संजय गुप्ता का ओटीटी प्रोजेक्ट रह गया अधूरा:‘स्कैंडल’ में अनिल कपूर, अक्षय खन्ना और नसीरुद्दीन शाह, सीक्वल में आर्यन खान की कहानी की थी तैयारी
बॉलीवुड फिल्ममेकर संजय गुप्ता का 30 अक्टूबर को निधन हो गया। वे इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट संजय सिंह की किताब 'क्रिमिनल्स इन यूनिफॉर्म' पर आधारित महत्वाकांक्षी वेब सीरीज बनाने की तैयारी कर रहे थे। इस प्रोजेक्ट से वे ओटीटी पर डेब्यू करने वाले थे। सीरीज में अक्षय खन्ना, अनिल कपूर, नसीरुद्दीन शाह, दिया मिर्जा, रोनित रॉय और महेश मांजरेकर जैसे कलाकारों के नाम तय किए गए थे। हालांकि, प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में कई मुश्किलें आ रही थीं। संजय सिंह ने दैनिक भास्कर से बातचीत में संजय गुप्ता के साथ पहली मुलाकात, ड्रीम प्रोजेक्ट की तैयारी, फिल्म इंडस्ट्री और ओटीटी पर दबाव और अधूरी रह गई योजनाओं के बारे में बताया। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश... सवाल: संजय गुप्ता से आपकी पहली मुलाकात कैसे हुई? 'क्रिमिनल्स इन यूनिफॉर्म' पर वेब सीरीज बनाने की शुरुआत कैसे हुई? जवाब: 'क्रिमिनल्स इन यूनिफॉर्म' यानी सीआईयू किताब मैंने लिखी थी। किताब काफी लोकप्रिय हुई थी और इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था। हम भी सोच रहे थे कि इस पर ओटीटी सीरीज बननी चाहिए। इसी बीच संजय गुप्ता की नजर किताब पर पड़ गई। वे एक दिन अपने बेटे के साथ साउथ मुंबई के मशहूर बुक स्टोर 'किताबखाना' गए थे। वहां उन्होंने किताब देखी, कुछ पन्ने पढ़े और खरीद ली। घर जाकर पूरी किताब पढ़ी। अगली सुबह उन्होंने अपनी टीम से दोनों लेखकों को ढूंढकर संपर्क करने के लिए कहा। उनकी टीम में पीआर का काम देखने वाले अमित अंशु ने हमसे संपर्क किया। हम उनसे मिलने पहुंचे और महज 24 घंटे के भीतर संजय गुप्ता ने पूरी डील फाइनल कर दी। किताब की कहानी उन्हें बहुत पसंद आई थी। इसमें देश के सबसे अमीर उद्योगपति के घर के बाहर विस्फोटकों से भरी एक गाड़ी मिलती है। बाद में उस गाड़ी से जुड़े इकलौते शख्स की हत्या हो जाती है। जांच में पता चलता है कि इस मामले के पीछे पुलिस के ही कुछ लोग शामिल थे। संजय गुप्ता ऐसी ही कहानी की तलाश में थे। सवाल: संजय गुप्ता के साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा? जवाब: संजय गुप्ता को अंडरवर्ल्ड और अपराध की दुनिया की बहुत गहरी जानकारी थी। वे मुंबई ही नहीं, दुनिया भर में हुए अपराधों और अंडरवर्ल्ड से जुड़ी किताबें पढ़ते थे। क्राइम की इतनी जानकारी रखने वाले फिल्ममेकर बहुत कम मिलेंगे। हम पत्रकारों को अक्सर लगता है कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग किसी विषय को सतही तौर पर समझते हैं, लेकिन संजय गुप्ता के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं था। उनसे बातचीत में मुझे भी काफी कुछ सीखने को मिला। वे छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देते थे। पहली मुलाकात में उन्होंने मेरी किताब में ओल्ड मोंक के बारे में लिखा एक पैराग्राफ पढ़ा था। मैं अपनी हर किताब में ओल्ड मोंक के लिए एक पैराग्राफ जरूर लिखता हूं। उन्होंने पहले से ओल्ड मोंक मंगाकर रखी