कपसाड़ कांड: कल से अदालत में खुलेगी जुर्म की परतें:43 गवाहों पर टिकीं निगाहें, वादी-प्रतिवादी पक्ष के अपने-अपने दावे, रूबी की गवाही होगी अहम
मेरठ कपसाड़ कांड में शुक्रवार 23 अक्टूबर से मुकदमे का ट्रायल शुरू होने जा रहा है। करीब साढ़े नौ महीने पहले हुई इस वारदात ने मेरठ के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति और सामाजिक माहौल को प्रभावित करने का काम किया था। खेत पर काम करने जा रही सुनीता जाटव की हत्या और उनकी बेटी रूबी को अगवा किए जाने के आरोपों के बाद गांव में तनाव फैल गया था। अब इस मामले में अदालत के सामने गवाहों के बयान दर्ज होने की प्रक्रिया शुरू होगी। वादी पक्ष को उम्मीद है कि पीड़िता रूबी और घटनास्थल पर मौजूद बताई जा रही दो बच्चियों की गवाही आरोपी पारस सोम के खिलाफ मुकदमे को मजबूती देगी। वहीं, बचाव पक्ष का दावा है कि उसके पास ऐसे पर्याप्त साक्ष्य हैं, जिनके आधार पर वह अभियोजन की कहानी को चुनौती देगा। दोनों पक्षों के दावों के बीच अब अदालत में साक्ष्यों की परीक्षा होगी। रूबी की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता रियासत अली का कहना है कि अभियोजन पक्ष की दावेदारी मजबूत है। वह बताते हैं कि मुकदमे में 43 गवाह हैं, जिनकी गवाही घटना की कड़ियों को जोड़ने में महत्वपूर्ण होगी। इनमें रूबी के अलावा वारदात के समय मौके पर मौजूद बताई जा रही दो बच्चियों के बयान भी अहम होंगे। गवाहों की गवाही के साथ उपलब्ध दस्तावेजी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर घटना की पूरी तस्वीर अदालत के सामने रखी जाएगी। रियासत अली के मुताबिक- अदालत पहले भी आरोपी की उम्र और घटना से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सुनवाई कर चुकी है। ऐसे में अब ट्रायल के दौरान उन सभी तथ्यों की जांच होगी, जिन पर अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच विवाद है। प्रतिवादी पक्ष के अपने दावे
आरोपी पारस सोम के अधिवक्ता बलराम सोम का कहना है कि वह अदालत में मजबूती से मुकदमा लड़ेंगे। उनका दावा है कि पारस और रूबी पिछले पांच साल से संपर्क में थे और दोनों शादी करना चाहते थे। घटना वाले दिन रूबी अपनी मर्जी से पारस के साथ गई थी, उसे जबरन अगवा नहीं किया गया था। साक्ष्य इसकी पुष्टि करेंगे। बचाव पक्ष का कहना है कि वह परत-दर-परत घटनाक्रम को अदालत के सामने रखेगा और अभियोजन की ओर से पेश किए जाने वाले साक्ष्यों की जिरह के माध्यम से जांच करेगा। इस पक्ष की कोशिश होगी कि गवाहों के बयानों और उपलब्ध दस्तावेजों में किसी भी विरोधाभास को अदालत के सामने लाया जाए। दोनों पक्षों की दलीलों में सबसे बड़ा अंतर यही है कि रूबी के जाने की परिस्थितियां क्या थीं और सुनीता की मौत किन परिस्थितियों में हुई। इन सवालों का अंतिम जवाब अदालत में पेश साक्ष्यों से ही निकलेगा। 8 जनवरी की सुबह हुई थी वारदात
कपसाड़ गांव में 8 जनवरी 2026 को सुनीता जाटव अपनी बेटी रूबी के साथ खेत पर काम करने जा रही थीं। आरोप है कि इसी दौरान गांव का रहने वाला पारस सोम रूबी को अपने साथ ले गया। सुनीता ने इसका विरोध किया तो उन पर धारदार हथियार से हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल सुनीता को परिजन अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उनकी मौत हो गई। 48 घंटे में पारस व रूबी को बरामद कर लिया गया था। रूबी परिजनों के साथ लौट गई थी जबकि पारस सोम को कोर्ट ने जेल भेज दिया था। कई दिन तक गांव में तनाव रहा। उम्र पर भी अदालत में चली लंबी कानूनी लड़ाई
इस मामले में ट्रायल तक पहुंचने से पहले आरोपी की उम्र को लेकर भी लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। पारस पक्ष ने दावा किया कि घटना के समय वह नाबालिग था और मुकदमे की सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड में होनी चाहिए। इस दलील के आधार पर मामले की पत्रावली किशोर न्याय बोर्ड को भेजी गई थी। वादी पक्ष ने उसकी उम्र को लेकर सवाल उठाए और मेडिकल परीक्षण सहित अन्य तथ्यों के आधार पर आयु निर्धारण की मांग की। कोर्ट में साबित हुआ, बालिग था पारस
10 जून 2026 को किशोर न्याय बोर्ड ने मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर पारस की उम्र घटना के समय 18 वर्ष से अधिक मानी। बोर्ड के आकलन के मुताबिक, घटना के दिन उसकी उम्र 18 वर्ष, सात महीने और 26 दिन थी। इसके बाद मामले को नियमित अदालत में चलाने का रास्ता साफ हुआ। बचाव पक्ष ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन अगस्त में अदालत ने पारस को बालिग मानने के आदेश को बरकरार रखते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मुकदमे का ट्रायल विशेष एससी-एसटी अदालत में आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ। उम्र को लेकर चली इस कानूनी लड़ाई का महत्व इसलिए भी था, क्योंकि यदि आरोपी को किशोर माना जाता तो उसके मामले की सुनवाई और दंड की प्रक्रिया अलग होती। अब अदालत में ट्रायल की शुरुआत के साथ मुख्य सवाल हत्या और अपहरण के आरोपों पर साक्ष्यों की जांच का होगा। किस धारा में कितनी सजा का प्रावधान - हत्या का आरोप : भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103(1)
- महिला का अपहरण कर जबरन विवाह के लिए विवश करने का आरोप : बीएनएस की धारा 87
- सामान्य अपहरण : बीएनएस की धारा 137
- एससी-एसटी एक्ट के प्रावधान ट्रायल में यह होगी आगे की प्रक्रिया
शुक्रवार से शुरू होने वाली प्रक्रिया में अदालत अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज करेगी। गवाही के दौरान अभियोजन पक्ष अपने मामले से जुड़े तथ्य रखेगा और बचाव पक्ष के अधिवक्ता गवाहों से जिरह करेंगे। इस दौरान घटनाक्रम, आरोपों की परिस्थितियों, गवाहों की प्रत्यक्ष जानकारी और दस्तावेजी साक्ष्यों से जुड़े सवाल उठ सकते हैं। यदि किसी गवाह के बयान में पहले दर्ज कराए गए बयान से अंतर सामने आता है तो संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत उसकी जांच होगी। अदालत यह भी देखेगी कि अलग-अलग गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं और उपलब्ध अन्य साक्ष्य उनका समर्थन करते हैं या नहीं। अभियोजन के गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया के अनुसार बचाव पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा।
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