प्रयागराज शिल्प मेले में बिरहा और राजस्थानी नृत्य:दर्शकों ने कालबेलिया और चकरी नृत्य का आनंद लिया, राम-सीता के प्रसंगों पर बिरहा गायन

Oct 25, 2026 - 20:45
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प्रयागराज शिल्प मेले में बिरहा और राजस्थानी नृत्य:दर्शकों ने कालबेलिया और चकरी नृत्य का आनंद लिया, राम-सीता के प्रसंगों पर बिरहा गायन
प्रयागराज उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में दीपावली शिल्प मेले के चौथे दिन रविवार की शाम लोकगीतों और लोकनृत्यों के नाम रही। कलाकारों ने बिरहा के जरिए भगवान राम और माता सीता से जुड़े प्रसंग सुनाए। वहीं, राजस्थान से आए कलाकारों ने चकरी, कालबेलिया और चरी लोकनृत्य की प्रस्तुति देकर दर्शकों का मन मोह लिया। लोकगीतों और नृत्यों का आनंद लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम में पहुंचे। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रयागराज के लोक कलाकार उदय चन्द्र परदेशी, केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा और सलाहकार कल्पना सहाय ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इसके बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत शिवराज विश्वकर्मा और उनके दल के बिरहा गायन से हुई। कलाकारों ने भगवान राम के लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने और माता सीता की मनोदशा से जुड़े प्रसंगों को गीतों के माध्यम से पेश किया। ‘हजूर जीत के लौटे लंका, माई सीता के मन में शंका’ जैसे बोलों ने दर्शकों का ध्यान खींचा। बिरहा में कथा, संवाद और भावनाओं के मेल ने प्रस्तुति को खास बना दिया। कलाकारों ने अपनी गायकी से रामायण के प्रसंगों को जीवंत कर दिया। इसके बाद राजस्थान के बारां से आए एसबी गुजरावत और उनके दल ने चकरी, कालबेलिया और चरी लोकनृत्य प्रस्तुत किए। पारंपरिक वेशभूषा और लयबद्ध कदमों के साथ कलाकारों ने राजस्थान की लोकसंस्कृति की झलक दिखाई। उनकी प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियां बजाकर उत्साह बढ़ाया। कार्यक्रम में प्रयागराज की लोकगायिका नर्गिस परवीन ने ‘राम जी से पूछे’, ‘हे गंगा मैया’, ‘मिर्जापुर कैला गुलजार’, ‘रेलिया बैरन’ और ‘सइयां मिले लड़कइयां’ जैसे गीत प्रस्तुत किए। वहीं, रागिनी चन्द्रा ने ‘गंगा-जमुना के निर्मल धार’, ‘बीत जाला बरखा बहार बलम बिना’, ‘हरे रामा रिमझिम बरसे पनिया’ और ‘हमको खर्च दिए जाना बलम जब जाना विदेशवा ना’ जैसे गीत गाकर खूब वाहवाही बटोरी। कार्यक्रम के अंत में केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा ने सभी कलाकारों को अंगवस्त्र और पौधा भेंटकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. आकांक्षा पाल ने किया।

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