थी। मीटिंग खत्म होने पर बताया कि आपकी किताब में पढ़ा था कि आप इसके बारे में लिखते हैं, इसलिए मंगाकर रखी है। इससे उनकी बारीकियों पर ध्यान देने की आदत का पता चलता है। सवाल: इस वेब सीरीज के लिए संजय गुप्ता की क्या योजना थी? इसकी स्टारकास्ट भी काफी बड़ी थी। जवाब: संजय गुप्ता ओटीटी पर अपना डेब्यू बड़े स्तर पर करना चाहते थे। उन्होंने किताब के आधार पर एक पिच डेक तैयार किया था, जिसमें सीरीज के एपिसोड और कलाकारों की जानकारी थी। इसे देखकर मैं और मेरे सह-लेखक राकेश द्विवेदी हैरान रह गए। सीरीज में मुख्य किरदार अक्षय खन्ना निभाने वाले थे। नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर की भूमिका नसीरुद्दीन शाह और पुलिस कमिश्नर महावीर का किरदार अनिल कपूर निभाने वाले थे। दिया मिर्जा, रोनित रॉय, महेश मांजरेकर और अतुल कुलकर्णी भी इसका हिस्सा बनने वाले थे। संजय गुप्ता चाहते थे कि भारतीय ओटीटी दर्शकों ने इतनी बड़ी स्टारकास्ट पहले किसी सीरीज में न देखी हो। उनका कहना था कि हर एपिसोड को एक फिल्म की तरह शूट किया जाएगा। उन्होंने शुरुआती दो एपिसोड की स्क्रिप्ट भी लिख ली थी और मुझे ईमेल की थी। वे इसे जल्दबाजी में नहीं बनाना चाहते थे। उनका कहना था कि यह उनकी जिंदगी का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट होगा, जिसे पूरा समय लेकर बड़े स्तर पर तैयार किया जाएगा। सवाल: क्या यह सीरीज 'स्कैंडल' नाम की किसी फ्रेंचाइजी का हिस्सा बनने वाली थी? जवाब: हां, संजय गुप्ता की योजना 'स्कैंडल' नाम से एक फ्रेंचाइजी शुरू करने की थी। इसके तहत अलग-अलग घटनाओं और सच्ची कहानियों पर आधारित सीजन बनाए जाने थे। पहले सीजन के लिए उन्होंने हमारी किताब 'क्रिमिनल्स इन यूनिफॉर्म' चुनी थी। ओटीटी प्लेटफॉर्म अक्सर पूछते हैं कि पहला सीजन सफल होने पर अगला सीजन किस कहानी पर बनेगा। इसी सिलसिले में संजय गुप्ता हमसे सीआईयू का दूसरा पार्ट लिखने के लिए कहते थे। सवाल: सीआईयू के दूसरे सीजन के लिए वे किस घटना पर काम करना चाहते थे? जवाब: वे शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान से जुड़े ड्रग्स केस पर दूसरा सीजन बनाना चाहते थे। उस समय आर्यन खान की गिरफ्तारी और उससे जुड़ी घटनाएं काफी चर्चा में थीं। संजय गुप्ता का मानना था कि इस मामले में कई दिलचस्प पहलू हैं। वे चाहते थे कि हम सीआईयू पार्ट-2 लिखें और पहले इसके राइट्स उन्हें दे दें, किताब बाद में लिखें। हमने उस किताब पर लिखना शुरू तक नहीं किया था, इसलिए यह बात हैरान करने वाली थी। वे कहते थे कि इस मामले पर शाहरुख खान से भी बात करेंगे और अपनी पूरी स्क्रीनप्ले उनके साथ साझा करेंगे, ताकि कहानी के दोनों पक्ष सही तरीके से सामने आ सकें। सवाल: क्या संजय गुप्ता ने आपकी दूसरी किताबों के भी राइट्स लिए थे? जवाब: हां, उन्होंने हमारी एक और किताब 'रंगा-बिल्ला' के राइट्स भी लिए थे। यह किताब हाल ही में हार्पर कॉलिंस से 'रंगा-बिल्ला: नेशन एम्बुश' नाम से प्रकाशित हुई है। इसे लिखने में मेरे सह-लेखक राजीव संथानम की अहम भूमिका रही है। वे वरिष्ठ पत्रकार हैं और 1978 में रंगा-बिल्ला की घटना के समय रिपोर्टिंग कर रहे थे। उन्होंने 1974 में अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान