मायावती के सियासी गढ़ से 2027 का बिगुल फूंकेंगे आकाश:सहारनपुर से बसपा की वापसी के लिए जनसभा के जरिए पुराना जनाधार एक्टिव करेंगे

Nov 02, 2026 - 06:31
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मायावती के सियासी गढ़ से 2027 का बिगुल फूंकेंगे आकाश:सहारनपुर से बसपा की वापसी के लिए जनसभा के जरिए पुराना जनाधार एक्टिव करेंगे
सहारनपुर के सौराणा में आकाश आनंद की जनसभा को सिर्फ 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे सहारनपुर की उस राजनीतिक जमीन को दोबारा हासिल करने की कोशिश भी है, जहां से कभी बसपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी मजबूत पहचान बनाई थी। यह वही जिला है, जहां की हरौड़ा विधानसभा सीट से बसपा सुप्रीमो मायावती दो बार विधायक चुनी गई थीं। विधायक रहते हुए ही उन्होंने प्रदेश की मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली थी। आकाश आनंद की सभा के लिए सरसावा क्षेत्र के सौराणा का चयन भी राजनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र नकुड़ विधानसभा में आता है। यहां से पूर्व मंत्री धर्म सिंह सैनी बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे और मायावती सरकार में मंत्री बने थे। बाद में वह भाजपा में गए और 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर मैदान में उतरे। फिलहाल नकुड़ से भाजपा के मुकेश चौधरी विधायक हैं। ऐसे में बसपा की इस क्षेत्र में जनसभा को पुराने राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक मौजूदगी को फिर से मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही पार्टी 2027 से पहले प्रत्याशियों के नाम सामने लाकर विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करने की रणनीति पर भी काम कर रही है। हरौड़ा से दो बार विधायक बनीं मायावती सहारनपुर का बसपा की राजनीति में महत्व समझने के लिए हरौड़ा विधानसभा सीट का इतिहास अहम है। मायावती ने 1996 के विधानसभा चुनाव में सहारनपुर जिले की हरौड़ा सुरक्षित सीट से जीत हासिल की थी। इसके बाद 2002 में भी वह इसी सीट से विधायक चुनी गईं। 1996 में विधायक बनने के बाद 21 मार्च 1997 को मायावती दूसरी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। वहीं, 2002 में हरौड़ा से दोबारा जीतने के बाद 3 मई 2002 को उन्होंने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस तरह हरौड़ा सीट उनके राजनीतिक सफर और मुख्यमंत्री बनने के इतिहास से सीधे जुड़ी रही है। मायावती का सहारनपुर से रिश्ता केवल विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहा। 1989 में वह बिजनौर लोकसभा सीट से सांसद चुनी गई थीं। 1991 में उन्होंने बिजनौर, बुलंदशहर और हरिद्वार से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। इसके बाद हरौड़ा से मिली दो विधानसभा जीत ने सहारनपुर को बसपा की राजनीति में खास जगह दिलाई। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद हरौड़ा सीट समाप्त हो गई, लेकिन उसका राजनीतिक इतिहास आज भी पश्चिमी यूपी में बसपा की पुरानी पकड़ के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि सहारनपुर में आकाश आनंद की सभा को मायावती की राजनीतिक विरासत से जोड़कर भी देखा जा रहा है। धर्म सिंह सैनी के राजनीतिक सफर से जुड़ा है बसपा का आधार सौराणा की सभा का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू नकुड़ विधानसभा का राजनीतिक इतिहास है। पूर्व मंत्री धर्म सिंह सैनी का राजनीतिक सफर इस सीट पर बसपा की पुरानी मौजूदगी से जुड़ा रहा है। वह बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए और मायावती सरकार में मंत्री बने। बाद में भाजपा में शामिल होकर 2017 में नकुड़ से चुनाव जीता। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले धर्म सिंह सैनी भाजपा छोड़कर सपा में चले गए। उन्होंने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के मुकेश चौधरी से हार गए। अब नकुड़ में बसपा की सक्रियता और नरेश सैनी के संभावित नाम की चर्चा को इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। जिस क्षेत्र में कभी बसपा के टिकट पर धर्म सिंह सैनी विधायक और मंत्री बने थे, उसी क्षेत्र में अब पार्टी नए प्रत्याशी के जरिए अपनी जमीन तैयार करने की कोशिश में है। यदि नरेश सैनी के नाम की औपचारिक घोषणा होती है तो यह नकुड़ में बसपा की चुनावी तैयारी का संकेत होगा। 2022 के चुनाव में नकुड़ सीट पर मुकाबला करीबी रहा था। भाजपा के मुकेश चौधरी और सपा के धर्म सिंह सैनी के बीच कड़ा मुकाबला हुआ। बसपा के साहिल खान को भी 55 हजार से अधिक वोट मिले थे। ऐसे में इस सीट पर बसपा के मतों की भूमिका और 2027 के लिए पार्टी की रणनीति महत्वपूर्ण होगी। 