पीएम मोदी ने बताया था दोस्त, तीन महीने में अखिलेश ने बदला रुख

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के महिला आरक्षण विधेयक को लेकर दिए गए पुराने और नए बयानों पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि अखिलेश यादव ने तीन महीने पहले जिस विधेयक का समर्थन किया था, अब उसी पर नई शर्तें रखकर अपना रुख बदल लिया है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी इसे सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की भागीदारी का मुद्दा बता रही है।

पीएम मोदी ने बताया था दोस्त, तीन महीने में अखिलेश ने बदला रुख

दि राइजिंग न्यूज़ | लखनऊ | 8 जुलाई 2026

महिला आरक्षण विधेयक पर फिर आमने-सामने आए भाजपा और सपा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला आरक्षण विधेयक एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच इस मुद्दे पर तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है। दोनों दल एक-दूसरे पर राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दों को बदलने और जनता को भ्रमित करने का आरोप लगा रहे हैं। इससे चुनावी माहौल और अधिक गर्म हो गया है।भाजपा नेताओं का कहना है कि समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पहले महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में दिखाई दिए थे, लेकिन अब उन्होंने इसके समर्थन को नई शर्तों से जोड़ दिया है। भाजपा इसे राजनीतिक अवसरवाद का उदाहरण बता रही है। पार्टी का दावा है कि जनता सब कुछ देख रही है और चुनाव में इसका जवाब देगी।


प्रधानमंत्री के पुराने बयान की फिर हो रही चर्चा

राजनीतिक विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह पुराना बयान भी फिर चर्चा में आ गया है, जिसमें उन्होंने संसद में अखिलेश यादव को अपना मित्र बताया था। उस समय महिला आरक्षण विधेयक को लेकर कई विपक्षी दलों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दी थीं। अब उसी प्रसंग को जोड़कर भाजपा यह सवाल उठा रही है कि आखिर कुछ ही महीनों में समाजवादी पार्टी का रुख क्यों बदल गया।भाजपा का कहना है कि यदि किसी विधेयक का समर्थन किया गया था तो अब उसके विरोध या नई शर्तों का क्या आधार है। पार्टी इसे मतदाताओं के सामने स्पष्ट करने की मांग कर रही है। इसी मुद्दे को लेकर चुनावी सभाओं में भी लगातार बयान दिए जा रहे हैं।


अखिलेश यादव ने रखीं तीन प्रमुख मांगें

समाजवादी पार्टी का कहना है कि वह महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रही है, बल्कि उसमें सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की मांग कर रही है। अखिलेश यादव ने कहा है कि पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को अलग से उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनके अनुसार बिना इस व्यवस्था के आरक्षण का पूरा उद्देश्य पूरा नहीं होगा।इसके साथ ही उन्होंने परिसीमन की प्रक्रिया और प्रतिनिधित्व के स्वरूप को लेकर भी अपनी बात रखी है। समाजवादी पार्टी का दावा है कि महिलाओं को अधिकार मिलने के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों की समान भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसी आधार पर पार्टी ने अपनी तीन प्रमुख मांगों को सामने रखा है।


भाजपा ने लगाए राजनीतिक लाभ लेने के आरोप

भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि समाजवादी पार्टी चुनावी परिस्थितियों को देखते हुए अपना राजनीतिक रुख बदल रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि पहले समर्थन और बाद में नई शर्तें जोड़ना जनता को भ्रमित करने का प्रयास है। पार्टी का दावा है कि यह बदलाव केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है।भाजपा का कहना है कि महिला आरक्षण विधेयक महिलाओं को राजनीतिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। ऐसे में इस पर अनावश्यक विवाद खड़ा करना उचित नहीं है। पार्टी लगातार इस मुद्दे को चुनावी सभाओं और जनसभाओं में प्रमुखता से उठा रही है।


समाजवादी पार्टी ने दिया अपना पक्ष

समाजवादी पार्टी का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी भी प्रकार से महिला आरक्षण का विरोध करना नहीं है। पार्टी के अनुसार उसकी मांग केवल इतनी है कि आरक्षण का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचे। पार्टी का दावा है कि पिछड़े वर्गों की महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिए बिना सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा।सपा नेताओं का कहना है कि उनकी मांग संविधान की भावना और सामाजिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप है। पार्टी का मानना है कि इस विषय पर व्यापक सहमति बनाकर आगे बढ़ना चाहिए ताकि सभी वर्गों का विश्वास बना रहे।


चुनावी माहौल में बढ़ी राजनीतिक बयानबाजी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। महिला आरक्षण विधेयक, सामाजिक न्याय, पिछड़ा वर्ग और परिसीमन जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में इन विषयों पर और अधिक राजनीतिक बयान सामने आने की संभावना है।विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के दौरान ऐसे मुद्दों का प्रभाव मतदाताओं पर पड़ सकता है। अब यह देखना होगा कि राजनीतिक दल अपने-अपने तर्कों से जनता को कितना प्रभावित कर पाते हैं और चुनावी परिणामों पर इन मुद्दों का कितना असर दिखाई देता है।