का इंटरव्यू भी किया था। रंगा-बिल्ला मामले में उनकी रिपोर्टिंग बेहद अहम थी। उन्होंने रंगा-बिल्ला की तस्वीर खोजकर प्रकाशित की थी, जिससे उनकी पहचान सामने आई और उन्हें पकड़ने में मदद मिली। संजय गुप्ता का मानना था कि लोगों को रंगा-बिल्ला की घटना तो पता है, लेकिन उसके पीछे की पूरी कहानी और मुंबई के अंडरवर्ल्ड से उसके संबंधों के बारे में बहुत कम जानकारी है। सवाल: क्या आपकी किताब 'क्रिमिनल्स इन यूनिफॉर्म' एंटीलिया के बाहर विस्फोटकों से भरी गाड़ी मिलने की घटना से प्रेरित थी? जवाब: कोई पत्रकार और लेखक अपने आसपास हो रही घटनाओं से खुद को अलग नहीं रख सकता। हम पत्रकारिता करते हैं, इसलिए वास्तविक घटनाओं से ही हमारी कहानियों को प्रेरणा मिलती है। हालांकि, किताब में हमने स्पष्ट डिस्क्लेमर दिया था कि इसके किरदार वास्तविक लोगों पर आधारित नहीं हैं। हमने एक बुकमार्क भी रखा था, जिसमें किरदारों और वास्तविक पुलिस अधिकारियों के बीच अंतर बताया गया था। किताब का पुलिस कमिश्नर महावीर तोमर परमबीर सिंह नहीं हैं। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दिलीप वर्मा प्रदीप शर्मा नहीं हैं। नित्या शेट्टी दया नायक नहीं हैं और यतीन साठे सचिन वाजे नहीं हैं। कहानी को वास्तविक घटनाओं से प्रेरणा जरूर मिली थी, लेकिन किरदार काल्पनिक थे। सवाल: 30 अक्टूबर को जब आपको संजय गुप्ता के निधन की खबर मिली तो आपका पहला रिएक्शन क्या था? जवाब: सबसे पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ। हमारे एक मित्र फिल्म प्रोडक्शन से जुड़े हैं। उनकी कंपनी का नाम भी ओल्ड मोंक है। उन्होंने सबसे पहले मुझे मैसेज करके यह खबर दी। मैंने उनसे कहा कि एक बार पुष्टि कर लेते हैं। इसके बाद मैंने अपने सह-लेखक राकेश द्विवेदी को फोन किया। उन्होंने भी अलग-अलग जगहों से जानकारी जुटाई। जब खबर की पुष्टि हुई तो बहुत दुख हुआ। यह उनके जाने की उम्र नहीं थी। उनसे बातचीत होती रहती थी और उनकी सेहत को लेकर ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ था कि वे इतनी जल्दी चले जाएंगे। उनके साथ बिताया गया समय हमेशा याद रहेगा। सवाल: क्या इस प्रोजेक्ट पर काम करते हुए संजय गुप्ता को किसी तरह का दबाव महसूस होता था? जवाब: हां, उन्होंने एक से ज्यादा बार इस बारे में बात की थी। हम पत्रकार किताब लिखते हैं तो थोड़े अधीर रहते हैं। उनसे मिलकर पूछते थे कि प्रोजेक्ट कितना आगे बढ़ा, कब शुरू होगा और कब रिलीज होगा। इस पर वे कहते थे कि तुम फिल्म इंडस्ट्री के डायनामिक्स को नहीं समझते। इस प्रोजेक्ट पर बहुत दबाव है। एक बार उन्होंने कहा था कि देश का सबसे अमीर आदमी, ताकतवर पुलिस अधिकारी और प्रभावशाली राजनेता, सभी किसी न किसी तरह इस कहानी से जुड़े हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि दबाव सिर्फ उन पर नहीं, बल्कि ओटीटी प्लेटफॉर्म और कलाकारों पर भी है। सवाल: क्या आपको लगता है कि इस दबाव का उनकी सेहत पर भी असर पड़ा होगा? जवाब: किसी व्यक्ति की सेहत पर दबाव का कितना असर पड़ा, इसे मेडिकल तौर पर समझना अलग बात है। लेकिन मानसिक स्तर पर इसका असर जरूर पड़ता है। सोचिए, कोई फिल्ममेकर अपनी जिंदगी का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बना