प्राचीन-ज्ञान को आज की चुनौतियों के समाधान से जोड़ना जरूरी:वाराणसी में विश्व संगोष्ठी में वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते शक्ति संतुलन पर भी चर्चा
अदाणी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अदाणी ने कहा कि प्राचीन ज्ञान का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसे आज की समस्याओं के समाधान में उपयोग किया जाए। मानवीय पीड़ा, असमानता और संघर्ष जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने के साथ उसे व्यवहार में लाना जरूरी है। वह सोमवार को वाराणसी में आयोजित ‘आधुनिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन ज्ञान’ विषयक विश्व संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रही थीं। डॉ. अदाणी ने कहा, “प्राचीन ज्ञान केवल इसलिए मूल्यवान नहीं हो जाता क्योंकि वह पुराना है। उसका वास्तविक महत्व तब है, जब हम आज की समस्याओं के समाधान में उसकी उपयोगिता को समझते हैं।” उन्होंने कहा कि ज्ञान दुनिया को बदलने की शक्ति देता है, जबकि विवेक यह तय करता है कि बदलाव दुनिया को बेहतर बनाने के लिए हो। बुद्ध, अरस्तू और कन्फ्यूशियस के विचारों का किया उल्लेख
डॉ. अदाणी ने अपने संबोधन में यूनानी दार्शनिक अरस्तू, भगवान बुद्ध और चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस की शिक्षाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन विचारों में मानव कल्याण, नैतिक आचरण, जिम्मेदारी और सामाजिक सद्भाव जैसे मूल्य प्रमुख हैं। इन्हें भारत की प्राचीन अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, से जोड़ते हुए उन्होंने सभ्यतागत ज्ञान के उपयोग पर जोर दिया। समुदायों के विकास के क्षेत्र में तीन दशकों के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रगति का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे लोगों के जीवन में कितना बदलाव आया। सेवा का अर्थ केवल मदद करना नहीं, बल्कि लोगों की जरूरतों को समझना, उनकी बात सुनना और उन्हें अपना भविष्य बेहतर बनाने के लिए सक्षम बनाना है। डॉ. अदाणी ने बताया कि वर्ष 1996 में स्थापित अदाणी फाउंडेशन देश के 22 राज्यों के 7,000 गांवों में काम कर रहा है। फाउंडेशन अब तक 1.3 करोड़ लोगों के जीवन को प्रभावित कर चुका है। भारत नॉलेज ग्राफ के लिए एक करोड़ डॉलर की प्रतिबद्धता
उन्होंने भारत नॉलेज ग्राफ का भी जिक्र किया। इसके लिए अदाणी समूह ने एक करोड़ अमेरिकी डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई है। इस पहल का उद्देश्य भारत की प्राचीन सभ्यता और ज्ञान परंपरा से जुड़ी जानकारी को विभिन्न विषयों के शोधकर्ताओं तक पहुंचाना है। इसके तहत 14 शोधकर्ताओं को डॉक्टरेट की पढ़ाई में भी सहयोग दिया जा रहा है। प्रो. जेफ्री सैक्स बोले- वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका बढ़ेगी
संगोष्ठी में संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क के अध्यक्ष और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक प्रोफेसर जेफ्री डी. सैक्स ने ‘द रिटर्न ऑफ ए मल्टीपोलर वर्ल्ड’ विषय पर संबोधन दिया। उन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था में बदलते शक्ति संतुलन और भारत की बढ़ती भूमिका पर चर्चा की। प्रो. सैक्स के मुताबिक, वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी वर्ष 2000 में 5.2 प्रतिशत थी, जो 2026 में बढ़कर 8.5 प्रतिशत हो गई है। उनके अनुमान के अनुसार, यह हिस्सेदारी 2050 तक 13.1 प्रतिशत और 2100 तक 15.1 प्रतिशत हो सकती है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक शक्ति का केंद्र एशिया और अफ्रीका की ओर बढ़ेगा। उनके अनुमान के मुताबिक, 2100 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिका, कनाडा और यूरोप की संयुक्त हिस्सेदारी घटकर 13.7 प्रतिशत रह सकती है। प्रो. सैक्स ने भारत में सतत विकास, बुनियादी ढांचे के विस्तार और आर्थिक विकास में अदाणी समूह और अदाणी फाउंडेशन के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने परिवार के नाम से संचालित कारोबार की सामाजिक जिम्मेदारी पर भी विचार रखे। उनके अनुसार, ऐसे व्यवसायों के साथ परिवार की विरासत भी जुड़ी होती है, इसलिए उन्हें समाज के प्रति अपने योगदान पर भी ध्यान देना चाहिए। एआई से प्राचीन ग्रंथों को समझने में मिलेगी मदद
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने कहा कि तकनीक भारत की सभ्यता और ज्ञान परंपरा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में मदद कर सकती है। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि इसके माध्यम से प्राचीन ग्रंथों को समझने और उनमें छिपे ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाने में सहायता मिल सकती है। उद्घाटन सत्र की शुरुआत कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. निरुपम बाजपेयी के संबोधन से हुई। उन्होंने संगोष्ठी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं दीं और विचारों तथा आध्यात्मिक परंपराओं के मिलन स्थल के रूप में वाराणसी की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख किया। ग्रीस से शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी श्रृंखला
वाराणसी में आयोजित यह संगोष्ठी एक अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला का हिस्सा है। इसकी शुरुआत ग्रीस से हुई थी। वर्ष 2022 में एथेंस और 2023 में स्टागिरा में बैठकें हुई थीं। इसके बाद 2024 में चीन के कुफू और बीजिंग में भी इस श्रृंखला के तहत आयोजन किए गए।
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