझी की परंपरा को उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड की धरती सहेज रही है। टेसू-झांझी के विवाह के बाद ही इस क्षेत्र में शहनाई बजने की शुरुआत होती है। घाटमपुर नगर समेत आसपास क्षेत्र में टेसू झांझी की इस परंपरा को बुंदेलखंड का द्वार कहे जाने वाले घाटमपुर क्षेत्र के युवा और युवतियां सहजे हुए हैं। एक दौर था, जब किशोर-किशोरियां टेसू-झांझी लेकर घर-घर से निकलते थे, और गाना गाकर चंदा मांगते थे। बुजुर्ग कालिका सैनी, हेतनारायण त्रिवेदी, दीपू शुक्ला, गया प्रसाद त्रिवेदी, नरेंद्र पाल सिंह, जगत पाल सिंह बताते हैं कि यह प्राचीन परंपरा है, जिसे युवाओं ने वृहद रूप दिया है। शाम होते ही युवाओं की टोली गांव के विभिन्न गलियों में घूमी यहां पर घर घर टेसू और झांझी की पूजा अर्चना करने के साथ युवा और युवतियों को टॉफी रुपए दिए है। इस दौरान युवा टेसू अटर करे टेसू मटर करे टेसू लही के टरे..., वही हाथो में युवतियां झाँझी लिए मोर झांझिया अउर मांगे मोर झांझिया चाउर मांगे सोलह श्रृंगार मांगे बैठे का पिढ़ैया मांगे, दूध खाए का गैया मांगे, मोर झांझिया चली है, पराए घराए... गीत सुनाकर घर घर टोली घूमी है। शरद पूर्णिमा के दिन होती है टेसू-झांझी की शादी शरद पूर्णिमा के दिन धूमधाम के साथ टेसू झांझी कि शादी होती है। इस विवाह का आयोजन गांव-गांव, कस्बा समेत हर जगह आयोजन होता है। लोगों की मान्यता है, कि अगर किसी लड़के की शादी में अड़चन आ रही है तो तीन साल वह झांझी का विवाह कराए, लड़की की शादी में दिक्कत आ रही है तो टेसू का विवाह कराने का संकल्प लें। उसकी दोनों की शादी हो जाएगी। टेसू-झांझी से होती है शुभ कामों की शुरुआत
यह बुंदेलखंड की काफी पुरानी परंपरा है। समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया है। अब कम लोग ही पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हैं। यहां माना जाता है कि शुभ कार्यों की शुरुआत इस विवाह के बाद ही होती है। अनुश्रुति है कि झिंझिया नाम की राजकुमारी को टेसू नाम के राजकुमार ने राक्षस से आजाद कराया था, जिसके बाद यह त्योहार धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
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