रहा हो। उसने बड़ी स्टारकास्ट की योजना बनाई हो और काफी मेहनत की हो, लेकिन इसके बावजूद प्रोजेक्ट आगे न बढ़ पा रहा हो। ऐसी स्थिति में निराशा, गुस्सा और हताशा होना स्वाभाविक है। संजय गुप्ता के साथ भी ऐसा था। वे अपने मन की बात खुलकर कहते थे। उनसे मिलने पर थोड़ी देर बाद ही इन मुद्दों पर बात करने लगते थे। सवाल: क्या उन्होंने बताया था कि वे इस सीरीज को किस ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज करना चाहते थे? जवाब: उन्होंने खास तौर पर दो प्लेटफॉर्म का जिक्र किया था- सोनी लिव और नेटफ्लिक्स। हालांकि, वे दूसरे प्लेटफॉर्म से भी बातचीत कर रहे थे। वे बड़े बजट की सीरीज बनाना चाहते थे। छोटे बजट में कामचलाऊ तरीके से कोई प्रोजेक्ट नहीं बनाना चाहते थे। उनके एक्शन सीक्वेंस भी बड़े स्तर के होते थे। ओटीटी प्लेटफॉर्म को बजट और दूसरे पहलुओं पर विचार करना पड़ता है, इसलिए प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में समय लग रहा था। सवाल: क्या इस तरह के संवेदनशील विषयों पर ओटीटी प्लेटफॉर्म भी दबाव महसूस करते हैं? जवाब: बिल्कुल। आपको याद होगा कि 'तांडव' वेब सीरीज को लेकर काफी विवाद हुआ था। उसके बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म राजनीतिक विषयों पर आधारित कंटेंट को लेकर सतर्क हो गए थे। जब किसी एक सीरीज को लेकर विवाद होता है तो दूसरे प्लेटफॉर्म भी सतर्क हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं उनके साथ भी ऐसा न हो जाए। इस तरह के विषयों पर फिल्म बनाने में कई चुनौतियां होती हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म, कलाकार, फिल्म इंडस्ट्री और फिल्ममेकर, सभी पर अलग-अलग तरह का दबाव आता है। संजय गुप्ता जानते थे कि यह विषय संवेदनशील है, इसके बावजूद वे इस पर काम करना चाहते थे। इसके लिए हिम्मत चाहिए। सवाल: संजय गुप्ता के निधन के बाद क्या इस प्रोजेक्ट के भविष्य को लेकर उनकी टीम या परिवार से कोई बातचीत हुई है? जवाब: नहीं, अभी इस बारे में बात करना ठीक नहीं होगा। यह घटना हाल ही में हुई है। किसी परिवार में इस तरह का नुकसान होता है तो उस समय फिल्म, ओटीटी और वेब सीरीज जैसी चीजें मायने नहीं रखतीं। थोड़ा वक्त बीतने के बाद ही इस बारे में सोचा जा सकता है कि आगे क्या करना है। फिलहाल परिवार के दुख को समझना और उनका सम्मान करना ज्यादा जरूरी है। सवाल: संजय गुप्ता की कौन-सी बात आपको सबसे ज्यादा याद रहेगी? जवाब: संजय गुप्ता अपने आप में क्राइम की एक इनसाइक्लोपीडिया थे। उनके पास अपराध और अंडरवर्ल्ड से जुड़ी इतनी कहानियां और जानकारियां थीं कि आप उनके साथ बैठकर घंटों बातें कर सकते थे। एक बार मैंने उनसे नारकोटिक्स पर बात की थी। उन्हें अलग-अलग ड्रग्स और उनके प्रभावों के बारे में भी गहरी जानकारी थी। वे अपने आप में कहानियों और जानकारियों का खजाना थे। