होर्मुज पर निर्भरता घटाने की तैयारी: गुजरात से ओमान तक समुद्र के नीचे बिछेगी पाइपलाइन
भारत और ओमान के बीच समुद्र के भीतर ऊर्जा पाइपलाइन परियोजना को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। यह परियोजना होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और तेल-गैस आपूर्ति को अधिक सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 9 जून 2026
होर्मुज पर निर्भरता घटाने की तैयारी
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर लगातार बनी हुई अनिश्चितता के बीच भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। भारत और ओमान के बीच समुद्र के भीतर एक गहरी समुद्री पाइपलाइन बिछाने की योजना पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। यह परियोजना वर्षों से चर्चा में रही है, लेकिन अब क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों के कारण इसे नई प्राथमिकता मिली है।
गुजरात से सीधे जुड़ेगा ओमान
प्रस्तावित परियोजना के तहत ओमान से गुजरात तट तक समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछाई जाएगी। इस पाइपलाइन के माध्यम से प्राकृतिक गैस और भविष्य में अन्य ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति सीधे भारत तक पहुंचाई जा सकेगी। यह परियोजना भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है क्योंकि इससे ऊर्जा आयात के लिए समुद्री जहाजों पर निर्भरता कम होगी।
क्यों अहम है यह परियोजना
वर्तमान में भारत को मिलने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव, क्षेत्रीय संघर्षों और समुद्री सुरक्षा से जुड़े खतरों ने कई बार वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर चिंता बढ़ाई है। ऐसे में भारत लंबे समय से ऐसे विकल्पों की तलाश कर रहा था जो ऊर्जा आपूर्ति को अधिक सुरक्षित और स्थिर बना सकें।
तीन दशक पुराना विचार
भारत और ओमान के बीच समुद्री पाइपलाइन का विचार नया नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार इस परियोजना पर लगभग तीन दशक से चर्चा होती रही है। हालांकि तकनीकी जटिलताओं, भारी लागत और समुद्र की अत्यधिक गहराई जैसी चुनौतियों के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी थी। अब आधुनिक तकनीक और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के कारण परियोजना को फिर से गति मिलने की संभावना बढ़ गई है।
दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण परियोजनाओं में होगी शामिल
अरब सागर के नीचे पाइपलाइन बिछाना एक अत्यंत जटिल इंजीनियरिंग कार्य माना जाता है। समुद्र के कई हिस्सों में गहराई हजारों मीटर तक पहुंचती है। ऐसी परिस्थितियों में पाइपलाइन निर्माण के लिए उन्नत तकनीक, विशेष सामग्री और अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना पूरी होने पर यह दुनिया की सबसे बड़ी और चुनौतीपूर्ण गहरे समुद्री ऊर्जा परियोजनाओं में शामिल हो सकती है।
भारत को क्या होगा फायदा
इस परियोजना से भारत को कई रणनीतिक और आर्थिक लाभ मिल सकते हैं। ऊर्जा आपूर्ति अधिक सुरक्षित होगी। भू-राजनीतिक संकटों का असर कम होगा। आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आने का जोखिम घटेगा। दीर्घकालिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी। ऊर्जा आयात के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होगा। भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और ऊर्जा मांग को देखते हुए यह परियोजना भविष्य की जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
ओमान के लिए भी बड़ा अवसर
ओमान लंबे समय से भारत का विश्वसनीय ऊर्जा साझेदार रहा है। यदि यह परियोजना साकार होती है तो ओमान को अपने ऊर्जा निर्यात के लिए एक स्थायी और विशाल बाजार मिलेगा। इसके अलावा दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक संबंध भी और मजबूत होंगे।
ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का बड़ा फोकस
हाल के वर्षों में भारत रूस, ब्राजील, वेनेजुएला, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर लगातार काम कर रहा है।भारत की नीति स्पष्ट है कि किसी एक क्षेत्र या मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति मार्गों का विविधीकरण किया जाए। गुजरात से ओमान तक प्रस्तावित समुद्री पाइपलाइन इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।
भविष्य की दिशा तय करेगी परियोजना
फिलहाल परियोजना को लेकर तकनीकी, वित्तीय और कूटनीतिक स्तर पर विचार-विमर्श जारी है। यदि यह योजना सफल होती है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। आने वाले वर्षों में यह परियोजना भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक ऊर्जा पहलों में से एक बन सकती है।