जंतर-मंतर आंदोलन का पूरा सच | 23 दिन की पूरी कहानी
जंतर-मंतर पर शुरू हुई भूख हड़ताल ने शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी। कई दिनों तक चले आंदोलन में छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। आंदोलन के दौरान स्वास्थ्य संकट, राजनीतिक समर्थन, संसद मार्च और प्रशासनिक कार्रवाई जैसे अनेक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 20 जुलाई 2026
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा प्रश्नपत्र लीक प्रकरण को लेकर शुरू हुआ आंदोलन वर्ष दो हजार छब्बीस के सबसे चर्चित जन आंदोलनों में शामिल हो गया। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में आरंभ हुई यह भूख हड़ताल धीरे-धीरे छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों का साझा मंच बन गई। आंदोलन के दौरान संसद मार्च, पुलिस कार्रवाई, अस्पताल में भर्ती, विपक्षी दलों का समर्थन और सरकार के रुख ने इसे राष्ट्रीय स्तर की बहस में बदल दिया। इस विशेष आलेख में आंदोलन के प्रत्येक महत्वपूर्ण पहलू को विस्तार से समझाया गया है।
जंतर-मंतर भूख हड़ताल का पूरा घटनाक्रम
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर अट्ठाईस जून दो हजार छब्बीस से प्रारंभ हुआ यह आंदोलन केवल एक भूख हड़ताल नहीं था, बल्कि देश की परीक्षा प्रणाली और शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवालों का प्रतीक बन गया। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा प्रश्नपत्र लीक प्रकरण के बाद देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच गहरा असंतोष था। इसी पृष्ठभूमि में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करने, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने और छात्रों के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। समय बीतने के साथ यह आंदोलन दिल्ली से निकलकर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया और विभिन्न सामाजिक तथा राजनीतिक संगठनों ने भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभाई।
आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई
अट्ठाईस जून दो हजार छब्बीस को सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की घोषणा की। उनका कहना था कि परीक्षा प्रणाली में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं ने लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को संकट में डाल दिया है और यदि समय रहते कठोर सुधार नहीं किए गए तो शिक्षा व्यवस्था पर जनता का विश्वास पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। आंदोलन की शुरुआत के समय कई छात्र संगठन भी उनके साथ आ गए और धरना स्थल पर लगातार लोगों की संख्या बढ़ने लगी।शुरुआती दिनों में आंदोलन का स्वर पूरी तरह छात्र हितों और शिक्षा सुधार पर केंद्रित रहा। धरना स्थल पर प्रतिदिन विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगने लगा। कई राज्यों से लोग स्वयं दिल्ली पहुंचकर इस आंदोलन में शामिल हुए और इसे राष्ट्रीय जन आंदोलन का स्वरूप मिलने लगा।
शुरुआत में भूख हड़ताल पर कितने लोग थे
आंदोलन की शुरुआत में सोनम वांगचुक के साथ तीन छात्र भी लगातार भूख हड़ताल पर बैठे थे। इन छात्रों ने बिना भोजन ग्रहण किए कई दिनों तक आंदोलन जारी रखा और अपनी मांगों पर अडिग रहे। छात्र संगठनों का कहना था कि यह संघर्ष केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।धरना स्थल पर प्रतिदिन हजारों समर्थक पहुंचते रहे, लेकिन सभी लोग भूख हड़ताल का हिस्सा नहीं थे। अधिकांश लोग धरने में शामिल होकर समर्थन व्यक्त करते थे, रैलियों में भाग लेते थे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करते थे। धीरे-धीरे यह आंदोलन केवल कुछ लोगों तक सीमित न रहकर एक व्यापक सामाजिक अभियान में बदल गया।
वर्तमान में आंदोलन की स्थिति क्या है
बीस जुलाई दो हजार छब्बीस तक लगातार तेईस दिनों तक भूख हड़ताल करने वाले तीनों छात्रों ने चिकित्सकीय सलाह के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया। छात्र संगठनों ने बताया कि लंबे समय तक भोजन न लेने के कारण उनका शारीरिक वजन काफी कम हो गया था तथा स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था। चिकित्सकों ने उन्हें तुरंत उपचार और पोषण लेने की सलाह दी।दूसरी ओर सोनम वांगचुक को अठारह जुलाई को प्रशासन द्वारा चिकित्सकीय देखभाल के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी उनके सहयोगियों ने दावा किया कि उन्होंने अपना अनशन समाप्त नहीं किया है। इस दौरान आंदोलन की जिम्मेदारी अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों ने संभाली तथा धरना स्थल पर विरोध प्रदर्शन लगातार जारी रहा।
आंदोलन में महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी कैसी रही
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें समाज के लगभग प्रत्येक वर्ग की भागीदारी देखने को मिली। महिला छात्राएं, शिक्षिकाएं, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता, गृहिणियां तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़ी महिलाएं बड़ी संख्या में आंदोलन में शामिल हुईं। उन्होंने मंच से संबोधन किया, धरना स्थल पर बैठकर समर्थन व्यक्त किया और शिक्षा सुधार की मांग को लगातार मजबूत किया।पुरुष विद्यार्थियों, पूर्व सैनिकों, अधिवक्ताओं, शिक्षकों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों, निजी क्षेत्र में कार्यरत युवाओं तथा विभिन्न राज्यों से आए नागरिकों ने भी बड़ी संख्या में आंदोलन में भाग लिया। कई परिवार अपने बच्चों के साथ धरना स्थल पर पहुंचे और इसे केवल राजनीतिक मुद्दा न मानकर भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा विषय बताया। इसी व्यापक सामाजिक भागीदारी ने आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
