परिसीमन पर सुप्रिया सुले के बदले सुर!

महाराष्ट्र की राजनीति में परिसीमन विधेयक को लेकर नया मोड़ आया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की नेता और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने कहा है कि उनकी पार्टी विधेयक का अध्ययन करने के बाद ही अंतिम निर्णय लेगी। हालांकि उन्होंने संकेत दिए कि यदि सभी राज्यों के साथ समान न्याय और लोकसभा सीटों में संतुलित वृद्धि का प्रावधान होगा, तो समर्थन पर विचार किया जा सकता है। उनके इस बयान को आगामी मानसून सत्र से पहले भारतीय जनता पार्टी के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

परिसीमन पर सुप्रिया सुले के बदले सुर!

दि राइजिंग न्यूज़ | मुंबई | 15 जुलाई 2026

महाराष्ट्र की राजनीति में परिसीमन विधेयक को लेकर नई राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने इस मुद्दे पर ऐसा बयान दिया है, जिसे भारतीय जनता पार्टी के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी बिना विधेयक का अध्ययन किए कोई अंतिम फैसला नहीं करेगी, लेकिन यदि सभी राज्यों के साथ समान न्याय सुनिश्चित किया गया और लोकसभा सीटों की वृद्धि संतुलित तरीके से की गई, तो समर्थन की संभावना पर विचार किया जा सकता है। ऐसे में आगामी मानसून सत्र से पहले यह विषय राष्ट्रीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हो गया है।


परिसीमन विधेयक पर भारतीय जनता पार्टी को मिल सकती है बड़ी राजनीतिक राहत

आगामी मानसून सत्र में केंद्र सरकार एक बार फिर परिसीमन विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने की तैयारी कर रही है। इससे पहले महाराष्ट्र से आई एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिक्रिया ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि उनकी पार्टी इस विधेयक का विरोध या समर्थन केवल राजनीतिक आधार पर नहीं करेगी, बल्कि पहले इसके प्रत्येक प्रावधान का गहन अध्ययन करेगी। उनके इस बयान को भारतीय जनता पार्टी के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है क्योंकि विपक्ष के भीतर पहली बार इस मुद्दे पर पूरी तरह नकारात्मक रुख दिखाई नहीं दिया।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि विपक्ष के कुछ प्रमुख दल परिसीमन विधेयक पर सकारात्मक रुख अपनाते हैं तो संसद में इस विधेयक को लेकर सरकार की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय विधेयक के वास्तविक स्वरूप और उसमें शामिल प्रावधानों पर ही निर्भर करेगा।


सुप्रिया सुले ने जनसंख्या आधारित परिसीमन पर जताई गंभीर चिंता

सुप्रिया सुले ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जाता है तो दक्षिण भारत के राज्यों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कई राज्यों ने वर्षों तक जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में प्रभावी कार्य किया है और यदि उन्हीं राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता है तो यह उनके साथ अन्याय होगा। इसलिए परिसीमन का आधार केवल जनसंख्या नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक राज्य की समान भागीदारी और सम्मान सुनिश्चित करना आवश्यक है। किसी भी संवैधानिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि देश के सभी क्षेत्रों को न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व देना होना चाहिए। इसी कारण उनकी पार्टी अंतिम निर्णय लेने से पहले विधेयक की पूरी रूपरेखा का अध्ययन करेगी।


पचास प्रतिशत सीट वृद्धि के प्रस्ताव पर क्या बोलीं सुप्रिया सुले

लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि पूरे देश में वर्तमान लोकसभा सीटों में लगभग पचास प्रतिशत की समान वृद्धि की जाती है तो इस प्रस्ताव पर सकारात्मक रूप से विचार किया जा सकता है। उनका कहना है कि यदि प्रत्येक राज्य की मौजूदा सीटों के अनुपात में समान वृद्धि होती है तो इससे किसी राज्य को नुकसान नहीं होगा और राजनीतिक संतुलन भी बना रहेगा।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल उनका व्यक्तिगत विचार नहीं होगा। इस विषय पर विपक्षी गठबंधन के सभी दलों से चर्चा की जाएगी और सामूहिक राय बनने के बाद ही पार्टी अपना आधिकारिक रुख घोषित करेगी। उनका मानना है कि इतना महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय सभी राजनीतिक दलों की सहमति से आगे बढ़ना चाहिए।


सर्वदलीय बैठक में कई विपक्षी दलों ने भी दिखाया सकारात्मक रुख

सुप्रिया सुले ने बताया कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित सर्वदलीय बैठक के दौरान परिसीमन के विभिन्न विकल्पों पर विस्तार से चर्चा हुई थी। इस बैठक में केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ही नहीं, बल्कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना सहित कई अन्य विपक्षी दलों ने भी कुछ प्रस्तावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी।हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बैठक में हुई चर्चा को अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। जब तक सरकार आधिकारिक रूप से अंतिम विधेयक संसद में प्रस्तुत नहीं करती, तब तक किसी भी दल की ओर से समर्थन या विरोध का स्पष्ट दावा करना उचित नहीं होगा। इसलिए सभी दल अंतिम मसौदे का इंतजार कर रहे हैं।


केंद्र सरकार का दावा- किसी भी राज्य के साथ नहीं होगा अन्याय

इस वर्ष अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने परिसीमन विधेयक, संविधान संशोधन विधेयक तथा केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किए थे। उस समय केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में स्पष्ट कहा था कि परिसीमन प्रक्रिया में किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं किया जाएगा, विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्यों की चिंताओं का पूरा ध्यान रखा जाएगा।उन्होंने यह भी कहा था कि वर्तमान में दक्षिण भारत से लोकसभा में जितने सांसद हैं, प्रस्तावित व्यवस्था के बाद उनकी संख्या पहले से अधिक होगी। सरकार का दावा है कि यह विधेयक किसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कम करने के लिए नहीं बल्कि बढ़ती जनसंख्या और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से लाया जा रहा है।


विपक्ष पहले से करता रहा है विरोध

परिसीमन विधेयक को लेकर विपक्षी दल पहले भी लगातार सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि यदि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन पूरी पारदर्शिता के साथ नहीं किया गया तो इसका राजनीतिक लाभ कुछ राज्यों या दलों को मिल सकता है। विपक्ष का कहना है कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए ताकि किसी भी राज्य के साथ भेदभाव की आशंका न रहे।विपक्ष यह भी चाहता है कि इस विषय पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाई जाए और सभी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाए। उनका मानना है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और संघीय व्यवस्था से जुड़ा विषय है।


मानसून सत्र पर टिकी देश की निगाहें

अब पूरे देश की निगाहें आगामी मानसून सत्र पर टिकी हुई हैं, जहां केंद्र सरकार एक बार फिर परिसीमन विधेयक प्रस्तुत कर सकती है। यदि सरकार राज्यों की चिंताओं को दूर करने वाले प्रावधान शामिल करती है तो कई विपक्षी दलों का रुख पहले की तुलना में बदल सकता है। वहीं यदि विवादित प्रावधान बरकरार रहते हैं तो संसद में इस विषय पर तीखी बहस और राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है।सुप्रिया सुले के हालिया बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्ष के भीतर भी इस मुद्दे पर पूरी तरह एक जैसी राय नहीं है। अंतिम विधेयक सामने आने के बाद ही यह तय होगा कि कौन-सा दल समर्थन करेगा और कौन विरोध करेगा। ऐसे में परिसीमन विधेयक आगामी दिनों में देश की राजनीति का सबसे चर्चित विषय बना रह सकता है।