नीट प्रश्नपत्र लीक रोकने की योजना दो साल पहले बनी थी, फिर क्यों फेल हुआ पूरा तंत्र

नीट 2026 विवाद ने यह साफ कर दिया है कि केवल कड़ी निगरानी और बायोमेट्रिक व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती प्रश्नपत्र छपाई और वितरण तंत्र की सुरक्षा में है। विशेषज्ञ समिति ने वर्ष 2024 में ही आधुनिक सुरक्षित प्रणाली का सुझाव दिया था, लेकिन उसके लागू न होने से परीक्षा व्यवस्था फिर संकट में आ गई। अब देशभर के विद्यार्थियों की नजर इस बात पर है कि सरकार भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 23 जुलाई 2026

नई दिल्ली से सामने आई जानकारी ने देश की परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि वर्ष 2024 में गठित उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति ने प्रश्नपत्र लीक रोकने के लिए विस्तृत सुरक्षा ढांचा तैयार किया था। समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि छपाई और वितरण प्रक्रिया को नहीं बदला गया तो भविष्य में भी बड़े स्तर पर लीक की घटनाएं हो सकती हैं। इसके बावजूद सबसे महत्वपूर्ण सुधार लागू नहीं हो सके और लाखों विद्यार्थियों का भविष्य अनिश्चितता में पड़ गया।

तीन मई को हुई परीक्षा, बारह मई को रद्द

तीन मई 2026 को आयोजित नीट स्नातक परीक्षा में लगभग बाईस लाख सत्तर हजार विद्यार्थी शामिल हुए थे। परीक्षा से पहले सामाजिक माध्यमों पर एक कथित अनुमान प्रश्नपत्र तेजी से प्रसारित हुआ, जिसके अनेक प्रश्न वास्तविक प्रश्नपत्र से मेल खाते पाए गए। इस खुलासे के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने बारह मई को पूरी परीक्षा रद्द कर दी। इक्कीस जून को दोबारा परीक्षा आयोजित की गई, लेकिन विद्यार्थियों और अभिभावकों का भरोसा बुरी तरह प्रभावित हो चुका था।

वर्ष 2024 में बनी थी उच्च स्तरीय समिति

नीट 2024 विवाद के बाद शिक्षा मंत्रालय ने पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति गठित की थी। समिति ने तेइस बैठकों के बाद एक सौ चौरासी पृष्ठों की रिपोर्ट सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट में केवल कमियां नहीं बताई गईं, बल्कि उन्हें दूर करने के लिए एक सौ एक ठोस सिफारिशें भी दी गईं। समिति ने देश भर के विद्यार्थियों, अभिभावकों, विशेषज्ञों, चिकित्सा संस्थानों और जांच एजेंसियों से सुझाव लेकर यह रिपोर्ट तैयार की थी।

छपाई और परिवहन को बताया गया सबसे बड़ा खतरा

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि प्रश्नपत्र लीक का सबसे बड़ा जोखिम उस समय पैदा होता है जब प्रश्नपत्र छपाई केंद्र से निकलकर गोदामों, वाहनों और परीक्षा केंद्रों तक पहुंचता है। जितने अधिक लोगों के हाथों से प्रश्नपत्र गुजरता है, उसके लीक होने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। समिति ने इसे परीक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी बताया था। इसी कारण उसने नई सुरक्षित प्रणाली लागू करने की सिफारिश की थी।

परीक्षा केंद्र पर ही छपने वाला था प्रश्नपत्र

समिति ने ऐसी व्यवस्था सुझाई थी जिसमें प्रश्नपत्र पहले से छापकर देशभर में भेजने के बजाय गुप्त संकेतों के रूप में सीधे परीक्षा केंद्र के सुरक्षित संगणक तक पहुंचाया जाता। परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले उसी केंद्र के भीतर उच्च गति वाले मुद्रक से प्रश्नपत्र छापा जाता। इससे छपाई, भंडारण और परिवहन के दौरान लीक की संभावना लगभग समाप्त हो सकती थी। समिति ने पहले इस व्यवस्था का परीक्षण करने और उसके बाद पूरे देश में लागू करने की सलाह दी थी।

