10 साल में आधी हुई ₹100 की ताकत
पिछले एक दशक में बढ़ती महंगाई ने आम लोगों की जेब पर बड़ा असर डाला है। जो सामान 10 साल पहले 100 रुपये में मिल जाता था, उसकी कीमत आज 150 से 170 रुपये तक पहुंच चुकी है। इससे लोगों की खरीदने की क्षमता लगातार घटती जा रही है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 22 जून 2026
बढ़ती महंगाई ने बढ़ाई आम लोगों की चिंता
देश में महंगाई एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ती कीमतों ने आम आदमी के घरेलू बजट पर गहरा असर डाला है। चाहे रसोई का खर्च हो, ईंधन की कीमतें हों या रोजमर्रा की जरूरतों का सामान, लगभग हर क्षेत्र में लोगों को पहले की तुलना में अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।मई 2026 में जारी आंकड़ों के अनुसार खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.93 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि अप्रैल में यह 3.5 प्रतिशत थी। वहीं खाद्य महंगाई भी बढ़कर 4.8 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे साफ है कि खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
वैश्विक तनाव का भी पड़ा असर
वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनावों ने भी महंगाई को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ा, जिससे ईंधन की कीमतों में तेजी आई। ईंधन महंगा होने का असर परिवहन लागत पर पड़ता है और अंततः इसका प्रभाव खाद्य पदार्थों समेत लगभग सभी वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई देता है।भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी सीमित आय पर निर्भर है, महंगाई में मामूली वृद्धि भी करोड़ों लोगों के लिए आर्थिक दबाव बढ़ा देती है।
थोक महंगाई में भी बड़ा उछाल
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में थोक महंगाई दर 9.68 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि अप्रैल में यह 8.26 प्रतिशत थी। ईंधन, बिजली और खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने इस बढ़ोतरी में अहम भूमिका निभाई है।थोक महंगाई बढ़ने का असर धीरे-धीरे खुदरा बाजार तक पहुंचता है, जिससे आम उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।
आखिर महंगाई आपकी जेब को कैसे प्रभावित करती है
महंगाई का सीधा संबंध आपकी क्रय शक्ति से होता है। यदि किसी वस्तु की कीमत महंगाई के कारण बढ़ जाती है, तो उसी वस्तु को खरीदने के लिए आपको पहले से अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है।उदाहरण के तौर पर यदि किसी वस्तु की कीमत एक वर्ष पहले 100 रुपये थी और महंगाई दर 6 प्रतिशत बढ़ गई, तो अब वही वस्तु लगभग 106 रुपये में मिलेगी। इसका मतलब यह है कि आपके 100 रुपये की वास्तविक खरीद क्षमता कम हो गई है।
10 साल में कितना घटा ₹100 का मूल्य
भारत में पिछले 10 वर्षों के दौरान औसत महंगाई दर लगभग 5 से 7 प्रतिशत के बीच रही है। इसका असर यह हुआ कि जो वस्तु वर्ष 2016 में 100 रुपये में खरीदी जा सकती थी, उसकी कीमत आज लगभग 150 से 170 रुपये के बीच पहुंच चुकी है।दूसरे शब्दों में कहें तो आज के 100 रुपये की क्रय शक्ति 10 साल पहले के लगभग 50 से 70 रुपये के बराबर रह गई है। यानी आपकी जेब में मौजूद 100 रुपये पहले जितनी चीजें नहीं खरीद सकते।
2016 में 100 रुपये में क्या-क्या मिल जाता था
एक दशक पहले 100 रुपये की कीमत काफी अधिक मानी जाती थी। उस समय 100 रुपये में आम आदमी अपनी कई जरूरतें पूरी कर सकता था।100 रुपये में लगभग 2 लीटर दूध और ब्रेड का एक पैकेट खरीदा जा सकता था। इसके अलावा करीब 1.5 लीटर पेट्रोल भी मिल जाता था।मेट्रो शहरों में सामान्य नाश्ता या दोपहर का भोजन आराम से किया जा सकता था। कई सिनेमाघरों में एक मूवी टिकट भी 100 रुपये के भीतर उपलब्ध थी।राशन की बात करें तो 4 से 5 किलो आटा और 2 से 3 किलो सामान्य बासमती चावल भी खरीदे जा सकते थे।
2026 में 100 रुपये की स्थिति
आज तस्वीर काफी बदल चुकी है। 100 रुपये में मिलने वाली वस्तुओं की मात्रा और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुई हैं।वर्तमान समय में 100 रुपये में केवल लगभग 1 लीटर पेट्रोल ही खरीदा जा सकता है। किसी रेस्तरां में सामान्य नाश्ता करना भी कई जगह मुश्किल हो गया है।एक या दो कप चाय या कॉफी के साथ हल्का नाश्ता ही 100 रुपये में संभव हो पाता है। बासमती चावल की मात्रा घटकर लगभग 1.5 से 2 किलो रह गई है।दूध और ब्रेड जैसी बुनियादी वस्तुओं पर भी खर्च बढ़ गया है। अब 100 रुपये में केवल 1 लीटर दूध और एक ब्रेड पैकेट जैसी सीमित खरीदारी ही संभव है।
मध्यम वर्ग और गरीब परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित
महंगाई का सबसे अधिक असर निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। इन परिवारों की आय अक्सर महंगाई की गति से नहीं बढ़ती, जबकि खर्च लगातार बढ़ता रहता है।यही कारण है कि कई परिवारों को अपने मासिक बजट में कटौती करनी पड़ती है। मनोरंजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बचत जैसे क्षेत्रों पर इसका सीधा प्रभाव देखने को मिलता है।
भविष्य की चुनौती
यदि महंगाई नियंत्रित नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में आम लोगों की क्रय शक्ति और कमजोर हो सकती है। सरकार और केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती यह है कि विकास और मूल्य स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।बढ़ती महंगाई केवल कीमतों का मामला नहीं है, बल्कि यह आम लोगों के जीवन स्तर, बचत क्षमता और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। पिछले 10 वर्षों का अनुभव बताता है कि महंगाई धीरे-धीरे लोगों की जेब की ताकत को कम करती है और इसका असर समाज के हर वर्ग पर दिखाई देता है।