सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी से नई बहस

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के खराब चरित्र का प्रमाण नहीं हो सकते। अदालत ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले में उम्मीदवार को राहत देते हुए कहा कि हर संबंध का विवाह में बदलना आवश्यक नहीं है और केवल विवाह न होने के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी से नई बहस

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 9 जून 2026

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के खराब चरित्र का प्रमाण नहीं माने जा सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून वयस्कों को अपनी पसंद के संबंध बनाने की स्वतंत्रता देता है और केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति की नैतिकता या चरित्र पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने तेलंगाना पुलिस भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की।

पुलिस भर्ती से जुड़ा था मामला

मामला एक ऐसे उम्मीदवार से संबंधित था जिसका चयन पुलिस कांस्टेबल पद के लिए हो चुका था, लेकिन उसके खिलाफ पहले दर्ज एक आपराधिक मामले के आधार पर भर्ती रद्द कर दी गई थी। उम्मीदवार पर विवाह का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। हालांकि बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और मामला अदालत के बाहर सुलझा लिया गया था। इसके बावजूद तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने उम्मीदवार को खराब चरित्र वाला बताते हुए नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था।

उम्मीदवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

भर्ती रद्द होने के बाद उम्मीदवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। उसने कहा कि मामले का निपटारा काफी पहले हो चुका है और उसके खिलाफ कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए उम्मीदवार को राहत प्रदान की और तेलंगाना उच्च न्यायालय के एकल पीठ के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें भर्ती बोर्ड को नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था।

अदालत ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध अपने आप में किसी व्यक्ति के चरित्र के खराब होने का आधार नहीं हो सकते। पीठ ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो वयस्कों को आपसी सहमति से संबंध बनाने से रोकता हो। इसलिए केवल ऐसे संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति को चरित्रहीन कहना उचित नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

अदालत के सामने प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार उम्मीदवार का अपनी पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ संबंध था। बाद में दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ और विवाह का वादा करके दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया गया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और वर्ष 2015 में लोक अदालत के माध्यम से मामले का निपटारा भी कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया कि मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत आरोप स्थापित नहीं किए गए थे।

भर्ती रद्द करना उचित नहीं

पीठ ने कहा कि जब मामला समझौते के जरिए समाप्त हो चुका था और उम्मीदवार के खिलाफ कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ था, तब केवल पुराने आरोपों के आधार पर भर्ती रोकना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार में उम्मीदवारों का मूल्यांकन निष्पक्ष और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल आरोपों के आधार पर।

हर संबंध विवाह में नहीं बदलता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण सामाजिक टिप्पणी भी की। अदालत ने कहा कि हर संबंध का अंत विवाह में हो, यह आवश्यक नहीं है। पीठ ने कहा कि केवल इसलिए कि कोई संबंध विवाह तक नहीं पहुंचा, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है।

चरित्र पर सवाल उठाने का आधार नहीं

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी संबंध का विवाह में परिवर्तित न होना किसी व्यक्ति के खराब चरित्र का प्रमाण नहीं माना जा सकता। न्यायाधीशों ने कहा कि आधुनिक समाज में वयस्कों को अपने व्यक्तिगत संबंधों के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है और ऐसे मामलों में पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना उचित नहीं होगा।

भर्ती प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण फैसला

 यह फैसला भविष्य में सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेगा। अदालत ने संकेत दिया है कि केवल आरोपों या व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर किसी उम्मीदवार को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके खिलाफ कोई गंभीर अपराध सिद्ध न हुआ हो।

सामाजिक और कानूनी महत्व

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, वयस्कों के अधिकार और रोजगार के अवसरों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकता है और व्यक्तिगत संबंधों को लेकर समाज में मौजूद कई पूर्वाग्रहों पर भी नई बहस को जन्म दे सकता है।