2007 के सामाजिक भाईचारे वाले मॉडल को फिर अपनाने की कोशिश बसपा नेताओं की ओर से सौराणा की सभा में सर्वसमाज की बड़ी भागीदारी का दावा किया जा रहा है। पार्टी नेता 2007 के विधानसभा चुनाव में दिखाई दिए सामाजिक भाईचारे की झलक फिर से सामने लाने की बात कह रहे हैं। 2007 में मायावती ने दलित मतदाताओं के परंपरागत समर्थन के साथ ब्राह्मणों और अन्य सामाजिक वर्गों को जोड़कर 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' का राजनीतिक मॉडल सामने रखा था। इस रणनीति के तहत बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। मायावती ने पांच साल तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल पूरा किया। अब 2027 के चुनाव से पहले बसपा इसी सामाजिक समीकरण को नए सिरे से साधने की कोशिश कर रही है। सहारनपुर में दलित, मुस्लिम, सैनी, गुर्जर, पिछड़े और अन्य वर्गों की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में सभा में सर्वसमाज की भागीदारी का दावा केवल भीड़ जुटाने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए पार्टी व्यापक सामाजिक आधार का संदेश देना चाहती है। हालांकि, 2007 के राजनीतिक हालात और 2027 के चुनावी समीकरण एक जैसे नहीं हैं। पिछले डेढ़ दशक में प्रदेश की राजनीति में भाजपा और सपा का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में बसपा के सामने पुराने सामाजिक भाईचारे के मॉडल को मौजूदा परिस्थितियों में प्रभावी बनाने की चुनौती भी रहेगी। मायावती ने आकाश आनंद को फिर सौंपी जिम्मेदारी इस सभा का एक बड़ा पहलू बसपा के भीतर नेतृत्व का भी है। मायावती ने आकाश आनंद को दोबारा पार्टी की जिम्मेदारी देकर संगठन और चुनावी गतिविधियों में सक्रिय किया है। अब उन्हें उत्तर प्रदेश में जनसभाओं के जरिए पार्टी का अभियान आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है। आकाश आनंद की राजनीतिक यात्रा भी उतार-चढ़ाव से गुजरी है। मायावती ने मार्च 2025 में उन्हें पार्टी के पदों से हटा दिया था। बाद में उन्हें फिर जिम्मेदारी दी गई और 2026 में राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया। अब वह मायावती के समर्थन के साथ प्रदेश में जनसभाएं कर रहे हैं। पार्टी के लिए यह आकाश आनंद को संगठनात्मक और चुनावी स्तर पर सक्रिय भूमिका में स्थापित करने का अवसर भी है। सहारनपुर की सभा इसलिए भी अहम है, क्योंकि आकाश आनंद की सियासी लॉन्चिंग में भी इस जिले की भूमिका रही है। वर्ष 2017 में मायावती उन्हें अपने साथ सहारनपुर लेकर पहुंची थीं। अब करीब नौ साल बाद 2027 के चुनाव से पहले वह इसी जिले में स्वतंत्र रूप से बड़ी जनसभा को संबोधित करने जा रहे हैं। ऐसे में यह सभा उनकी राजनीतिक भूमिका और पार्टी के भीतर नेतृत्व की सक्रियता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। चुनाव से पहले प्रत्याशियों के नाम सामने लाकर संगठन मजबूत करने की रणनीति बसपा सहारनपुर देहात विधानसभा सीट से पहले ही प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। अब नकुड़ सीट पर नरेश सैनी के नाम की चर्चा है। इसके अलावा बेहट और रामपुर मनिहारान सीटों पर भी संभावित दावेदारों के मायावती से आशीर्वाद लेने की चर्चाएं हैं। पार्टी चुनाव से काफी पहले संभावित प्रत्याशियों को सामने लाकर उन्हें क्षेत्र में जनसंपर्क और संगठन मजबूत करने का समय देना चाहती है। इससे कार्यकर्ताओं को भी चुनावी तैयारी को लेकर स्पष्ट संदेश मिलता है। नरेश गौतम, डॉ. मेघराज जरावरे और जिलाध्यक्ष रजनीश बंधु समेत पार्टी के नेता सभा को सफल बनाने के लिए कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंप रहे हैं। पार्टी का दावा है कि सौराणा में सर्वसमाज की बड़ी भागीदारी होगी। भाजपा-सपा के बीच बदले समीकरणों में बसपा की वापसी की कोशिश सहारनपुर की राजनीति में पिछले कुछ चुनावों के दौरान भाजपा और सपा के बीच मुकाबला प्रमुख रूप से सामने आया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जिले की सातों सीटों पर बसपा को जीत नहीं मिली थी। हालांकि, कई सीटों पर पार्टी का वोट चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहा। ऐसे में बसपा की सक्रियता को भाजपा और सपा के बीच बनते चुनावी समीकरणों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। नकुड़ में धर्म सिंह सैनी का बसपा से भाजपा और फिर सपा तक का राजनीतिक सफर इस सीट के बदलते समीकरणों का उदाहरण है। अब बसपा नरेश सैनी के संभावित नाम के साथ अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश में है।

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