जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, नेताओं की बढ़ी हलचल

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन फिर तेज हो गया है। अभिजीत दीपके दोबारा धरने पर बैठ गए हैं। अरविंद केजरीवाल घायल छात्रों से मिलने अस्पताल जाएंगे, जबकि मनीष तिवारी, संजय राउत और किसान संगठनों ने भी आंदोलन का समर्थन किया है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, नेताओं की बढ़ी हलचल

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 21 जुलाई 2026

राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र आंदोलन एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल अभिजीत दीपके दोबारा धरने पर बैठ गए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर स्पष्ट और ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। आंदोलन स्थल पर बड़ी संख्या में छात्र, युवा और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद हैं, जिससे माहौल लगातार सक्रिय बना हुआ है।इस बीच आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार के साथ हुई बातचीत के बावजूद कोई अंतिम समाधान सामने नहीं आया है। प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर पहले की तरह अडिग हैं और लगातार शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज करा रहे हैं। आंदोलन को विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का समर्थन भी लगातार मिल रहा है, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

घायल छात्रों से मिलने अस्पताल जाएंगे अरविंद केजरीवाल

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने घोषणा की है कि वह संसद मार्च के दौरान घायल हुए छात्रों से मिलने राम मनोहर लोहिया अस्पताल जाएंगे। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान घायल हुए विद्यार्थियों का हाल जानना आवश्यक है और उनके साथ खड़े रहना लोकतांत्रिक दायित्व है। इससे पहले उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अपनी प्रतिक्रिया भी सार्वजनिक की थी।केजरीवाल ने यह भी बताया कि वह इस विषय पर पत्रकार वार्ता करेंगे, जिसमें आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और छात्रों की स्थिति को लेकर अपना पक्ष रखेंगे। आम आदमी पार्टी का कहना है कि छात्रों की आवाज को दबाने के बजाय उनकी समस्याओं का समाधान निकाला जाना चाहिए। पार्टी ने शांतिपूर्ण संवाद के माध्यम से विवाद समाप्त करने की आवश्यकता पर भी बल दिया है।

मनीष तिवारी ने छात्रों के संघर्ष का किया समर्थन

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थन में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने युवाओं के संघर्ष को लोकतंत्र की शक्ति बताते हुए कहा कि देश का भविष्य युवाओं की भागीदारी और उनके विचारों से ही मजबूत होता है। उन्होंने एक प्रसिद्ध पंक्ति साझा करते हुए आंदोलनरत विद्यार्थियों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया।कांग्रेस का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। पार्टी ने सरकार से अपील की है कि छात्रों की मांगों को गंभीरता से सुना जाए और किसी भी प्रकार के टकराव से बचते हुए समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जाए। उनका मानना है कि संवाद ही किसी भी विवाद का सबसे प्रभावी माध्यम है।

संजय राउत ने पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल

शिवसेना (उद्धव गुट) के सांसद संजय राउत ने दिल्ली में छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध करने वाले विद्यार्थियों के साथ कठोर व्यवहार उचित नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार सरकार को दमन के बजाय बातचीत और सहमति का रास्ता अपनाना चाहिए।राउत ने यह भी कहा कि बीते दिन की घटनाओं को लोकतंत्र के लिए चिंताजनक माना जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों की आवाज को दबाने का प्रयास लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। साथ ही उन्होंने निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग भी की है।

किसानों ने भी आंदोलन को दिया समर्थन

छात्र आंदोलन को अब विभिन्न किसान संगठनों का भी समर्थन मिलने लगा है। किसान नेताओं का कहना है कि युवाओं से जुड़े मुद्दों को केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि उनकी समस्याओं का समाधान संवाद और सहमति से निकाला जाना चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा और रोजगार जैसे विषय पूरे समाज से जुड़े हुए हैं।किसान संगठनों ने स्पष्ट किया है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वे लोकतांत्रिक तरीके से छात्रों के समर्थन में आगे भी आवाज उठाएंगे। इससे आंदोलन का दायरा और व्यापक होता दिखाई दे रहा है। विभिन्न सामाजिक संगठनों की बढ़ती भागीदारी के कारण सरकार पर समाधान निकालने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है।

सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत पर बनी हुई है नजर

इससे पहले आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के बीच दो चरणों में बातचीत हुई थी। हालांकि अब तक किसी अंतिम सहमति की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। प्रदर्शनकारी अपनी मांगों के समाधान तक आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं।राजनीतिक दलों की लगातार बढ़ती प्रतिक्रियाओं और सामाजिक संगठनों के समर्थन के बीच अब सभी की नजर सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच होने वाली अगली बातचीत पर टिकी हुई है। आने वाले समय में इस आंदोलन की दिशा और सरकार की रणनीति दोनों महत्वपूर्ण रहने वाली हैं।