प्रदूषण से बढ़ रहे सीओपीडी के मरीज:धूम्रपान ही नहीं, अगरबत्ती और रसोई का धुआं भी सकता इस गंभीर बीमारी का खतरा

Nov 08, 2026 - 05:29
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प्रदूषण से बढ़ रहे सीओपीडी के मरीज:धूम्रपान ही नहीं, अगरबत्ती और रसोई का धुआं भी सकता इस गंभीर बीमारी का खतरा
आगरा में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण का असर अब लोगों के फेफड़ों पर भी दिखाई देने लगा है। सांस संबंधी बीमारियों के साथ सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) के मरीज भी सामने आ रहे हैं। एसएन मेडिकल कॉलेज के रेस्पिरेटरी विभाग के डॉक्टर जीबी सिंह के अनुसार, इन दिनों फेफड़ों की समस्याएं बढ़ रही हैं। सीओपीडी एक गंभीर बीमारी है, जिसे कई बार लोग सामान्य खांसी और सांस फूलने की समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। समय पर पहचान और इलाज नहीं मिलने पर यह बीमारी जानलेवा हो सकती है। इसका असर फेफड़ों के साथ दिल पर भी पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि सीओपीडी को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी है। कई बार बीमारी की पहचान भी समय पर नहीं हो पाती। धूम्रपान करने वाले और अधिक प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में इसका खतरा ज्यादा रहता है। हालांकि, जो लोग धूम्रपान नहीं करते, वे भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। घर में अगरबत्ती और धूपबत्ती का ज्यादा धुआं, रसोई में निकलने वाला धुआं, दिवाली की सफाई के दौरान उड़ने वाली धूल और लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहना भी इसके कारण बन सकते हैं। सीओपीडी के दो प्रमुख प्रकार, दोनों फेफड़ों को करते हैं प्रभावित सीओपीडी मुख्य रूप से दो तरह की समस्याओं से जुड़ी होती है। पहली क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, जिसमें फेफड़ों तक हवा पहुंचाने वाली नलियों में लंबे समय तक सूजन और बलगम बना रहता है। दूसरी एम्फाइसीमा, जिसमें फेफड़ों की छोटी वायु थैलियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और सांस लेने-छोड़ने की क्षमता प्रभावित होती है। कई मरीजों में दोनों तरह की समस्याएं एक साथ भी हो सकती हैं। लगातार खांसी, बलगम और सांस फूलना प्रमुख लक्षण सीओपीडी के शुरुआती लक्षणों में लंबे समय तक खांसी रहना, बार-बार बलगम आना, चलते समय या सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना, सीने में जकड़न और सांस लेते समय घरघराहट होना शामिल है। बीमारी बढ़ने पर थोड़ी सी मेहनत करने पर भी सांस फूलने लगती है। गंभीर स्थिति में आराम करते समय भी सांस लेने में परेशानी हो सकती है। गंभीर अवस्था में रेस्पिरेटरी फेलियर से हो सकती है मौत सीओपीडी की समस्या बढ़ने पर फेफड़ों की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाती है। ऐसे में फेफड़े शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाते और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालने में भी परेशानी होने लगती है। इस स्थिति को रेस्पिरेटरी फेलियर यानी सांस लेने की गंभीर विफलता कहते हैं। इसमें मरीज को सांस लेने के लिए ऑक्सीजन या वेंटिलेटर तक की जरूरत पड़ सकती है। समय पर उपचार नहीं मिलने पर यह स्थिति जानलेवा हो सकती है। 40 साल से अधिक उम्र के लोग बरतें सावधानी डॉक्टर जीबी सिंह ने बताया कि सीओपीडी की समस्या ज्यादातर 40 साल से अधिक उम्र के लोगों में देखने को मिलती है। बुजुर्गों को भी इस संबंध में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। सांस फूलने, दम घुटने, लगातार खांसी या बलगम आने जैसी परेशानी होने पर चिकित्सक को दिखाना चाहिए। इन लक्षणों को उम्र बढ़ने या सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज करना परेशानी भरा हो सकता है। समय पर जांच और इलाज से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। त्योहारी सीजन और निर्माण कार्य से बढ़ा खतरा डॉक्टर के अनुसार, इन दिनों आगरा की हवा खराब होने के साथ निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और त्योहारी सीजन में पटाखों का धुआं भी फेफड़ों के लिए नुकसानदायक है। इन कारणों से सीओपीडी के मरीजों की परेशानी बढ़ सकती है। उन्होंने बताया कि भारत में सीओपीडी से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी चिंताजनक है। उनके अनुसार, हर एक लाख की आबादी पर सालाना करीब 108 मौतें इस बीमारी से हो रही हैं।

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