नीट छात्रा के सुसाइड की वजह OCD लाइलाज नहीं:डॉक्टर बोले, बच्चों के व्यवहार में बदलाव को इग्नोर न करें
प्रयागराज के झूंसी में NEET की तैयारी कर रही छात्रा रितु शर्मा की आत्महत्या ने एक बार फिर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों की तरफ ध्यान खींचा है। रितु ने अपने आठ पन्नों के सुसाइड नोट में लिखा था कि वह पिछले करीब चार साल से ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (OCD) से परेशान थी। उसे पढ़ाई के दौरान बार-बार लगता था कि उसने कुछ ठीक से नहीं पढ़ा है। इस शक को दूर करने के लिए वह एक ही लाइन, पैराग्राफ और लेक्चर को बार-बार दोहराती थी। उसे डर था कि ऐसा नहीं किया तो वह परीक्षा में फेल हो जाएगी और उसका भविष्य खराब हो जाएगा। धीरे-धीरे इस परेशानी ने उसकी पढ़ाई और सामान्य जिंदगी को प्रभावित करना शुरू कर दिया। उसे लगने लगा था कि अब वह जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगी। लेकिन क्या OCD ऐसी बीमारी है, जिसमें इंसान अपनी सामान्य जिंदगी नहीं जी सकता? क्या बार-बार आने वाले विचारों और एक ही काम को दोहराने की मजबूरी से बाहर निकलना संभव नहीं है? एक्सपर्टस का कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। OCD एक सामान्य मानसिक समस्या है और सही इलाज मिलने पर इससे काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। जरूरत है कि इसके लक्षणों को समय रहते पहचाना जाए और बिना देर किए विशेषज्ञ की मदद ली जाए। क्या है OCD, दिमाग में क्यों आते हैं बार-बार विचार? मनोचिकित्सक डॉ. राकेश पासवान के मुताबिक, OCD एक तरह की मानसिक बीमारी है। इसमें दो चीजें होती हैं- ऑब्सेशन और कंपल्शन। ऑब्सेशन यानी ऐसे विचार जो व्यक्ति के दिमाग में बार-बार आते हैं और चाहने के बावजूद आसानी से दूर नहीं होते। इन विचारों से होने वाली बेचैनी कम करने के लिए व्यक्ति कुछ काम बार-बार करने लगता है। इसे कंपल्शन कहते हैं। उदाहरण के तौर पर किसी व्यक्ति को बार-बार लगता है कि उसके हाथ गंदे हैं। वह हाथ धो चुका होता है, फिर भी मन में शक बना रहता है। इस शक और बेचैनी को दूर करने के लिए वह बार-बार हाथ धोता है। इसी तरह कुछ लोगों को किसी चीज को बार-बार चेक करने, गिनने या हर काम बिल्कुल तय तरीके से करने की मजबूरी महसूस होती है। कई बार व्यक्ति जानता है कि वह एक ही काम बार-बार कर रहा है और इसकी कोई जरूरत नहीं है, फिर भी मन में उठने वाले डर और बेचैनी के कारण वह खुद को रोक नहीं पाता। पढ़ाई में भी बन सकती है बड़ी परेशानी OCD का असर सिर्फ हाथ धोने या चीजों को बार-बार चेक करने तक सीमित नहीं रहता। पढ़ाई करने वाले बच्चों में भी इसके अलग-अलग रूप देखने को मिल सकते हैं। किसी छात्र को लग सकता है कि उसने कोई चैप्टर ठीक से नहीं पढ़ा। कोई लेक्चर सुनने के बाद भी उसे लगता है कि कुछ समझ में नहीं आया। कई बार वह एक ही पैराग्राफ को बार-बार पढ़ता है या एक ही वीडियो को कई बार देखता है। उसे लगता है कि जब तक पूरी तरह संतुष्टि नहीं मिलेगी, तब तक वह आगे नहीं बढ़ सकता। रितु ने भी अपने सुसाइड नोट में इसी तरह की परेशानी बताई थी। उसने लिखा था कि पढ़ाई के दौरान उसका दिमाग बार-बार कहता था कि उसने ठीक से नहीं पढ़ा है। अगर वह उस हिस्से को दोबारा नहीं दोहराएगी तो सब गलत सीख जाएगी। इसी डर से वह एक ही चीज को कई बार पढ़ती थी। इस वजह से उसका काफी समय निकल जाता था और पढ़ाई आगे नहीं बढ़ पाती थी। उसे लगता था कि वह दूसरे छात्रों से पीछे रह गई है। