तीस्ता परियोजना से बढ़ी रणनीतिक चिंता
बांग्लादेश द्वारा तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना में चीन की भागीदारी की संभावनाओं ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल जल प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि सिलिगुड़ी कॉरिडोर और क्षेत्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 25 जून 2026
तीस्ता परियोजना पर बढ़ी क्षेत्रीय चर्चा
भारत, चीन और बांग्लादेश के बीच बहने वाली तीस्ता नदी एक बार फिर रणनीतिक और कूटनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। बांग्लादेश की सरकार ने तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट के लिए चीन से सहयोग की इच्छा जताई है। लगभग एक अरब डॉलर की इस परियोजना का उद्देश्य नदी प्रबंधन, ड्रेजिंग, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और स्थानीय विकास बताया जा रहा है।हालांकि भारत में इस परियोजना को केवल एक विकास कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा रहा। कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय भू-राजनीति से जुड़ा विषय मान रहे हैं।
क्या है तीस्ता परियोजना
बांग्लादेश लंबे समय से तीस्ता नदी के प्रबंधन और पुनर्विकास की योजना पर काम कर रहा है। परियोजना के तहत नदी के लगभग 102 किलोमीटर लंबे हिस्से में ड्रेजिंग, तटबंध निर्माण, सिंचाई नेटवर्क का विस्तार और कृषि सुधार जैसे कार्य प्रस्तावित हैं।ढाका का कहना है कि उत्तरी बांग्लादेश में हर वर्ष बाढ़ और जल संकट दोनों समस्याएं सामने आती हैं, इसलिए यह परियोजना स्थानीय विकास और जल प्रबंधन के लिए आवश्यक है।
क्यों अहम है सिलिगुड़ी कॉरिडोर
भारत की चिंता का मुख्य कारण परियोजना का भौगोलिक स्थान है। तीस्ता नदी का क्षेत्र भारत के उस संवेदनशील इलाके के निकट स्थित है जिसे सिलिगुड़ी कॉरिडोर या “चिकन नेक” कहा जाता है।यह संकरा भूभाग भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के मुख्य भूभाग से जोड़ता है। रेल मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, ईंधन आपूर्ति, संचार नेटवर्क और सैन्य रसद का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। किसी भी बड़े संकट या संघर्ष की स्थिति में इस कॉरिडोर का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
चीन की भूमिका पर नजर
भारतीय सुरक्षा विश्लेषकों की मुख्य चिंता चीन की संभावित भागीदारी को लेकर है। उनका तर्क है कि यदि परियोजना में चीन निवेश करता है तो बड़ी संख्या में चीनी इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ और सर्वेक्षण दल इस क्षेत्र में सक्रिय हो सकते हैं।ऐसी परियोजनाओं के दौरान भूगर्भीय, भौगोलिक और बुनियादी ढांचे से जुड़ी विस्तृत जानकारियां एकत्र की जाती हैं, जिनका भविष्य में रणनीतिक महत्व हो सकता है।
डुअल यूज इंफ्रास्ट्रक्चर की आशंका
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार विकास परियोजनाओं को “डुअल यूज इंफ्रास्ट्रक्चर” के रूप में देखा जाता है। इसका अर्थ है कि किसी परियोजना का उपयोग नागरिक और रणनीतिक दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि तीस्ता परियोजना के दौरान क्षेत्र से जुड़ी तकनीकी और भौगोलिक जानकारी चीन के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है।
डोकलाम की यादें फिर ताजा
वर्ष 2017 का डोकलाम गतिरोध आज भी भारत की सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाता है। उस समय चीन और भारत की सेनाएं लगभग 73 दिनों तक आमने-सामने रही थीं।डोकलाम विवाद ने सिलिगुड़ी कॉरिडोर की संवेदनशीलता को उजागर किया था। इसी कारण तीस्ता क्षेत्र में चीन की संभावित मौजूदगी को लेकर नई चर्चाएं शुरू हुई हैं।
बांग्लादेश का अलग दृष्टिकोण
बांग्लादेश का आधिकारिक रुख स्पष्ट है कि यह परियोजना पूरी तरह विकास, कृषि और जल प्रबंधन से जुड़ी है। वहां के अधिकारियों का कहना है कि तीस्ता नदी लाखों लोगों की आजीविका और सिंचाई की जरूरतों से जुड़ी हुई है।ढाका का दावा है कि परियोजना का उद्देश्य केवल क्षेत्रीय विकास और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है।
तीस्ता जल समझौते की भी चर्चा
भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से लंबित तीस्ता जल बंटवारा समझौता भी इस पूरे मुद्दे का एक महत्वपूर्ण पहलू है। उनका तर्क है कि यदि दोनों देशों के बीच यह समझौता पहले हो जाता, तो बाहरी भागीदारी की आवश्यकता कम हो सकती थी।पश्चिम बंगाल की राजनीति और जल बंटवारे के मुद्दे के कारण यह समझौता वर्षों से लंबित है।
भारत की नजर आगे की रणनीति पर
फिलहाल भारत सरकार की ओर से इस परियोजना पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और बांग्लादेश के बीच इस विषय पर आगे होने वाली बातचीत पर नई दिल्ली की नजर बनी रहेगी।परियोजना को लेकर चीन का अंतिम रुख और बांग्लादेश की आगे की नीति आने वाले समय में दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।