राम वन गमन पथ यात्रा, भाग-6; हम्पी से रामेश्वरम:वो पहाड़... जहां बाली से छिपे थे सुग्रीव, वो बाग जहां सीता की खबर मिलने पर वानरों ने मनाया जश्न
राम वन गमन पथ यात्रा के छठे भाग में हम कर्नाटक के हम्पी से रामेश्वरम की ओर बढ़े। किष्किंधा क्षेत्र में पंपा सरोवर है, जहां राम और हनुमान की पहली मुलाकात की मान्यता है। पास ही ऋष्यमूक पर्वत है, जहां बाली के डर से सुग्रीव छिपे थे। इसी जगह की चिंतामणि गुफा से श्रीराम के बाली का वध करने की कथा जुड़ी है। आगे आंध्र प्रदेश के लेपाक्षी में वह स्थान है, जहां रावण से युद्ध के बाद जटायु घायल होकर गिरे थे। रामेश्वरम की ओर बढ़ते समय श्रीराम के गणेश और नवग्रह पूजा करने की मान्यताएं भी मिलती हैं। इस सफर के 10 प्रमुख पड़ावों से जुड़ी कथाएं जानिए… पंपा सरोवर: जहां राम और हनुमान पहली बार मिले, सीता की खोज में यहीं से मिला सुग्रीव का साथ
कर्नाटक के किष्किंधा क्षेत्र में पंपा सरोवर है। धार्मिक मान्यता है कि माता सीता की खोज करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण यहां पहुंचे थे। वाल्मीकि रामायण के किष्किंधाकांड में भी पंपा सरोवर और इसके आसपास के क्षेत्र का वर्णन मिलता है। इसी क्षेत्र में श्रीराम की हनुमानजी से पहली मुलाकात हुई थी। हनुमान उस समय सुग्रीव के साथ रहते थे। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण से भेंट की और उन्हें सुग्रीव के पास ले गए। इसके बाद सुग्रीव से श्रीराम की मित्रता हुई। यही मित्रता आगे चलकर सीता की खोज और रावण के विरुद्ध युद्ध में महत्वपूर्ण बनी। अंजनाद्रि पर्वत: तुंगभद्रा किनारे हनुमानजी की जन्मस्थली, वनवास में इसी क्षेत्र में आए थे राम-लक्ष्मण
किष्किंधा में तुंगभद्रा नदी के किनारे अंजनाद्रि पर्वत है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यही भगवान हनुमान की जन्मस्थली है। माता अंजना से जुड़ा होने के कारण इस पर्वत को अंजनाद्रि कहा जाता है। राम वन गमन पथ में इस पर्वत का विशेष महत्व है, क्योंकि वनवास के दौरान माता सीता की खोज करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण किष्किंधा क्षेत्र में पहुंचे थे। इसी क्षेत्र में हनुमानजी से उनकी मुलाकात और सुग्रीव से मित्रता की कथा जुड़ी है। इस कारण अंजनाद्रि पर्वत को हनुमान जन्मस्थली के साथ राम वन गमन पथ का भी महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। ऋष्यमूक पर्वत: बाली के डर से मंत्रियों के साथ यहां छिपे थे सुग्रीव, यहीं राम से हुई पहली मुलाकात
किष्किंधा के पास ऋष्यमूक पर्वत है। रामायण की कथा के अनुसार, किष्किंधा के राजा बाली के डर से उनके भाई सुग्रीव इसी पर्वत पर रहते थे। उनके साथ हनुमान, जाम्बवंत और दूसरे सहयोगी भी थे। सुग्रीव को डर था कि बाली उन्हें मरवा सकते हैं। इसलिए उन्होंने इस पर्वत को अपना आश्रय बनाया था। इसी दौरान श्रीराम और लक्ष्मण माता सीता को खोजते हुए यहां पहुंचे। हनुमानजी ने दोनों भाइयों से मुलाकात की और उन्हें सुग्रीव के पास ले गए। ऋष्यमूक पर्वत पर श्रीराम और सुग्रीव की पहली भेंट हुई। इसके बाद दोनों के बीच मित्रता हुई और सीता की खोज में एक-दूसरे की सहायता करने का निर्णय लिया गया। माल्यवंत मंदिर: राम-लक्ष्मण ने यहां वर्षा और शरद ऋतु बिताई, सीता की खोज और वानर सेना जुटाने पर विचार हुआ
किष्किंधा के पास माल्यवंत पर्वत पर प्राचीन मंदिर है। इस स्थान का संबंध भगवान राम और लक्ष्मण के वनवास से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दोनों भाइयों ने यहां वर्षा और शरद ऋतु का समय बिताया था। वाल्मीकि रामायण में भी माल्यवंत पर्वत का उल्लेख मिलता है। श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता के बाद माता सीता की खोज आगे बढ़ाने की योजना बनी। इस दौरान वानर सेना को एकत्र करने और अलग-अलग दिशाओं में खोज शुरू करने पर विचार हुआ। इसी कारण माल्यवंत पर्वत को श्रीराम के निवास और सीता की खोज की तैयारी से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। चिंतामणि गुफा: जहां से श्रीराम ने बाली पर चलाया था बाण, सुग्रीव के साथ हुई थी मंत्रणा
