क्या इस बार पास होगा परिसीमन बिल

संसद के वर्षाकालीन सत्र में एक बार फिर परिसीमन विधेयक को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पिछली बार आवश्यक बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका था, लेकिन अब सत्ता पक्ष का दावा है कि बदले हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच इस बार स्थिति पहले से अधिक अनुकूल है। वहीं विपक्ष ने विधेयक के प्रारूप को देखे बिना किसी भी प्रकार का समर्थन देने से इनकार कर दिया है।

क्या इस बार पास होगा परिसीमन बिल

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 17 जुलाई 2026

संसद के वर्षाकालीन सत्र की शुरुआत के साथ ही देश की राजनीति एक बार फिर परिसीमन विधेयक को लेकर गर्मा गई है। पिछली बार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण यह विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका था, लेकिन अब बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच केंद्र सरकार को इस बार सफलता की उम्मीद दिखाई दे रही है। पिछले कुछ महीनों में कई सांसदों के पाला बदलने, कुछ क्षेत्रीय दलों के नरम रुख और सत्ता पक्ष की बढ़ी हुई संख्या ने पूरे राजनीतिक गणित को बदल दिया है। यही कारण है कि इस बार संसद के वर्षाकालीन सत्र का सबसे चर्चित विषय परिसीमन विधेयक बन गया है।दूसरी ओर विपक्षी दल अब भी इस मुद्दे पर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। विपक्ष का कहना है कि जब तक सरकार संशोधित विधेयक का पूरा प्रारूप सार्वजनिक नहीं करती, तब तक समर्थन या विरोध का अंतिम निर्णय लेना उचित नहीं होगा। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने सर्वदलीय चर्चा की मांग की है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस विधेयक का भविष्य केवल संख्या बल पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों की अंतिम रणनीति पर भी निर्भर करेगा।


क्या है परिसीमन विधेयक और क्यों मचा है इतना बड़ा राजनीतिक विवाद

परिसीमन विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश में लोकसभा की सीटों का नए सिरे से निर्धारण करना है। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार भविष्य में जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों की संख्या और सीमाओं में बदलाव किया जाएगा। इसके साथ ही महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण देने की संवैधानिक व्यवस्था को भी परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है। सरकार का कहना है कि बदलती जनसंख्या और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने के लिए यह कदम आवश्यक है।हालांकि दक्षिण भारत के कई राज्यों ने इस प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि उन्होंने वर्षों तक जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफलतापूर्वक लागू किया है। यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण किया गया, तो इन राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व घट सकता है। इसी आशंका के कारण यह विधेयक केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संघीय व्यवस्था और राज्यों के अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।


बजट सत्र में क्यों नहीं मिल सका था आवश्यक बहुमत

वर्ष दो हजार छब्बीस के बजट सत्र के दौरान जब यह विधेयक मतदान के लिए आया था, तब सरकार आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने में असफल रही थी। संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक समर्थन नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो पाया और विपक्ष ने इसे अपनी बड़ी राजनीतिक जीत बताया था। उस समय कई विपक्षी दल पूरी तरह एकजुट दिखाई दिए थे और उन्होंने दक्षिणी राज्यों के हितों का हवाला देते हुए विधेयक का विरोध किया था।विधेयक के गिरने के बाद केंद्र सरकार ने विभिन्न राजनीतिक दलों से लगातार संवाद बनाए रखा। सरकार ने यह संकेत भी दिए कि यदि राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए आवश्यक हुआ तो विधेयक में कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों पर विचार किया जा सकता है। इसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही हैं।


तीन महीनों में बदल गया संसद का पूरा राजनीतिक समीकरण

पिछले तीन महीनों के दौरान संसद के भीतर राजनीतिक परिस्थितियों में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। कई सांसदों ने अपने दल बदले, कुछ विपक्षी दलों में टूट हुई और कुछ क्षेत्रीय दलों ने सत्ता पक्ष के साथ संवाद बढ़ाया। इन घटनाओं के कारण सत्ता पक्ष की संसदीय ताकत पहले की तुलना में काफी मजबूत मानी जा रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कुछ प्रमुख क्षेत्रीय दल सरकार के पक्ष में मतदान करते हैं या मतदान से दूरी बनाए रखते हैं, तो सत्ता पक्ष के लिए आवश्यक बहुमत जुटाना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो सकता है। हालांकि अंतिम स्थिति मतदान के दिन ही स्पष्ट होगी क्योंकि संवैधानिक संशोधन के लिए प्रत्येक मत का विशेष महत्व होता है।


