पेट्रोल से पहले एथेनॉल से चलती थीं गाड़ियां, फिर अब इतना विवाद क्यों

पेट्रोल के प्रचलन से पहले दुनिया के कई हिस्सों में गाड़ियों के लिए एथेनॉल का उपयोग किया जाता था। अब भारत में एथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा दिए जाने के बाद इसके लाभ और नुकसान को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

पेट्रोल से पहले एथेनॉल से चलती थीं गाड़ियां, फिर अब इतना विवाद क्यों

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 15 जुलाई 2026

देश में एथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा देने की सरकारी नीति के बाद इस विषय पर व्यापक बहस शुरू हो गई है। सरकार का कहना है कि एथेनॉल के बढ़ते उपयोग से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी, किसानों की आय में वृद्धि होगी और वायु प्रदूषण पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा। दूसरी ओर बड़ी संख्या में वाहन मालिकों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या एथेनॉल मिश्रित ईंधन से उनकी गाड़ियों के इंजन, माइलेज और रखरखाव पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इन चर्चाओं के बीच यह जानना भी दिलचस्प है कि एक समय ऐसा था जब दुनिया में पेट्रोल नहीं, बल्कि एथेनॉल को ही मोटर वाहनों का प्रमुख ईंधन माना जाता था।

पेट्रोल से पहले एथेनॉल था गाड़ियों का सबसे भरोसेमंद ईंधन

मोटर वाहनों के शुरुआती दौर में एथेनॉल का उपयोग व्यापक रूप से किया जाता था। उस समय इसे सुरक्षित, स्वच्छ और आसानी से उपलब्ध ईंधन माना जाता था। कई शुरुआती वाहन निर्माताओं ने अपनी गाड़ियों को इस प्रकार तैयार किया था कि वे एथेनॉल पर आसानी से चल सकें। उस समय पेट्रोल का उत्पादन सीमित था और एथेनॉल को भविष्य का ईंधन माना जा रहा था। इसलिए शुरुआती वर्षों में परिवहन क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कच्चे तेल की खोज ने बदल दिया पूरा इतिहास

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में दुनिया के कई हिस्सों में कच्चे तेल के बड़े भंडार खोजे गए। इसके बाद पेट्रोल का उत्पादन पहले की तुलना में काफी आसान और सस्ता हो गया। धीरे-धीरे तेल उद्योग का तेजी से विस्तार हुआ और विभिन्न देशों ने भी पेट्रोल आधारित परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप एथेनॉल का उपयोग लगातार कम होता गया और पूरी दुनिया पेट्रोल तथा डीजल पर निर्भर होती चली गई।

एथेनॉल फिर चर्चा में क्यों आया

बीते कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, बढ़ते वायु प्रदूषण और जीवाश्म ईंधनों के सीमित भंडार ने दुनिया के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इन्हीं कारणों से कई देशों ने फिर से एथेनॉल जैसे वैकल्पिक ईंधनों की ओर ध्यान देना शुरू किया। भारत भी इसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार का उद्देश्य आयातित कच्चे तेल पर खर्च कम करना, किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत उपलब्ध कराना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है। इसी कारण देशभर में एथेनॉल मिश्रित ईंधन की उपलब्धता लगातार बढ़ाई जा रही है।

सरकार एथेनॉल को क्यों दे रही है बढ़ावा

सरकार का मानना है कि एथेनॉल का अधिक उपयोग देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बना सकता है। भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भारी खर्च होता है। यदि पेट्रोल में अधिक मात्रा में एथेनॉल मिलाया जाता है तो आयातित तेल की खपत कम होगी। इसके अलावा गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से एथेनॉल तैयार होने के कारण किसानों को भी अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ती है। यही कारण है कि सरकार इसे दीर्घकालिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है।

वाहन मालिकों की चिंता क्या है

एथेनॉल को लेकर सबसे अधिक चिंता पुराने वाहनों के मालिकों के बीच देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक मात्रा में एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कुछ पुराने इंजनों के धातु और रबर से बने पुर्जों पर प्रभाव डाल सकता है। हालांकि आधुनिक तकनीक से तैयार किए जा रहे अधिकांश नए वाहन एथेनॉल मिश्रित ईंधन के अनुरूप बनाए जा रहे हैं। फिर भी वाहन निर्माताओं द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक माना जाता है ताकि किसी प्रकार की तकनीकी समस्या से बचा जा सके।

माइलेज को लेकर क्यों हो रहा है विवाद

एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल की तुलना में कुछ कम मानी जाती है। इसी वजह से कुछ परिस्थितियों में एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग करने पर वाहन का माइलेज थोड़ा कम हो सकता है। यही कारण है कि कई वाहन चालक इस नीति को लेकर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। दूसरी ओर विशेषज्ञों का कहना है कि माइलेज में मामूली कमी के बदले प्रदूषण में कमी, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण जैसे दीर्घकालिक लाभों को भी ध्यान में रखना चाहिए। इसी संतुलन को लेकर देशभर में बहस जारी है।

क्या भविष्य में एथेनॉल बनेगा मुख्य ईंधन

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में पारंपरिक ईंधनों के साथ-साथ एथेनॉल और अन्य वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग लगातार बढ़ सकता है। हालांकि पूरी तरह एथेनॉल पर निर्भर होना अभी संभव नहीं माना जा रहा है, लेकिन पेट्रोल के साथ इसके मिश्रण का प्रतिशत बढ़ाकर ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। आने वाले समय में नई तकनीकों और आधुनिक इंजनों के विकास के साथ एथेनॉल की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।