केरल हाईकोर्ट बोला- जजों में आपसी सम्मान जरूरी:उनके मत अलग हो सकते हैं, लेकिन कोई जज दूसरे से बड़ा नहीं

Oct 26, 2026 - 18:20
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केरल हाईकोर्ट बोला- जजों में आपसी सम्मान जरूरी:उनके मत अलग हो सकते हैं, लेकिन कोई जज दूसरे से बड़ा नहीं
केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जज कानून के सवालों पर अलग राय रख सकते हैं, लेकिन उनके रिश्ते में आपसी सम्मान और संयम जरूरी है। न्यायाधीशों के मत अलग हो सकते हैं, लेकिन कोई भी दूसरे से ऊपर नहीं है। जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस बसंत बालाजी की डिवीजन बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट के सभी जज समान दर्जे के होते हैं। किसी भी बेंच को दूसरी बेंच पर संस्थागत श्रेष्ठता का दावा नहीं करना चाहिए। कोच्चि में 26 अक्टूबर को जारी कोर्ट की प्रेस रिलीज के अनुसार, बेंच ने यह टिप्पणी तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक कर्मचारी की अपील पर 15 अक्टूबर के फैसले में की। कोर्ट ने लेबर कोर्ट को अनुशासनात्मक कार्रवाई की समय-सीमा बढ़ाने के आवेदन पर दो महीने में फिर से विचार करने का निर्देश दिया। ‘पीयर रेस्ट्रेंट’ को न्यायिक अनुशासन का आधार बताया डिवीजन बेंच ने ‘पीयर रेस्ट्रेंट’ को न्यायिक अनुशासन का बुनियादी हिस्सा बताया। कोर्ट ने कहा कि सभी जजों का दर्जा समान है और कोई बेंच दूसरी बेंच से संस्थागत रूप से बड़ी नहीं है। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले का हवाला देते हुए कहा कि न्यायपालिका की ताकत “अनुशासन से आती है, प्रभुत्व से नहीं।” कोर्ट ने कहा कि पीयर रेस्ट्रेंट केवल बाध्यकारी नजीरों के सिद्धांत तक सीमित नहीं है। इसमें बेंचों के बीच न्यायिक शिष्टाचार, आपसी सम्मान और सामंजस्य भी शामिल हैं। कोर्ट के अनुसार, न्यायिक फैसलों में एकरूपता और भरोसा बनाए रखने के लिए ये सिद्धांत जरूरी हैं। डिवीजन बेंच ने कहा, “कोई भी बेंच—चाहे वह संख्या में बड़ी हो या नहीं—दूसरी बेंच या उसके सदस्यों को पर्यवेक्षक की तरह यह सलाह, निर्देश या आलोचना नहीं कर सकती कि उन्हें कैसे काम करना है, कैसे व्यवहार करना है, या क्या कहना और दर्ज करना है।” अपील में फैसला बदलना, श्रेष्ठता का अधिकार नहीं कोर्ट ने कहा कि अपीलीय डिवीजन बेंच किसी सिंगल जज के निष्कर्ष से असहमत हो सकती है। वैध कारण होने पर वह फैसले को रद्द या उसमें बदलाव भी कर सकती है। हालांकि, किसी न्यायिक फैसले को सुधारने की शक्ति से उस जज पर श्रेष्ठता हासिल नहीं होती, जिसने फैसला दिया था। जजों ने समझाया कि सिंगल जज और डिवीजन बेंच, दोनों संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उसी हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र इस्तेमाल करते हैं। इंट्रा-कोर्ट अपील फैसले की अतिरिक्त न्यायिक जांच का मौका देती है। इससे सिंगल जज अपीलीय बेंच के अधीनस्थ नहीं हो जाता। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि चीफ जस्टिस का पद भी ‘प्राइमस इंटर पेरेस’ यानी बराबरों में प्रथम का होता है। मामला तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के कर्मचारी से जुड़ा ये टिप्पणियां तिरुवनंतपुरम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक के एक कर्मचारी की अपील पर आईं। कर्मचारी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की समय-सीमा बढ़ाने वाले लेबर कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। मामले की पिछली सुनवाई में एक डिवीजन बेंच ने एक खास मुद्दे पर विचार के लिए केस वापस भेजा था। इसके बाद सिंगल जज ने कहा था कि डिवीजन बेंच आमतौर पर किसी मामले को सिंगल जज के पास नए सिरे से विचार के लिए वापस नहीं भेजती। डिवीजन बेंच ने इस सामान्य सिद्धांत से सहमति जताई। हालांकि, उसने साफ किया कि किसी जरूरी मुद्दे पर विचार नहीं हुआ हो, तो मामला वापस भेजना संभव है। अगर किसी मुद्दे पर पहले ही गुण-दोष के आधार पर फैसला हो चुका है, तो अपीलीय बेंच को आमतौर पर खुद ही अपील पर फैसला करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जिस मुद्दे पर फैसला नहीं हुआ है, उसे वापस भेजने से पक्षकार को इंट्रा-कोर्ट प्रक्रिया के दोनों स्तरों पर उस मुद्दे पर सुनवाई का मौका मिलता है। लेबर कोर्ट के आदेश पर दोबारा विचार का निर्देश मूल विवाद पर डिवीजन बेंच ने लेबर कोर्ट की शक्ति को बरकरार रखा। कोर्ट ने माना कि लेबर कोर्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई की समय-सीमा बढ़ा सकता है। हालांकि, बेंच ने पाया कि समय बढ़ाते समय बैंक की देरी की वजह और कर्मचारी की आपत्तियों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया था। अपील मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने समय-सीमा बढ़ाने वाला आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने लेबर कोर्ट को आवेदन पर दो महीने के भीतर फिर से विचार करने का निर्देश दिया। 15 अक्टूबर का यह फैसला देशभर के हाईकोर्ट के लिए महत्वपूर्ण सिद्धांत बताता है। अपीलीय अधिकार से न्यायिक फैसलों में सुधार किया जा सकता है, लेकिन आपसी सम्मान और संयम जजों की उस बिरादरी को बनाए रखते हैं, जो मिलकर इस अधिकार का इस्तेमाल करती है।

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