भूजल के अंधाधुंध दोहन से 31.5 इंच खिसका पृथ्वी का झुकाव
धरती के गर्भ से लगातार पानी निकालने की मानव गतिविधियों ने अब वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में दावा किया गया है कि अत्यधिक भूजल दोहन के कारण पृथ्वी के घूर्णन अक्ष में लगभग 31.5 इंच का बदलाव दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई तो भविष्य में पर्यावरणीय और जलवायु संबंधी चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
दि राइजिंग न्यूज़। नई दिल्ली। 06 जून 2026
धरती का संतुलन बिगाड़ रही इंसानी लापरवाही
मानव विकास, बढ़ती आबादी और कृषि उत्पादन की बढ़ती जरूरतों ने प्राकृतिक संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव पैदा कर दिया है। इसी दबाव का एक बड़ा उदाहरण भूजल का लगातार बढ़ता दोहन है। वैज्ञानिकों की हालिया शोध रिपोर्ट ने यह संकेत दिया है कि जमीन के भीतर मौजूद जल भंडारों से बड़े पैमाने पर पानी निकालने का असर अब पृथ्वी के भौतिक संतुलन पर भी दिखाई देने लगा है। शोध के अनुसार वर्ष 1993 से 2010 के बीच दुनिया भर में भारी मात्रा में भूजल निकाला गया। इस दौरान निकाले गए पानी की मात्रा इतनी अधिक थी कि पृथ्वी के द्रव्यमान वितरण में बदलाव दर्ज किया गया। इसी बदलाव के कारण पृथ्वी के घूर्णन अक्ष में लगभग 31.5 इंच का खिसकाव देखा गया। वैज्ञानिकों के अनुसार यह परिवर्तन भले ही आम लोगों को महसूस न हो, लेकिन यह पृथ्वी के प्राकृतिक तंत्र पर मानव गतिविधियों के प्रभाव का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
कैसे प्रभावित होता है पृथ्वी का संतुलन
विशेषज्ञों के मुताबिक भूजल पृथ्वी के भीतर एक निश्चित स्थान पर मौजूद रहता है और ग्रह के द्रव्यमान संतुलन में योगदान देता है। जब इस पानी को बड़े पैमाने पर बाहर निकाला जाता है और उसका उपयोग कृषि, उद्योग, घरेलू जरूरतों तथा अन्य गतिविधियों में किया जाता है, तो अंततः यह पानी नदियों, झीलों और समुद्रों में पहुंच जाता है। इस प्रक्रिया के कारण पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में वजन का वितरण बदल जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे किसी घूमती हुई वस्तु पर वजन का संतुलन बदलने से उसकी गति और दिशा प्रभावित हो सकती है, वैसे ही पृथ्वी के घूर्णन अक्ष पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
भारत और उत्तरी अमेरिका सबसे अधिक जिम्मेदार
अध्ययन में सामने आया है कि भारत और उत्तरी अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन पृथ्वी के झुकाव में आए बदलाव का प्रमुख कारण रहा है। भारत में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का उपयोग किया जाता है। कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। उत्तरी अमेरिका के कई क्षेत्रों में भी खेती, उद्योग और शहरी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर भूजल निकाला गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन दोनों क्षेत्रों में अत्यधिक जल दोहन ने पृथ्वी के द्रव्यमान संतुलन को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
समुद्र के बढ़ते जलस्तर से भी जुड़ा मामला
विशेषज्ञों के अनुसार भूजल दोहन का प्रभाव केवल पृथ्वी के झुकाव तक सीमित नहीं है। जब भूजल समुद्रों तक पहुंचता है तो वह वैश्विक समुद्री जलस्तर को बढ़ाने में भी योगदान देता है। पिछले कुछ दशकों में समुद्र के बढ़ते जलस्तर को लेकर दुनिया भर में चिंता व्यक्त की जाती रही है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने और भूजल दोहन को इसके प्रमुख कारणों में गिना जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भूजल का अनियंत्रित उपयोग समुद्री तटीय क्षेत्रों के लिए भी दीर्घकालिक खतरा पैदा कर सकता है।
क्या मानवता के लिए कोई तत्काल खतरा है
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि पृथ्वी के घूर्णन अक्ष में आया यह बदलाव तत्काल किसी बड़े विनाश या आपदा का संकेत नहीं है। इससे दिन और रात की अवधि में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं होगा और न ही पृथ्वी के सामान्य जीवन चक्र पर तत्काल असर पड़ेगा। हालांकि यह घटना एक गंभीर चेतावनी जरूर है कि मानव गतिविधियां अब पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करने लगी हैं। यदि प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन जारी रहा तो भविष्य में पर्यावरणीय असंतुलन और जल संकट की समस्याएं और गहरी हो सकती हैं।

भूजल संरक्षण ही समाधान
जल विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए व्यापक स्तर पर जल संरक्षण अभियान चलाने की जरूरत है। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग, जल बर्बादी पर नियंत्रण और जल संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन को प्राथमिकता देनी होगी। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो कई क्षेत्रों में जल संकट गंभीर रूप ले सकता है। इसके साथ ही पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभाव भी बढ़ सकते हैं।
वैज्ञानिकों की चेतावनी
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को मानव गतिविधियों और पृथ्वी के बीच संबंधों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत बताया है। उनका कहना है कि पृथ्वी की प्राकृतिक प्रणालियां आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं और किसी एक संसाधन का अत्यधिक दोहन दूरगामी प्रभाव पैदा कर सकता है। इसी कारण विशेषज्ञ अब टिकाऊ विकास, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग पर जोर दे रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सके।
प्रमुख बिंदु
• अत्यधिक भूजल दोहन से पृथ्वी का घूर्णन अक्ष लगभग 31.5 इंच खिसका।
• वर्ष 1993 से 2010 के बीच सबसे अधिक प्रभाव दर्ज किया गया।
• भारत और उत्तरी अमेरिका प्रमुख प्रभावित क्षेत्रों में शामिल।
• भूजल दोहन समुद्र के बढ़ते जलस्तर से भी जुड़ा हुआ है।
• वैज्ञानिकों ने जल संरक्षण को भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।
• विशेषज्ञों ने वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण पर जोर दिया।
• अध्ययन को मानव गतिविधियों के पृथ्वी पर बढ़ते प्रभाव का संकेत माना जा रहा है।