किन लोगों ने भूख हड़ताल समाप्त करने की अपील की
जैसे-जैसे सोनम वांगचुक और अन्य अनशनकारियों की स्वास्थ्य स्थिति गंभीर होती गई, वैसे-वैसे अनेक राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने उनसे भूख हड़ताल समाप्त करने की अपील की। सभी का कहना था कि उनका जीवन देश के लिए अधिक महत्वपूर्ण है और लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखने के लिए स्वस्थ रहना आवश्यक है।अपील करने वालों ने यह भी कहा कि आंदोलन का उद्देश्य समाज का ध्यान शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं की ओर आकर्षित करना था, जो काफी हद तक सफल हो चुका है। इसलिए अब स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए संवाद के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास किया जाना चाहिए। हालांकि आंदोलनकारी अपनी मांगों पर लगातार डटे रहे और जवाबदेही सुनिश्चित होने तक संघर्ष जारी रखने की बात कहते रहे।
यह आंदोलन कितने दिनों तक चला
अट्ठाईस जून से प्रारंभ हुई भूख हड़ताल बीस जुलाई तक तेईस दिनों का समय पूरा कर चुकी थी। इस दौरान आंदोलन में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं, जिनमें बड़े पैमाने पर जनसमर्थन, विपक्षी नेताओं का दौरा, पुलिस की कार्रवाई, अस्पताल में भर्ती, संसद मार्च और देशभर में समर्थन प्रदर्शन प्रमुख रहे।हर दिन आंदोलन का स्वरूप बदलता गया। प्रारंभ में यह केवल जंतर-मंतर तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे देश के विभिन्न राज्यों में भी समर्थन प्रदर्शन आयोजित किए जाने लगे। सामाजिक माध्यमों के जरिए लाखों लोगों ने इस आंदोलन का समर्थन किया और इसे शिक्षा सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।
किन राजनीतिक दलों ने समर्थन दिया
आंदोलन को अनेक विपक्षी राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त हुआ। विभिन्न दलों के नेताओं ने धरना स्थल पर पहुंचकर आंदोलनकारियों से मुलाकात की और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।विपक्षी दलों ने संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे को उठाने का आश्वासन दिया। कई नेताओं ने कहा कि छात्रों के भविष्य से जुड़े विषय पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और सभी दलों को मिलकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। इसी कारण आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख मुद्दा बन गया।
किन प्रमुख नेताओं ने जंतर-मंतर का दौरा किया
आंदोलन के दौरान अनेक प्रमुख राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने जंतर-मंतर पहुंचकर अपना समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने आंदोलनकारियों से मुलाकात कर उनकी स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी ली तथा सरकार से सकारात्मक संवाद शुरू करने की अपील की।नेताओं ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगेंगे तो युवाओं का विश्वास कमजोर होगा। इन दौरों के कारण आंदोलन को राष्ट्रीय समाचारों में लगातार प्रमुख स्थान मिलता रहा।
आंदोलन की प्रमुख मांगें क्या थीं
आंदोलन की शुरुआत राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा प्रश्नपत्र लीक की निष्पक्ष जांच, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई तथा शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की मांग से हुई थी। आंदोलनकारियों का कहना था कि केवल जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।समय के साथ आंदोलन की मांगों में कुछ परिवर्तन भी देखने को मिला। बाद के चरण में शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, संसद में इस विषय पर विस्तृत चर्चा, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था बनाने की मांग प्रमुख हो गई। आंदोलनकारियों ने कहा कि छात्रों का भविष्य किसी भी प्रकार की लापरवाही का शिकार नहीं होना चाहिए।
सरकार का रुख क्या रहा
सरकार की ओर से आंदोलन के दौरान औपचारिक वार्ता की कोई सार्वजनिक घोषणा सामने नहीं आई। प्रशासन का कहना था कि कानून व्यवस्था बनाए रखना और अनशनकारियों की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसी कारण स्वास्थ्य बिगड़ने पर सोनम वांगचुक को अस्पताल पहुंचाया गया।दूसरी ओर आंदोलनकारियों का आरोप था कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जा रहा है। उनका कहना था कि सरकार को केवल स्वास्थ्य संबंधी कदम उठाने के बजाय शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस निर्णय लेने चाहिए। यही कारण रहा कि आंदोलन लगातार चर्चा का विषय बना रहा और दोनों पक्षों के बीच मतभेद समाप्त नहीं हो सके।
आंदोलन का कुल प्रभाव कितना रहा
इस आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस छेड़ दी। सामाजिक माध्यमों पर लाखों लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी और अनेक नागरिक संगठनों ने भी इस मुद्दे का समर्थन किया। संसद मार्च और विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थन के कारण आंदोलन का प्रभाव और अधिक बढ़ गया।हालांकि आंदोलन की कुछ मांगों में समय के साथ बदलाव भी देखने को मिला, लेकिन इसने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आंदोलन ने सरकार, राजनीतिक दलों और समाज सभी को यह सोचने पर मजबूर किया कि प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए मजबूत और पारदर्शी व्यवस्था विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।