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अंडरवर्ल्ड और एक्शन को इतनी गहराई से समझने वाले लोग बहुत कम हैं। उनके साथ काम करने वाले कलाकार बार-बार उनके साथ काम करना चाहते थे। वे लोगों से आसानी से घुल-मिल जाते थे। उनसे मिलकर कभी ऐसा नहीं लगा कि हम किसी फिल्मी दुनिया के बड़े आदमी से बात कर रहे हैं। वे सामान्य तरीके से बातचीत करते थे। सवाल: आपने संजय गुप्ता, संजय दत्त और महेश मांजरेकर से जुड़ा एक पुराना ऑडियो टेप भी सामने लाया था। इस बारे में कुछ बताइए। जवाब: यह करीब 2003-04 की बात है। उस समय संजय दत्त, महेश मांजरेकर, संजय गुप्ता और एक अन्य व्यक्ति के बीच फोन पर हुई बातचीत का एक ऑडियो टेप काफी चर्चा में आया था। उस समय मैं एनडीटीवी में काम करता था। मैंने ही उस ऑडियो टेप को खोजकर सबसे पहले टीवी पर दिखाया था। करीब 20 साल बाद, जब मैं 'क्रिमिनल्स इन यूनिफॉर्म' के सिलसिले में संजय गुप्ता से पहली बार मिला, तो मैंने उन्हें खुद बता दिया कि वह ऑडियो टेप मैंने ही सामने लाया था। मुझे लगा था कि शायद उन्हें यह बात बुरी लगेगी। लेकिन संजय गुप्ता ने इसे सामान्य तरीके से लिया। उन्होंने कहा कि उस बातचीत में उनकी कोई खास भूमिका नहीं थी। वहां उन्हें जबरदस्ती फोन पकड़ा दिया गया था और वे सिर्फ हां-हूं करके बातचीत खत्म कर रहे थे। इतना पुराना मामला जानने के बावजूद उन्होंने मेरे साथ अपने रिश्ते पर उसका असर नहीं पड़ने दिया। यह बात मुझे हमेशा याद रहेगी। सवाल: संजय दत्त से भी आपकी मुलाकात हुई थी? जवाब: हां, लेकिन वह मुलाकात संजय गुप्ता के किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में नहीं थी। मैं क्राइम रिपोर्टर रहा हूं। 1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद संजय दत्त आर्थर रोड जेल में थे। उस दौरान कोर्ट की कार्यवाही कवर करने के लिए हमें वहां जाना पड़ता था। संजय दत्त भी उस मामले में आरोपी थे, इसलिए उनकी पेशी और कोर्ट से जुड़ी गतिविधियों के दौरान कई बार मुलाकात हुई थी। सवाल: संजय गुप्ता से आपकी आखिरी बातचीत कब हुई थी? जवाब: उनसे मेरी आखिरी बातचीत कुछ महीने पहले हुई थी। उस समय 'राख' नाम की एक वेब सीरीज आई थी, जो अंडरवर्ल्ड से जुड़ी कहानी पर आधारित थी। चूंकि संजय गुप्ता के पास हमारी किताब के राइट्स पहले से थे, इसलिए इस बात पर चर्चा हुई कि आगे क्या किया जाए। उनका मानना था कि 'राख' में दिखाई गई कई बातें तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थीं। वे इस मामले की वास्तविकता को अच्छी तरह जानते थे और हमारी किताब की कहानी पर पूरा भरोसा था। वे चाहते थे कि रंगा-बिल्ला की घटना के पीछे की पूरी कहानी लोगों तक पहुंचे। उन्होंने मुझसे कहा था कि किताब प्रकाशित होने पर उन्हें एक कॉपी जरूर देना। अब किताब प्रकाशित हो चुकी है, लेकिन संजय गुप्ता हमारे बीच नहीं हैं। यह बात हमेशा खलेगी। सवाल: 'क्रिमिनल्स इन यूनिफॉर्म' को लेकर आखिरी बार उनसे कब और क्या बातचीत हुई थी? जवाब: इस प्रोजेक्ट को लेकर बातचीत होती रही थी, लेकिन दबाव की वजह से उन्हें इसे आगे बढ़ाने का रास्ता नहीं मिल पा रहा था। वे इसे बनाने के लिए बहुत उत्साहित थे और काफी मेहनत कर रहे थे। वे बेहद जुनूनी फिल्ममेकर थे। उन्हें कहानी पर पूरा भरोसा था, लेकिन कई बाहरी परिस्थितियां शायद प्रोजेक्ट को आगे बढ़ने नहीं दे रही थीं। यह अफसोस की बात है कि जिस प्रोजेक्ट को लेकर उन्होंने इतनी बड़ी योजना बनाई थी, उसे पूरा होते हुए हम नहीं देख पाए।
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