वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 पर केंद्र का जवाब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल, जानें क्या कहा सरकार ने

दि राइजिंग न्यूज। 25 अप्रैल 2025 ।  वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने अपना पक्ष साफ कर दिया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल करते हुए याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है।

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 पर केंद्र का जवाब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल, जानें क्या कहा सरकार ने

दि राइजिंग न्यूज। 25 अप्रैल 2025 । 

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने अपना पक्ष साफ कर दिया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल करते हुए याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है।

सरकार ने क्या कहा?

केंद्र सरकार ने बताया कि यह कानून किसी जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की 36 बैठकों के बाद बनाया गया। इन बैठकों में करीब 97 लाख हितधारकों से सुझाव और ज्ञापन लिए गए थे। इसके अलावा समिति ने देश के 10 प्रमुख शहरों का दौरा कर जनता से फीडबैक लिया।

कानून का उद्देश्य और तर्क

सरकार का कहना है कि वक्फ संपत्ति को सिर्फ मौखिक रूप से नहीं, बल्कि पंजीकरण के बाद ही वैध माना जाता रहा है। इसी प्रावधान को मजबूती देने के लिए संशोधन आवश्यक था।
इसके अलावा केंद्र ने स्पष्ट किया कि वक्फ बोर्ड में 22 सदस्यों में से अधिकतम दो गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे, जो सिर्फ समावेशिता का प्रतिनिधित्व करते हैं और इसका प्रशासन पर कोई हस्तक्षेप नहीं होगा

वक्फ संस्था: धार्मिक नहीं, वैधानिक

सरकार ने कहा कि वक्फ को कोई धार्मिक संस्था नहीं माना जाता, बल्कि यह एक वैधानिक निकाय है। वक्फ अधिनियम में मुतवल्ली (प्रबंधक) की भूमिका भी धर्मनिरपेक्ष है। यह कानून पूरी तरह से निर्वाचित प्रतिनिधियों की भावना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दर्शाता है।

सुप्रीम कोर्ट को क्या कहा गया?

सरकार ने तर्क दिया कि किसी एक प्रावधान पर आंशिक रूप से रोक नहीं लगाई जा सकती, बल्कि किसी कानून की न्यायिक समीक्षा करते हुए पूरा कानून ही स्थगित करना होता है
सरकार ने कोर्ट से आग्रह किया कि संसद द्वारा बहुमत से पारित कानून को कोर्ट में चुनौती देना दुर्भाग्यपूर्ण है, खासकर तब जब यह व्यापक विचार-विमर्श के बाद बना हो।

अब तक की स्थिति

यह कानून लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों से पारित हो चुका है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे मंजूरी दे दी है। कई सामाजिक संगठनों और नेताओं ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर अब सुनवाई जारी है।