लखनऊ में बेगम अख्तर की याद में संगीत समारोह:गुलशन भारती समेत कलाकारों ने गजलें और ठुमरी पेश की
लखनऊ में बेगम अख्तर की गजलों की गायकी का जादू शुक्रवार को एक बार फिर जीवंत हो उठा। गोमतीनगर स्थित उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ओर से संत गाडगे जी महाराज प्रेक्षागृह में आयोजित वार्षिक यादें समारोह में कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। गुलशन कुमार समेत कई कलाकारों ने ठुमरी की प्रस्तुति की। 'कलाकारों के साथ नवोदित गायकों को भी मंच दिया' कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलन और बेगम अख्तर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। मुख्य अतिथि वरिष्ठ गजल गायक युगांतर सिंदूर और विशिष्ट अतिथि कथक नृत्यांगना डॉ. पूर्णिमा पांडेय रहीं। संचालन समरीन ने किया। अकादमी की उपाध्यक्ष विभा सिंह ने कहा कि बेगम अख्तर की आवाज में दर्द और ठहराव का अनूठा संगम था। समारोह में स्थापित कलाकारों के साथ नवोदित गायकों को भी मंच दिया गया। गुलशन भारती ने बांधा समां उस्ताद गुलशन भारती ने बेगम अख्तर का प्रसिद्ध दादरा ‘कहूं कैसे शरम की है बात’ सुनाकर महफिल की शुरुआत की। इसके बाद ठुमरी ‘नैना रो रो हारे’ और अपनी लोकप्रिय गजल पेश की। तबले पर इल्माज हुसैन, सारंगी पर जीशान अब्बास, स्वरमंडल पर रजत मिश्रा और तानपुरे पर सुहैल अहमद खान ने संगत की। मशहूर शायरों की रचनाओं से सजी शाम अकादमी की संगीत प्रतियोगिता के विजेता अंकुश निर्मल ने बशीर बद्र की गजल ‘सर झुकाओगे तो पत्थर भी खुदा हो जाएगा’ और अमीक हनफी की रचना ‘मैं हवा हूं, कहां वतन मेरा’ सुनाई। रायबरेली के अंकुश भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं। स्वाती रिजवी ने मीर की उल्टी हो गईं सब तदबीरें, गालिब की ‘ये न थी हमारी किस्मत’ और मोमिन खान मोमिन की ‘वो जो हम में तुम में करार था’ पेश की। जिगर मुरादाबादी की ‘कोई ये कह दे गुलशन-गुलशन’ ने भी खूब तालियां बटोरीं। गिटार पर यश गुप्ता ने संगत की वहीं कुलतार सिंह ने परवीन शाकिर की ‘चेहरा मेरा था निगाहें उसकी’, जिगर मुरादाबादी की ‘बददुआ लोगों की बन-बन के दुआ लगती है’ और शकील बदायूनी की ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’ सुनाई। की-बोर्ड पर सचिन चौहान, तबले पर राजीव थापा और गिटार पर यश गुप्ता ने संगत की।
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