जोमैटो की शर्तों पर बड़ा विवाद

भोजनालय संचालकों और भोजन वितरण मंच जोमैटो के बीच चल रहा विवाद अब और गहरा गया है। राष्ट्रीय भोजनालय संघ ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से मांग की है कि अंतिम निर्णय आने तक जोमैटो को मूल्य समानता और विशिष्ट अनुबंध जैसी शर्तें लागू करने से रोका जाए। संघ का आरोप है कि इन नियमों से भोजनालयों की स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है।

जोमैटो की शर्तों पर बड़ा विवाद

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 15 जुलाई 2026

देशभर के भोजनालय संचालकों और भोजन वितरण मंच जोमैटो के बीच चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। राष्ट्रीय भोजनालय संघ ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग से मांग की है कि अंतिम निर्णय आने तक जोमैटो को मूल्य समानता और विशिष्ट अनुबंध जैसी विवादित शर्तें लागू करने से रोका जाए। संघ का आरोप है कि इन नियमों के कारण भोजनालयों की व्यावसायिक स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंच रहा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होने वाली है, जिस पर पूरे भोजन वितरण क्षेत्र की निगाहें टिकी हुई हैं।


भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग पहुंचा भोजनालय संचालकों और जोमैटो का विवाद

देशभर के हजारों भोजनालयों का प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रीय भोजनालय संघ ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के समक्ष एक नई याचिका दायर कर जोमैटो के खिलाफ अंतरिम राहत की मांग की है। संघ का कहना है कि आयोग जब तक इस पूरे मामले पर अंतिम निर्णय नहीं देता, तब तक कंपनी को उन सभी व्यापारिक शर्तों को लागू करने से रोका जाना चाहिए जिन पर पहले से विवाद चल रहा है। भोजनालय संचालकों का दावा है कि इन नियमों के कारण उनके व्यापार पर लगातार दबाव बढ़ रहा है और स्वतंत्र रूप से व्यवसाय चलाना कठिन होता जा रहा है।संघ का आरोप है कि जोमैटो अपनी मजबूत बाजार स्थिति का लाभ उठाकर ऐसी शर्तें लागू करता है, जिन्हें मानने के लिए भोजनालयों को मजबूर होना पड़ता है। उनका कहना है कि छोटे और मध्यम स्तर के भोजनालय सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि उनके पास बड़े डिजिटल मंचों के विकल्प सीमित हैं। इसी कारण उन्होंने आयोग से तत्काल हस्तक्षेप कर अस्थायी राहत देने की मांग की है।


मूल्य समानता नियम को लेकर भोजनालय संचालकों की सबसे बड़ी आपत्ति

राष्ट्रीय भोजनालय संघ का कहना है कि जोमैटो द्वारा लागू किया गया मूल्य समानता नियम भोजनालयों की व्यावसायिक स्वतंत्रता को सीमित करता है। इस नियम के तहत भोजनालय किसी अन्य मंच या अपनी स्वयं की दुकान पर किसी व्यंजन की कीमत अलग नहीं रख सकते। यदि किसी दूसरे माध्यम पर कीमत कम रखी जाती है तो कंपनी आपत्ति जताती है और विभिन्न प्रकार का दबाव बनाती है।संघ के अनुसार किसी भी व्यापारी को अपनी लागत, ग्राहकों की संख्या और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर मूल्य तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन मूल्य समानता की शर्त इस स्वतंत्रता को सीमित कर देती है। उनका कहना है कि यह नियम स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के विपरीत है और बाजार में निष्पक्ष व्यापार की भावना को प्रभावित करता है।


विशिष्ट अनुबंध की शर्त पर भी उठाए गंभीर सवाल

राष्ट्रीय भोजनालय संघ ने अपनी याचिका में यह भी आरोप लगाया है कि जोमैटो भोजनालयों पर विशिष्ट अनुबंध जैसी शर्तें लागू करता है। इसके तहत भोजनालयों पर यह दबाव बनाया जाता है कि वे केवल एक ही भोजन वितरण मंच के साथ विशेष रूप से जुड़े रहें या अन्य मंचों पर समान सुविधाएं उपलब्ध न कराएं। इससे व्यापारियों की स्वतंत्र व्यावसायिक रणनीति प्रभावित होती है।संघ का कहना है कि किसी भी व्यापारी को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी सुविधा और व्यापारिक हितों के अनुसार अलग-अलग मंचों पर काम कर सके। यदि किसी कंपनी द्वारा ऐसी शर्तें थोपी जाती हैं तो इससे प्रतिस्पर्धा कम होती है और अंततः उपभोक्ताओं को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।


