अल-नीनो का खतरा! अगले 3 महीने भारी पड़ सकते हैं
यूरोप की एक मौसम पूर्वानुमान संस्था की रिपोर्ट के अनुसार अगस्त, सितंबर और अक्टूबर के दौरान अल-नीनो का प्रभाव बढ़ सकता है। इससे भारत में मानसून कमजोर पड़ने, सामान्य से कम वर्षा होने तथा खेती, जलाशयों और पेयजल व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका व्यक्त की गई है। हालांकि अंतिम स्थिति आने वाले आधिकारिक मौसम पूर्वानुमानों पर निर्भर करेगी।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 14 जुलाई 2026
देशभर में मानसून की स्थिति को लेकर एक बार फिर चिंता गहराने लगी है। यूरोप की एक प्रमुख मौसम पूर्वानुमान संस्था की नवीनतम रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि अगस्त, सितंबर और अक्टूबर के दौरान अल-नीनो का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो सकता है। यदि यह पूर्वानुमान सही साबित होता है तो भारत के कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज होने की संभावना बढ़ सकती है। इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, पेयजल, जलाशयों, बिजली उत्पादन और देश की अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले तीन महीने मानसून की दिशा तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण महीने साबित हो सकते हैं।
क्या होता है अल-नीनो, कैसे बदल देता है पूरी दुनिया का मौसम
अल-नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म हो जाने की प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। जब समुद्र का तापमान बढ़ता है तो वातावरण में बनने वाली हवाओं और बादलों का संतुलन बदल जाता है। इसका प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देशों के मौसम पर दिखाई देता है। भारत में भी अल-नीनो का असर कई बार मानसून को कमजोर कर देता है, जिससे वर्षा का वितरण असंतुलित हो जाता है और कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनने लगती है।
अगस्त, सितंबर और अक्टूबर क्यों हैं सबसे महत्वपूर्ण महीने
मानसून के ये तीन महीने भारतीय कृषि और जल संसाधनों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसी अवधि में देश के अधिकांश हिस्सों में अच्छी वर्षा होने से खेतों में खड़ी खरीफ फसलों को पर्याप्त पानी मिलता है और बड़े जलाशय भी भरते हैं। यदि इन महीनों में सामान्य से कम वर्षा होती है तो खेती पर सीधा असर पड़ सकता है। धान, मक्का, सोयाबीन, दालें, कपास और गन्ने जैसी फसलें प्रभावित हो सकती हैं। इसके साथ ही भूजल स्तर में गिरावट और सिंचाई की समस्या भी बढ़ सकती है।
किसानों के सामने खड़ी हो सकती है नई चुनौती
भारत की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है और देश की कृषि व्यवस्था का बड़ा हिस्सा मानसून पर आधारित है। यदि अल-नीनो के कारण वर्षा कम होती है तो किसानों को बुवाई, सिंचाई और फसल उत्पादन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। कम वर्षा के कारण खेतों में नमी की कमी होगी, जिससे उत्पादन घटने की आशंका बढ़ जाएगी। इससे किसानों की आय पर असर पड़ सकता है और खाद्यान्न उत्पादन में भी कमी आ सकती है। कृषि विशेषज्ञ किसानों को जल संरक्षण, कम पानी वाली फसलों और वैज्ञानिक खेती के उपाय अपनाने की सलाह दे रहे हैं।
जल संकट और बिजली उत्पादन पर भी पड़ सकता है प्रभाव
यदि मानसून कमजोर रहता है तो देश के बड़े बांधों, नदियों और जलाशयों में अपेक्षित मात्रा में पानी नहीं पहुंच पाएगा। इससे पेयजल संकट गहरा सकता है और कई शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जलविद्युत परियोजनाओं के लिए भी पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होगा, जिससे बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कई राज्यों में सिंचाई परियोजनाओं पर भी दबाव बढ़ सकता है और किसानों को वैकल्पिक जल स्रोतों पर निर्भर होना पड़ सकता है।
मौसम वैज्ञानिक लगातार रख रहे हैं हर गतिविधि पर नजर
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अल-नीनो की तीव्रता समय के साथ बदल सकती है और इसका अंतिम प्रभाव कई अन्य मौसम संबंधी कारकों पर भी निर्भर करेगा। समुद्र की सतह के तापमान, हवाओं की दिशा, वायुमंडलीय दबाव और मानसूनी प्रणाली में होने वाले बदलावों का लगातार अध्ययन किया जा रहा है। भारतीय मौसम विभाग सहित दुनिया की कई मौसम एजेंसियां स्थिति पर चौबीसों घंटे नजर बनाए हुए हैं। आने वाले सप्ताहों में जारी होने वाले नए पूर्वानुमान मानसून की वास्तविक स्थिति को और स्पष्ट करेंगे।
सरकार ने तैयारियां तेज करने के दिए संकेत
संभावित मौसम परिवर्तन को देखते हुए सरकार और संबंधित विभागों ने जल संरक्षण तथा कृषि प्रबंधन को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते जल संचयन, सिंचाई व्यवस्था में सुधार और किसानों को आवश्यक सलाह देकर संभावित नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कई राज्यों में प्रशासन को भी जल प्रबंधन और आपदा तैयारी की योजनाओं को मजबूत करने की सलाह दी गई है, ताकि कम वर्षा की स्थिति बनने पर आम लोगों को अधिक कठिनाई का सामना न करना पड़े।
आने वाले सप्ताह होंगे बेहद अहम
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन मौसम की बदलती परिस्थितियों पर लगातार नजर रखना जरूरी है। यदि अल-नीनो का प्रभाव और अधिक मजबूत होता है तो मानसून के स्वरूप में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। ऐसे में किसानों, प्रशासन और आम नागरिकों को मौसम विभाग द्वारा जारी आधिकारिक पूर्वानुमानों का पालन करना चाहिए और जल संरक्षण जैसे उपायों को प्राथमिकता देनी चाहिए। अगले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि इस वर्ष का मानसून सामान्य रहेगा या अल-नीनो के प्रभाव से प्रभावित होगा।