बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश- गोवा SIR में हटे नाम जोड़ें:चुनाव आयोग को 10 दिन का समय दिया; 97 वोटर्स के नाम कटे थे

Nov 05, 2026 - 15:20
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बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश- गोवा SIR में हटे नाम जोड़ें:चुनाव आयोग को 10 दिन का समय दिया; 97 वोटर्स के नाम कटे थे
गोवा में मतदाता सूची से हटाए गए नाम फिर जोड़े जाएंगे। बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने गुरुवार को ECI को यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि निवास की पुष्टि के बाद याचिकाकर्ताओं के नाम 10 दिन में सूची में शामिल किए जाएं। ECI ने आदेश पर रोक लगाने की मांग की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। यह आदेश उन मतदाताओं की याचिकाओं पर आया, जिन्होंने नाम हटाए जाने और Form 8 आवेदन खारिज होने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि मतदाताओं का नाम हटाने से पहले उन्हें सुनवाई का मौका देना जरूरी है। चार दिन तक चली सुनवाई के बाद जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की डिवीजन बेंच ने गुरुवार को फैसला सुनाया। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा, “हमने याचिका मंजूर कर ली है। हमने यह मांग भी खारिज कर दी है कि SC के फैसले तक इस याचिका को लंबित रखा जाए। हम परमादेश जारी करते हैं और अधिकारी को निर्देश देते हैं कि निवास की पुष्टि के बाद 10 दिन में याचिकाकर्ताओं के नाम शामिल किए जाएं।” ECI की ओर से पेश वकील गौरीश अग्नि ने आदेश पर रोक लगाने की मांग की। कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। बेंच ने कहा, “कोई रोक नहीं। मतदाताओं के नाम सूची में शामिल करने पर रोक कैसे लगा सकते हैं! आप SC से रोक मांगिए।” कोर्ट ने ECI की मांग नहीं मानी ECI ने पहले कोर्ट से इस मामले की सुनवाई टालने की मांग की थी। उसने SC के उस आदेश का हवाला दिया था, जिसमें हाईकोर्ट से रिट कार्यवाही पर रोक रखने को कहा गया था। ECI ने कहा था कि गोवा की चुनौती में SIR की पूरी प्रक्रिया शामिल है। इसमें मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया भी आती है। हालांकि, हाईकोर्ट ने पहली नजर में माना कि गोवा का मामला अन्य जगहों पर चल रही SIR चुनौतियों से अलग है। बेंच ने कहा कि गोवा में संशोधन प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अपील खारिज होना शुरुआती तौर पर नाम हटाए जाने का नतीजा है। फॉर्म 8 आवेदन खारिज करने पर सवाल सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फॉर्म 8 में पता बदलने के आवेदनों को स्वचालित तरीके से खारिज करने पर ECI की आलोचना की। बेंच ने कहा कि पुराने निवास के लिए मतदाताओं से एन्यूमरेशन फॉर्म पर हस्ताक्षर कराने की शर्त उन्हें गलत घोषणा करने के लिए मजबूर करती है। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या इस तरह आवेदन अपने-आप खारिज करने से समावेशी मतदाता सूची का उद्देश्य कमजोर नहीं होता। बेंच ने सुझाव दिया कि आवेदनों को सीधे खारिज करने के बजाय लंबित रखा जाना चाहिए। इससे दूसरे स्थान पर जा चुके वास्तविक मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित होने से बचाया जा सकता है। फॉर्म 6 को लेकर भी कोर्ट की टिप्पणी कोर्ट ने SIR के नियमों को सही ठहराने के लिए जनभावना का हवाला देने पर ECI को फटकार लगाई। बेंच ने साफ कहा कि कानूनी कार्यवाही बाहरी जनधारणा नहीं, बल्कि कानून के आधार पर चलनी चाहिए। कोर्ट ने स्थान बदल चुके मतदाताओं के सामने “कैच-22” जैसी स्थिति का भी जिक्र किया। ऐसे मतदाताओं के फॉर्म 8 में पता बदलने के आवेदन खारिज हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें फॉर्म 6 भरने के लिए कहा जाता है। फॉर्म 6 में उन्हें यह घोषणा करनी पड़ती है कि वे किसी दूसरी जगह मतदाता के रूप में पंजीकृत नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि इससे वे अनुचित स्थिति में फंस जाते हैं। बेंच ने कहा कि कानून के तहत किसी मतदाता का नाम मूल सूची से हटाने से पहले उसे सुनवाई का मौका देना जरूरी है। SIR प्रक्रिया जारी रहने के दौरान इस जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। कोर्ट ने SIR के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने के औचित्य पर भी सवाल उठाया। बेंच ने कहा कि ECI की सबसे बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी योग्य नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित होने से बचाना है। ECI ने नाम हटाने को गैर-समावेशन बताया ECI की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आशुतोष कुंभकोणी ने दलील दी कि ड्राफ्ट SIR में नाम नहीं होना, नाम हटाना नहीं बल्कि नाम शामिल नहीं किया जाना है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची नए सिरे से तैयार की जाती है। पुरानी प्रविष्टियां अपने-आप आगे शामिल नहीं होतीं। उनके मुताबिक, ड्राफ्ट सूची केवल नए जमा किए गए एन्यूमरेशन फॉर्म के आधार पर तैयार की जाती है। इसलिए जिन लोगों का फॉर्म जमा नहीं हुआ, उनके पास Form 8 के जरिए रिकॉर्ड में बदलाव कराने का सक्रिय रिकॉर्ड नहीं होता। उन्होंने कहा कि जिन लोगों का नाम छूट गया है, उन्हें दावे और आपत्तियों की अवधि में फॉर्म 6 जमा करके नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराना होगा।

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