क्षेत्रीय दलों की भूमिका होगी सबसे निर्णायक

इस बार परिसीमन विधेयक के भविष्य का सबसे बड़ा आधार क्षेत्रीय दलों का रुख माना जा रहा है। दक्षिण भारत के कुछ प्रभावशाली दलों ने साफ किया है कि यदि सरकार उनकी चिंताओं का समाधान करती है, तभी वे समर्थन पर विचार करेंगे। इसी कारण केंद्र सरकार लगातार विभिन्न दलों के नेताओं से संवाद स्थापित करने में जुटी हुई है।राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि सरकार सभी राज्यों में सीटों की संतुलित वृद्धि या प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने जैसी व्यवस्था प्रस्तुत करती है, तो कुछ क्षेत्रीय दल समर्थन दे सकते हैं। यही कारण है कि सत्ता पक्ष इस बार व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है।


दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने का प्रयास

दक्षिण भारत के कई राज्यों का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता मिलने के बाद यदि सीटों का निर्धारण केवल वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो उनके सांसदों की संख्या कम हो सकती है। इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव भी घट सकता है। इसी वजह से ये राज्य लगातार समान प्रतिनिधित्व और संतुलित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार इस विषय पर विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रही है। चर्चा है कि सभी राज्यों में सीटों की समान अनुपात में वृद्धि या प्रतिनिधित्व सुरक्षित रखने जैसी व्यवस्था प्रस्तावित की जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो दक्षिणी राज्यों की कई प्रमुख आपत्तियां दूर हो सकती हैं।


विपक्ष ने संशोधित विधेयक देखने के बाद ही फैसला करने की कही बात

विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार पहले संशोधित विधेयक का पूरा प्रारूप सार्वजनिक करे। उनका तर्क है कि केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर इतना महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णय नहीं लिया जा सकता। विपक्ष चाहता है कि संसद में विस्तृत चर्चा हो और सभी राज्यों की राय को गंभीरता से सुना जाए।विपक्ष का उद्देश्य यह भी माना जा रहा है कि सत्ता पक्ष आवश्यक संवैधानिक बहुमत हासिल न कर सके। यदि सरकार दो-तिहाई समर्थन जुटाने में असफल रहती है, तो यह विधेयक एक बार फिर पारित नहीं हो पाएगा। इसलिए विपक्ष इस मुद्दे पर पूरी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है।


वर्षाकालीन सत्र में बढ़ेगी राजनीतिक हलचल

उन्नीस जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक, बीस जुलाई से शुरू होने वाला संसद का वर्षाकालीन सत्र और उसके बाद लगातार होने वाली संसदीय बैठकों के कारण आने वाले सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने सहयोगी दलों को एकजुट रखने के प्रयास में जुटे हुए हैं। इस दौरान कई दौर की राजनीतिक बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं की भी संभावना है। कि इस बार का संसदीय सत्र केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है। परिसीमन विधेयक पर होने वाली चर्चा का असर भविष्य के चुनावी समीकरणों पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है।


महिला आरक्षण से भी जुड़ा है यह पूरा मुद्दा

परिसीमन विधेयक केवल लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसे महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था लागू करने की प्रक्रिया से भी जोड़ा गया है। सरकार का कहना है कि परिसीमन के बाद ही महिलाओं को आरक्षण देने की संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह लागू की जा सकेगी।यही कारण है कि इस विधेयक का महत्व और बढ़ जाता है। यदि यह पारित होता है तो भविष्य में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को भी नई दिशा मिल सकती है। दूसरी ओर यदि विधेयक फिर अटक जाता है, तो महिला आरक्षण लागू होने की प्रक्रिया पर भी असर पड़ सकता है।


पूरे देश की नजर संसद के फैसले पर

परिसीमन विधेयक को लेकर पूरे देश की निगाहें अब संसद की कार्यवाही पर टिकी हुई हैं। यदि सत्ता पक्ष आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहता है तो यह देश की संसदीय व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव का मार्ग खोल सकता है। वहीं यदि विपक्ष सरकार को आवश्यक बहुमत से रोकने में सफल रहता है, तो यह विधेयक एक बार फिर अधर में लटक जाएगा।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों का अंतिम रुख, सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन और संसद में होने वाली बहस यह तय करेगी कि परिसीमन विधेयक कानून का रूप ले पाएगा या नहीं। यही कारण है कि वर्षाकालीन सत्र को देश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक माना जा रहा है।