शपथ में अतिरिक्त नाम जोड़ना अवैध

केरल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि शपथ लेते समय कानून में निर्धारित शब्दों के अलावा किसी देवी-देवता, भारत माता, राजनीतिक व्यक्तित्व या संगठन का नाम नहीं जोड़ सकते। अदालत ने कुछ प्रतिनिधियों की शपथ को अवैध मानते हुए उन्हें दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया है।

शपथ में अतिरिक्त नाम जोड़ना अवैध

दि राइजिंग न्यूज़ | तिरुवनंतपुरम | 25 जून 2026

शपथ को लेकर हाई कोर्ट का अहम फैसला

केरल हाई कोर्ट ने स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की शपथ प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि शपथ लेते समय कानून में निर्धारित शब्दों से बाहर जाकर किसी देवी-देवता, भारत माता, राजनीतिक शहीद, संगठन अथवा किसी व्यक्ति का नाम जोड़ना वैध नहीं माना जाएगा।अदालत ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के कुछ पार्षदों और वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत के एक सदस्य की शपथ को नियमों के अनुरूप नहीं माना तथा उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया है।

कैसे पहुंचा मामला अदालत तक

मामला उस समय सामने आया जब तिरुवनंतपुरम नगर निगम के 20 पार्षदों ने शपथ ग्रहण के दौरान विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं, भारतम्बा, भारत माता, गुरुदेव तथा अपने राजनीतिक आंदोलन से जुड़े शहीदों का नाम लिया।इसी प्रकार पलक्कड़ जिले के वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत के एक सदस्य ने कथित रूप से “ईश्वर की कृपा से उम्मन चांडी के नाम पर” शपथ ली थी। इन घटनाओं के बाद अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की गई कि क्या कानून शपथ के निर्धारित प्रारूप से बाहर जाने की अनुमति देता है।

अदालत ने क्या कहा

न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने अपने फैसले में कहा कि केरल नगरपालिका अधिनियम और केरल पंचायत राज अधिनियम के तहत शपथ लेने के केवल दो वैध तरीके हैं।पहला, ईश्वर के नाम पर शपथ लेना।दूसरा, ईश्वर का नाम लिए बिना सत्यनिष्ठा की प्रतिज्ञा करना।अदालत ने कहा कि “ईश्वर” शब्द का अर्थ बढ़ाकर किसी विशेष देवी-देवता, भारत माता, राजनीतिक नेता, संगठन या अन्य किसी व्यक्ति का नाम जोड़ना कानून के दायरे से बाहर है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शपथ केवल औपचारिकता नहीं

फैसले में अदालत ने कहा कि शपथ केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जनता और संविधान के प्रति एक गंभीर दायित्व का प्रतीक है। निर्वाचित प्रतिनिधि शपथ के माध्यम से संविधान का सम्मान करने, कानून का पालन करने और ईमानदारी से जनसेवा करने का वचन देते हैं।इसलिए शपथ का स्वरूप वही होना चाहिए जो कानून में स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है।

सदस्यता पर नहीं पड़ेगा असर

अदालत ने माना कि संबंधित प्रतिनिधियों की शपथ कानूनी रूप से वैध नहीं थी, लेकिन केवल इसी आधार पर उनके निर्वाचन को रद्द नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने सभी संबंधित जनप्रतिनिधियों को चार सप्ताह के भीतर दोबारा निर्धारित प्रारूप में शपथ लेने का निर्देश दिया है।अदालत ने यह भी कहा कि संभव है प्रतिनिधियों ने सद्भावना में यह समझकर ऐसा किया हो कि उनका तरीका वैध है, इसलिए उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

नगर निगम और पंचायत मामलों में अंतर

तिरुवनंतपुरम नगर निगम के पार्षदों को अदालत से राहत मिली है। कोर्ट ने कहा कि अब तक उनके द्वारा किए गए कार्य केरल नगरपालिका अधिनियम की धारा 531 के तहत सुरक्षित रहेंगे और केवल शपथ की त्रुटि के आधार पर उन्हें अमान्य नहीं माना जाएगा।हालांकि वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत सदस्य के मामले में अदालत ने कहा कि पंचायत राज अधिनियम में ऐसी सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। इसलिए गलत शपथ के बाद किए गए उनके कार्य अमान्य माने जाएंगे। फिर भी उन्हें दोबारा शपथ लेकर अपनी स्थिति नियमित करने का अवसर दिया गया है।

धर्मनिरपेक्षता और कानून का संतुलन

अदालत ने अपने फैसले में समाज सुधारक श्री नारायण गुरु की शिक्षाओं और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि लोग व्यक्तिगत रूप से भगवान को विभिन्न नामों से पुकार सकते हैं, लेकिन कानूनी शपथ केवल निर्धारित प्रारूप के अनुसार ही ली जा सकती है।अदालत ने स्पष्ट किया कि शपथ प्रक्रिया में व्यक्तिगत या राजनीतिक मान्यताओं के आधार पर अतिरिक्त शब्द जोड़ना कानून की भावना के अनुरूप नहीं है।