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास भी कम होता चला गया। एक ही काम में उलझ जाता है व्यक्ति डॉ. पासवान के मुताबिक, OCD से परेशान व्यक्ति कई बार ऐसी चीजों में अपना काफी समय लगा देता है, जिनकी वास्तव में जरूरत नहीं होती। वह एक ही काम को बार-बार करता रहता है। इसके कारण उसके जरूरी और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं। मसलन, पढ़ाई करने वाला छात्र घंटों एक ही टॉपिक को दोहराता रह सकता है। कोई व्यक्ति घर से निकलने के बाद बार-बार दरवाजा या ताला चेक कर सकता है। कुछ लोग चीजों को एक खास क्रम में रखने या हर काम को बिल्कुल परफेक्ट तरीके से करने में उलझे रहते हैं। इसका असर पढ़ाई, कामकाज और परिवार के साथ रिश्तों पर भी पड़ सकता है। व्यक्ति परेशान रहने लगता है। लगातार तनाव और निराशा के कारण उसमें फ्रस्ट्रेशन और डिप्रेशन जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। बीमारी का इलाज संभव, डरने के बजाय डॉक्टर से मिलें डॉ. पासवान का कहना है कि OCD एक सामान्य मानसिक समस्या है और इसका इलाज संभव है। सही समय पर मनोचिकित्सक से सलाह लेकर इलाज शुरू कराया जाए तो व्यक्ति की स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। इसलिए इसे ऐसी बीमारी नहीं समझना चाहिए, जिसके साथ पूरी जिंदगी परेशान रहना पड़े। इसमें सबसे जरूरी बात यह है कि मरीज की परेशानी को समझा जाए। उसे यह कहकर नजरअंदाज न करें कि वह बेवजह सोचता है या जानबूझकर एक ही काम बार-बार करता है। कई बार व्यक्ति खुद भी इस व्यवहार से परेशान होता है, लेकिन चाहकर भी इसे रोक नहीं पाता। परिवार को चाहिए कि वह ऐसे व्यक्ति की बात सुने, उसे समझे और मनोचिकित्सक तक पहुंचने में मदद करे। इंटरनेट की जानकारी को डॉक्टर की सलाह न मानें डॉ. पासवान ने मानसिक बीमारियों को लेकर समाज में जागरूकता की कमी पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि कई बार बच्चे अपनी परेशानी के बारे में जानकारी लेने के लिए इंटरनेट, एआई टूल का सहारा लेते हैं। वहां मिली जानकारी को ही सही मान लेते हैं, जबकि हर व्यक्ति की परेशानी अलग हो सकती है। इंटरनेट पर अधूरी या गलत जानकारी मिलने से भ्रम और बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि कई बार बच्चों के मन में यह बात बैठ जाती है कि उनकी बीमारी बहुत गंभीर है या अब वह कभी ठीक नहीं हो पाएंगे। ऐसी नकारात्मक सोच उनकी परेशानी को और बढ़ा सकती है। कुछ मामलों में व्यक्ति इतना निराश हो जाता है कि उसे अपनी जिंदगी खत्म करने जैसे विचार आने लगते हैं। इसलिए इंटरनेट या AI से मिली जानकारी को बीमारी की पुष्टि या इलाज का विकल्प नहीं मानना चाहिए। किसी भी मानसिक समस्या के लक्षण दिखाई देने पर मनोचिकित्सक से मिलना जरूरी है। बच्चे के व्यवहार में बदलाव दिखे तो माता-पिता रहें सतर्क डॉ. पासवान के मुताबिक, माता-पिता को बच्चों के व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। अगर बच्चा अचानक बहुत परेशान रहने लगे, किसी काम को बार-बार करने लगे, पढ़ाई में जरूरत से ज्यादा समय लगाने लगे या पहले की तरह सामान्य व्यवहार न करे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चे से बात करें और समझने की कोशिश करें कि आखिर उसे क्या परेशानी हो रही है। सिर्फ डांटने या पढ़ाई के लिए दबाव बनाने से समस्या हल नहीं होगी। जरूरत पड़ने पर उसकी काउंसलिंग कराएं और विशेषज्ञ की सलाह लें। रितु की घटना भी यही बताती है कि मानसिक परेशानी को समय रहते समझना कितना जरूरी है। पढ़ाई का दबाव, परीक्षा में अच्छे नंबर लाने की चिंता और भविष्य की फिक्र के बीच अगर कोई बच्चा लगातार मानसिक संघर्ष कर रहा है तो उसकी बात सुनना और मदद करना जरूरी है। OCD के लक्षणों को पहचानना, सही इलाज कराना और परिवार का साथ मिलना किसी की जिंदगी को दोबारा सामान्य बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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