‘तनखैया’ मामला : आजम खान की याचिका पर मांगा जवाब:हाईकोर्ट ने न्यायालय का अभिलेख तबल किया, सरकार दो हफ्ते में दे जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को वर्ष 2019 के ‘तनखैया’ भाषण मामले में पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों से जवाब मांगा है।
न्यायालय ने राज्य सरकार एवं अन्य प्रतिवादियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद आजम खान को अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय मिलेगा। न्यायालय से अभिलेख मंगाए न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकल पीठ ने आजम खान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन.आई. जाफरी, व अधिवक्ता शाश्वत आनंद एवं शशांक तिवारी, तथा राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता (AAG) वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी को सुनने के बाद पुनरीक्षण याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली। न्यायालय ने मामले का अधीनस्थ न्यायालय का अभिलेख (लोअर कोर्ट रिकार्ड) भी तलब किया है। क्या है पूरा मामला? यह मामला 9 अप्रैल 2019 को लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान रामपुर जिले के ग्राम मनकरा में आजम खान द्वारा दिए गए एक कथित भाषण से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, अपने भाषण में आजम खान ने तत्कालीन जिलाधिकारी एवं अन्य सरकारी अधिकारियों को ‘तनखैया’ (वेतनभोगी कर्मचारी) कहकर संबोधित किया था और लोगों से कहा था कि वे कलेक्टर से डरें नहीं।
उन्होंने कथित तौर पर बसपा प्रमुख मायावती की ऐसी तस्वीरों का भी उल्लेख किया था, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी उनके जूते साफ करते दिखाई दे रहे थे। आजम खान ने कथित रूप से टिप्पणी की थी कि वह इन अधिकारियों से भी ऐसा ही करवाएंगे। अभियोजन का आरोप था कि इन टिप्पणियों के जरिए सरकारी अधिकारियों के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया और विभिन्न वर्गों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा दिया गया। इस मामले में तत्कालीन उपजिलाधिकारी, टांडा, घनश्याम त्रिपाठी ने 15 अप्रैल 2019 को शिकायत दर्ज कराई थी। इसके आधार पर प्रारंभ में थाना सिविल लाइंस, रामपुर में मुकदमा अपराध संख्या 312/2019 दर्ज किया गया। बाद में मामले को थाना भोट स्थानांतरित कर दिया गया, जहां इसे मुकदमा अपराध संख्या 128/2019 के रूप में दर्ज किया गया। पुलिस ने 17 मई 2019 को आरोपपत्र दाखिल किया। आजम खान के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 153-A, 153-B और 505(2) तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125 के तहत अभियोजन चलाया गया। ये धाराएं विभिन्न वर्गों के बीच वैमनस्य फैलाने, राष्ट्रीय एकीकरण के प्रतिकूल आरोप एवं कथन करने तथा चुनाव के संबंध में वैमनस्य को बढ़ावा देने से संबंधित हैं। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी दो-दो साल की सजा 16 मई 2026 को रामपुर स्थित विशेष न्यायाधीश (एम.पी./एम.एल.ए.) एवं प्रथम अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आजम खान को चारों प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने प्रत्येक अपराध के लिए दो वर्ष का साधारण कारावास और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हालांकि, सभी कारावास की सजाएं साथ-साथ चलाने का आदेश दिया गया था। आजम खान ने इस फैसले को आपराधिक अपील संख्या 32/2026 के माध्यम से चुनौती दी थी। हालांकि, रामपुर के विशेष न्यायाधीश (एम.पी./एम.एल.ए.) एवं अपर सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या 2 ने 18 जुलाई 2026 को अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा एवं दोषसिद्धि बरकरार रखी। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में वर्तमान आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की है। हाईकोर्ट में दोषसिद्धि को दी गई चुनौती पुनरीक्षण याचिका में आजम खान की ओर से दलील दी गई है कि अभियोजन के आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने की स्थिति में भी कथित भाषण को समग्रता में और उसके राजनीतिक संदर्भ में देखने पर उन अपराधों के आवश्यक वैधानिक तत्व स्थापित नहीं होते, जिनके तहत उन्हें दोषी ठहराया गया है। उनका कहना है कि भाषण चुनाव प्रचार के दौरान जिला प्रशासन एवं सरकारी अधिकारियों के कामकाज की राजनीतिक आलोचना तक सीमित था। इसमें किसी धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के विरुद्ध कोई टिप्पणी अथवा विभिन्न वर्गों के बीच घृणा या वैमनस्य फैलाने की अपील नहीं थी। भाषण खुद नहीं सुना याचिका में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता और वैधानिक ग्राह्यता पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि शिकायतकर्ता एवं अभियोजन के गवाह घनश्याम त्रिपाठी ने जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि उन्होंने स्वयं कथित भाषण नहीं सुना था और उन्हें वीडियो के मूल अपलोडर, उसके स्रोत अथवा उस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जानकारी नहीं थी, जहां से वीडियो प्राप्त किया गया था। इसके अतिरिक्त, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B के तहत प्रस्तुत प्रमाणपत्र पर भी आपत्ति उठाई गई है। याचिका के अनुसार, यह प्रमाणपत्र थाना सिविल लाइंस में दर्ज मूल मुकदमा अपराध संख्या 312/2019 से संबंधित था, जबकि आजम खान को अंततः थाना भोट में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 128/2019 में दोषी ठहराया गया। धर्म, जाति या समुदाय के विरुद्ध नहीं आजम खान की ओर से यह भी दलील दी गई है कि अभियोजन के गवाहों ने मुकदमे के दौरान ऐसी महत्वपूर्ण स्वीकारोक्तियां की थीं, जिनसे स्पष्ट होता है कि कथित भाषण में किसी धर्म, जाति या समुदाय के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। इसके बावजूद अधीनस्थ न्यायालयों ने संबंधित अपराधों के आवश्यक वैधानिक तत्वों की स्वतंत्र रूप से जांच किए बिना सरकारी अधिकारियों की आलोचना को विभिन्न वर्गों के बीच वैमनस्य फैलाने के अपराध के रूप में मान लिया। पुनरीक्षण याचिका में दोनों अधीनस्थ न्यायालयों के फैसलों को निरस्त कर आजम खान को सभी आरोपों से बरी किए जाने की मांग की गई है। हाईकोर्ट ने अब राज्य सरकार एवं अन्य प्रतिवादियों को दो सप्ताह में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद आजम खान को प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है। मामले में अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को होगी।
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