हैवानियत का आरोप: पैसे नहीं मिलने पर हड्डी तोड़ने का दावा

मुजफ्फरनगर की एक विधवा महिला ने जिला अस्पताल के डॉक्टर पर इलाज के नाम पर पैसे मांगने और बाद में गलत उपचार कर बेटी की हड्डी दोबारा तोड़ देने का गंभीर आरोप लगाया है। महिला का दावा है कि मुफ्त इलाज के आदेश के बावजूद उससे पैसे वसूले गए। मामले को लेकर मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने जांच के आदेश दिए हैं और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

हैवानियत का आरोप:  पैसे नहीं मिलने पर हड्डी तोड़ने का दावा

दि राइजिंग न्यूज़। मुजफ्फरनगर। 05 जून 2026

इलाज के नाम पर वसूली का आरोप

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया है। जिले की एक विधवा महिला ने जिला अस्पताल के एक डॉक्टर और अस्पताल कर्मियों पर इलाज के नाम पर अवैध वसूली, लापरवाही और अपनी नाबालिग बेटी के साथ गलत उपचार करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है और मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने जांच के आदेश दे दिए हैं। पीड़ित महिला रेशमा अपनी 14 वर्षीय मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटी को लेकर जिला कलेक्ट्रेट पहुंची और अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई। महिला का आरोप है कि सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज के सरकारी आदेशों के बावजूद उससे पैसे वसूले गए और बाद में इलाज में लापरवाही बरती गई, जिससे उसकी बेटी की हालत और बिगड़ गई।

विधवा महिला ने सुनाई दर्दभरी कहानी

पीड़िता रेशमा के अनुसार करीब डेढ़ महीने पहले उसकी बेटी के दाहिने पैर की हड्डी टूट गई थी। इलाज के लिए वह जिला अस्पताल पहुंची, जहां डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी। महिला का आरोप है कि ऑपरेशन से पहले अस्पताल कर्मचारियों ने उससे 25 हजार रुपये की मांग की। रेशमा ने बताया कि वह विधवा है और इतनी बड़ी रकम देने में सक्षम नहीं थी। जब उसने अपनी आर्थिक स्थिति बताई तो कथित रूप से इलाज करने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद उसने जिला प्रशासन से मदद की गुहार लगाई। महिला के अनुसार उसकी शिकायत पर जिलाधिकारी ने मामले का संज्ञान लिया और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को बच्ची का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। लेकिन इसके बावजूद अस्पताल कर्मियों ने उससे 8 हजार रुपये ले लिए और शेष राशि बाद में देने का दबाव बनाया।

ऑपरेशन के बाद बढ़ गई परेशानी

महिला का कहना है कि ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने कुछ दिनों बाद दोबारा जांच के लिए बुलाया था। निर्धारित समय पर वह अपनी बेटी को लेकर अस्पताल पहुंची। रेशमा का आरोप है कि जांच के दौरान डॉक्टर ने उसकी बेटी का घुटना जबरन मोड़ने की कोशिश की। इस दौरान बच्ची दर्द से जोर-जोर से चिल्लाने लगी और पैर से हड्डी टूटने जैसी आवाज सुनाई दी। महिला का दावा है कि घटना के बाद डॉक्टरों ने उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें वहां से जाने के लिए कह दिया।

एक्स-रे रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

पीड़िता के अनुसार अस्पताल से लौटने के बाद जब उन्होंने निजी स्तर पर एक्स-रे कराया तो उसमें हड्डी दोबारा टूटी हुई दिखाई दी। महिला का आरोप है कि जिस हड्डी को ऑपरेशन के जरिए जोड़ा गया था, वह दोबारा क्षतिग्रस्त हो गई। इसके बाद उसने कई वरिष्ठ चिकित्सकों और अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उसे कहीं से राहत नहीं मिली। घटना के बाद से बच्ची को लगातार दर्द और चलने-फिरने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

स्वास्थ्य विभाग पर उठे गंभीर सवाल

यह मामला सामने आने के बाद सरकारी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता और पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जिलाधिकारी द्वारा मुफ्त इलाज के आदेश जारी किए गए थे, तो फिर मरीज से पैसे क्यों लिए गए? साथ ही यदि महिला के आरोप सही साबित होते हैं तो यह न केवल चिकित्सकीय लापरवाही बल्कि मानवता के खिलाफ भी गंभीर मामला माना जाएगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों के साथ इस प्रकार की घटनाएं सामने आना बेहद चिंताजनक है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

सीएमओ ने दिए जांच के आदेश

मामले को लेकर मुजफ्फरनगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुनील तेवतिया का बयान भी सामने आया है। उन्होंने कहा कि अभी केवल एक पक्ष की बातें सामने आई हैं और बिना जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। हालांकि उन्होंने आश्वासन दिया कि पूरे मामले की गंभीरता से जांच कराई जाएगी। सीएमओ ने कहा कि यदि जांच में किसी डॉक्टर, कर्मचारी या अधिकारी की लापरवाही अथवा अनियमितता सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

फिलहाल पूरा मामला जांच के दायरे में है और स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। यदि महिला द्वारा लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। वहीं दूसरी ओर डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन की ओर से अभी तक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।