अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने रूस से खरीदा रिकॉर्ड कच्चा तेल, रियायत नहीं मिली
अमेरिकी दबाव और चेतावनियों के बावजूद भारत ने मई 2026 में रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चा तेल खरीदा। इस बार रूस ने भारत को पहले की तरह रियायती दरों पर तेल नहीं दिया, बल्कि अधिक कीमत वसूली। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक रही।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 10 जुलाई 2026
अमेरिकी दबाव और लगातार चेतावनियों के बावजूद भारत ने मई 2026 में रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चा तेल खरीदा। हालांकि इस बार रूस ने किसी प्रकार की रियायत नहीं दी और अन्य देशों की तुलना में अधिक कीमत वसूली। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक रही।
अमेरिकी दबाव के बीच भारत ने रूस से खरीदा रिकॉर्ड कच्चा तेल, रियायत नहीं मिली, रूस ने वसूली अधिक कीमत
भारत और रूस के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग लगातार मजबूत बना हुआ है। अमेरिका की ओर से लगातार दबाव और चेतावनियां दिए जाने के बावजूद भारत ने मई 2026 के दौरान रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल का आयात किया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक रही, जो पिछले लगभग दो वर्षों में सबसे अधिक मानी जा रही है। हालांकि इस बार भारत को पहले की तरह सस्ती दरों का लाभ नहीं मिला और रूस ने अपने तेल की कीमत बढ़ाकर अधिक राशि वसूली।
मई 2026 में रूस बना भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मई 2026 के दौरान भारत ने जितना कच्चा तेल विदेशों से खरीदा, उसमें सबसे बड़ा हिस्सा रूस से आया। रूस ने सऊदी अरब, इराक और अन्य प्रमुख तेल निर्यातक देशों को पीछे छोड़ते हुए भारत के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली। भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं और स्थिर आपूर्ति की जरूरत ने रूस से आयात को लगातार बढ़ावा दिया है। यही कारण है कि रूस की हिस्सेदारी कुल आयात में 40 प्रतिशत से अधिक पहुंच गई।
इस बार नहीं मिली किसी प्रकार की रियायत
रूस और यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद भारत को रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल मिल रहा था। इसी कारण भारत ने बड़े पैमाने पर रूसी तेल का आयात बढ़ाया था। लेकिन मई 2026 में स्थिति बदली हुई दिखाई दी। इस बार रूस ने भारत को किसी प्रकार की कीमत में छूट नहीं दी। इसके विपरीत उसने अपने तेल के लिए अधिक कीमत ली, जिससे यह संकेत मिला कि रूस अब व्यापारिक लाभ को प्राथमिकता दे रहा है।
अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने नहीं बदली नीति
अमेरिका की ओर से कई बार यह संकेत दिया गया कि रूस के साथ ऊर्जा व्यापार पर सावधानी बरती जाए। इसके बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए रूस से तेल खरीदना जारी रखा। भारत का लगातार कहना रहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है। इसी नीति के तहत भारत ने मई महीने में भी रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चा तेल खरीदा।
रूस ने बढ़ाया अपना आर्थिक लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार रूस ने भारत की बढ़ती मांग का पूरा लाभ उठाया। पहले जहां रूस रियायती दरों पर तेल देकर बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा था, वहीं अब उसने अधिक कीमत वसूलकर अपनी आय बढ़ाने पर ध्यान दिया। इससे यह भी संकेत मिलता है कि वैश्विक बाजार में मांग बढ़ने के कारण रूस अब कम कीमत पर तेल बेचने की स्थिति में नहीं है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस बना महत्वपूर्ण साझेदार
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातक देशों में शामिल है और अपनी आवश्यकता का अधिकांश हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में रूस भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। लगातार और पर्याप्त मात्रा में तेल उपलब्ध होने के कारण भारत अपनी घरेलू मांग को पूरा करने में सक्षम रहा है। हालांकि अधिक कीमत चुकाने से आयात लागत बढ़ सकती है, जिसका असर आगे चलकर ईंधन बाजार पर भी दिखाई दे सकता है।
आगे क्या रह सकती है स्थिति
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और रूस रियायत नहीं देता, तो भारत को अधिक आयात लागत का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर भारत अन्य देशों से भी तेल खरीदकर अपने आयात स्रोतों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करेगा। आने वाले महीनों में वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा बाजार की चाल पर भारत की रणनीति काफी हद तक निर्भर करेगी।