ग्राहकों की जानकारी साझा न करने का भी लगाया आरोप

भोजनालय संचालकों ने जोमैटो पर यह आरोप भी लगाया है कि कंपनी अपने मंच के माध्यम से भोजन मंगाने वाले ग्राहकों की जानकारी भोजनालयों के साथ साझा नहीं करती। इसके कारण भोजनालय अपने ग्राहकों से सीधे संपर्क स्थापित नहीं कर पाते और न ही भविष्य में उन्हें विशेष सेवाएं या प्रस्ताव दे पाते हैं। इससे ग्राहक और भोजनालय के बीच सीधा संबंध विकसित नहीं हो पाता।संघ का कहना है कि ग्राहक संबंध किसी भी व्यवसाय की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। यदि भोजनालय अपने ग्राहकों तक सीधे नहीं पहुंच सकते, तो वे पूरी तरह डिजिटल मंचों पर निर्भर हो जाते हैं। इससे छोटे व्यापारियों की बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता लगातार कमजोर होती जाती है।


प्रतिस्पर्धा आयोग की जांच में क्या सामने आया

राष्ट्रीय भोजनालय संघ ने आयोग को बताया है कि इस मामले की जांच के दौरान महानिदेशक ने अपनी रिपोर्ट में जोमैटो की कुछ व्यापारिक शर्तों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की थीं। जांच रिपोर्ट में कहा गया था कि विशिष्ट अनुबंध और व्यापक मूल्य समानता से जुड़े कुछ प्रावधान प्रतिस्पर्धा कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकते हैं। हालांकि इस संबंध में आयोग का अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है।संघ का कहना है कि जब तक अंतिम आदेश जारी नहीं होता, तब तक कंपनी को उन विवादित नियमों को दोबारा लागू करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। उनका मानना है कि यदि ऐसा होता है तो जांच पूरी होने से पहले ही हजारों भोजनालयों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।


जोमैटो को अपने पुराने बयान पर कायम रहने की सलाह

राष्ट्रीय भोजनालय संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों का कहना है कि जोमैटो ने पहले आयोग और महानिदेशक के समक्ष यह कहा था कि उसने विवादित व्यापारिक तरीकों को समाप्त कर दिया है। इसलिए अब कंपनी को अपने उसी बयान पर कायम रहना चाहिए और जांच पूरी होने तक उन नियमों को दोबारा लागू नहीं करना चाहिए। यदि कंपनी अपने पूर्व आश्वासन से पीछे हटती है तो इससे जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।संघ ने आयोग से यह भी अनुरोध किया है कि मामले की सुनवाई में अनावश्यक विलंब न किया जाए। उनका कहना है कि लंबे समय तक मामला लंबित रहने से छोटे और मध्यम स्तर के भोजनालयों को लगातार आर्थिक नुकसान हो रहा है और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर पड़ रही है।


22 जुलाई की सुनवाई पर टिकी पूरे व्यापार जगत की निगाहें

इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को प्रस्तावित है। संभावना जताई जा रही है कि आयोग सबसे पहले भोजनालय संघ द्वारा मांगी गई अंतरिम राहत पर विचार करेगा। यदि आयोग इस मांग को स्वीकार कर लेता है तो अंतिम फैसला आने तक जोमैटो को विवादित शर्तों को लागू करने से अस्थायी रूप से रोका जा सकता है।व्यापार जगत के जानकारों का मानना है कि यह मामला केवल एक कंपनी और भोजनालयों के बीच का विवाद नहीं है। इसका सीधा संबंध देश में डिजिटल व्यापार, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, छोटे कारोबारियों के अधिकार और उपभोक्ताओं के हितों से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए आयोग का अंतिम निर्णय भविष्य में पूरे भोजन वितरण क्षेत्र के व्यापारिक नियमों और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है।


देश के भोजन वितरण क्षेत्र के लिए क्यों अहम है यह मामला

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का निर्णय केवल जोमैटो या राष्ट्रीय भोजनालय संघ तक सीमित नहीं रहेगा। यदि आयोग भोजनालय संचालकों के पक्ष में फैसला देता है तो भविष्य में अन्य डिजिटल मंचों की व्यापारिक नीतियों की भी समीक्षा हो सकती है। इससे छोटे और मध्यम स्तर के व्यापारियों को अधिक स्वतंत्रता मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।वहीं यदि आयोग कंपनी के पक्ष में निर्णय देता है तो वर्तमान व्यापारिक मॉडल को कानूनी मान्यता मिल सकती है। ऐसे में 22 जुलाई की सुनवाई और उसके बाद आने वाला अंतिम फैसला देश के डिजिटल व्यापार और भोजन वितरण उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।