सबसे अहम सुझाव आज तक लागू नहीं हुआ

सरकार ने कई सुरक्षा उपाय लागू करने का दावा किया है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षित प्रश्नपत्र प्रणाली का परीक्षण तक नहीं हो पाया। यही वह व्यवस्था थी जिसे समिति ने सबसे पहले आजमाने की सिफारिश की थी। अब सवाल उठ रहा है कि यदि समाधान वर्ष 2024 में तैयार था तो दो वर्षों तक उस पर अमल क्यों नहीं हुआ। इस देरी ने परीक्षा सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

दस प्रमुख सिफारिशों में क्या था

समिति ने प्रश्नपत्र को पहले से देशभर में न घुमाने, प्रत्येक प्रति को अलग पहचान संख्या देने और छपाई केंद्रों पर मोबाइल तथा कैमरे पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की सलाह दी थी। प्रश्नपत्र परिवहन करने वाले वाहनों पर स्थान निर्धारण यंत्र लगाने और हर परीक्षा केंद्र पर राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त करने का प्रस्ताव भी रखा गया था। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की निगरानी में सुरक्षा व्यवस्था, संदिग्ध परीक्षा केंद्रों को सूची से बाहर करना और विद्यार्थियों को अपने ही जिले में केंद्र आवंटित करना भी प्रमुख सुझावों में शामिल था।

कई दिनों में परीक्षा कराने का सुझाव

समिति ने कहा था कि जब दो लाख से अधिक विद्यार्थी परीक्षा में बैठते हों तो परीक्षा एक ही दिन में कराने के बजाय कई चरणों में आयोजित की जानी चाहिए। उसने एक से अधिक प्रश्नपत्र सेट तैयार करने और हर सेट में प्रश्नों का क्रम अलग रखने की भी सिफारिश की थी। इसके अतिरिक्त पूरी परीक्षा व्यवस्था किसी एक निजी संस्था को न सौंपने की सलाह दी गई थी। इन सुझावों का उद्देश्य किसी भी संभावित लीक को सीमित दायरे में रखना था।

उच्चतम न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

नीट 2026 रद्द होने के बाद उच्चतम न्यायालय ने इस घटना को अत्यंत पीड़ादायक बताया। न्यायालय ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उसने पिछले विवादों से कोई सीख नहीं ली। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होगी, ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं। इस टिप्पणी ने केंद्र सरकार और परीक्षा एजेंसियों पर दबाव और बढ़ा दिया है।

सरकार का दावा और जमीनी स्थिति

सरकार का कहना है कि समिति की कई सिफारिशें लागू की जा चुकी हैं और कुछ पर काम जारी है। राज्य और जिला स्तर पर समन्वय समितियां बनाई गईं तथा उच्च स्तरीय संचालन समिति भी गठित की गई। लेकिन अब तक यह सार्वजनिक नहीं किया गया कि एक सौ एक सिफारिशों में से कितनी पूरी हुईं और कितनी लंबित हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कमान श्रृंखला में टूट को घटना का कारण बताया है, जबकि विपक्ष इसे प्रशासनिक विफलता बता रहा है।

बहुराज्यीय गिरोह का खुलासा

जांच एजेंसियों के अनुसार प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्रों पर नहीं बल्कि छपाई के दौरान लीक हुआ। राजस्थान पुलिस के विशेष अभियान दल ने सबसे पहले इसकी जानकारी जुटाई, जिसके बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो ने जांच अपने हाथ में ली। जांच में महाराष्ट्र, हरियाणा और राजस्थान तक फैला एक बहुराज्यीय नेटवर्क सामने आया है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बायोमेट्रिक उपस्थिति और सरकारी परीक्षा केंद्र होने के बावजूद असली सेंध छपाई प्रक्रिया में लगी।

अब सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदारी का

पूरे विवाद के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब सरकार की अपनी विशेषज्ञ समिति ने दो वर्ष पहले ही खतरे और समाधान दोनों की पहचान कर ली थी, तो उन्हें समय पर लागू क्यों नहीं किया गया। यदि सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा सुधार आज भी अधूरे हैं तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी। करोड़ों विद्यार्थी केवल निष्पक्ष और भरोसेमंद परीक्षा प्रणाली की उम्मीद कर रहे हैं। जब तक सरकार स्पष्ट रोडमैप और जवाबदेही तय नहीं करती, यह सवाल लगातार उठता रहेगा।