किष्किंधा क्षेत्र में पंपा सरोवर के आसपास चिंतामणि गुफा है। इस गुफा का संबंध श्रीराम, सुग्रीव और बाली की कथा से माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, श्रीराम ने यहां सुग्रीव के साथ बातचीत की थी। इसी स्थान से उन्होंने बाली पर बाण चलाया था। रामायण की कथा के अनुसार, बाली और सुग्रीव के बीच शत्रुता थी। सुग्रीव ने श्रीराम से सहायता मांगी थी। इसके बाद श्रीराम ने बाली का वध कर सुग्रीव की सहायता की। चिंतामणि गुफा को इसी प्रसंग से जोड़ा जाता है। इस क्षेत्र की पहाड़ियों और गुफाओं में आज भी राम-सुग्रीव की मित्रता तथा बाली-वध से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। बाली गुफा: जहां बाली और दुंदुभि राक्षस में हुआ था युद्ध, किष्किंधा के जंगलों में है यह स्थान
किष्किंधा के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्र में बाली गुफा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी गुफा में किष्किंधा नरेश बाली और दुंदुभि नामक राक्षस के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। बाली अपनी असाधारण शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। रामायण में बाली और दुंदुभि के युद्ध का वर्णन मिलता है। इस प्रसंग में बाली के पराक्रम और राक्षस के साथ हुए संघर्ष की कथा है। किष्किंधा क्षेत्र की इस गुफा को उसी युद्ध की स्मृति से जोड़ा जाता है। बाली की कथा का संबंध सुग्रीव से उनकी शत्रुता और आगे श्रीराम द्वारा बाली का वध किए जाने के प्रसंग से भी जुड़ता है। मधुवन: सीता का पता मिलने पर यहां पहुंचे थे हनुमान, वानरों ने फल खाकर मनाया था जश्न
किष्किंधा राज्य में मधुवन नाम का प्रसिद्ध उद्यान था। यह सुग्रीव के अधीन था और वानरों के विश्राम, फल खाने तथा मदिरापान से जुड़ा स्थान माना जाता था। रामायण की कथा के अनुसार, जब हनुमानजी माता सीता का पता लगाकर लौटे, तो उनके साथ आए वानर मधुवन पहुंचे थे। सीता की खोज सफल होने से सभी बेहद खुश थे। उन्होंने यहां फलों का आनंद लिया और उत्सव मनाया। इस तरह मधुवन उस खुशी का साक्षी माना जाता है, जब वानरों को पता चला कि सीता जीवित हैं और लंका में हैं। इसके बाद श्रीराम को सीता का समाचार देने का रास्ता साफ हुआ। लेपाक्षी: जहां रावण से लड़कर घायल हुए थे जटायु, राम ने उन्हें मोक्ष दिया था
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर क्षेत्र में लेपाक्षी है। इस स्थान से माता सीता के हरण और पक्षीराज जटायु की कथा जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें पुष्पक विमान में लंका ले जा रहा था, तब जटायु ने उसे रोकने का प्रयास किया। जटायु और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। रावण ने जटायु को घायल कर दिया और वे इसी स्थान पर आकर गिरे। बाद में माता सीता की खोज करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण यहां पहुंचे। जटायु ने उन्हें सीताहरण की जानकारी दी। इसके बाद जटायु ने प्राण त्याग दिए और श्रीराम ने उन्हें मोक्ष प्रदान किया। इसी घटना के कारण लेपाक्षी को राम वन गमन पथ का महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान माना जाता है। उप्पुर विनायक मंदिर: रामेश्वरम जाने से पहले श्रीराम और वानर सेना ने की थी गणेश पूजा
राम वन गमन पथ पर दक्षिण भारत में समुद्र तट की ओर बढ़ते समय उप्पुर विनायक मंदिर का विशेष महत्व माना जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सीता की खोज और लंका की ओर यात्रा के दौरान भगवान श्रीराम यहां पहुंचे थे। उनके साथ वानर सेना भी थी। समुद्र पार करने और आगे के अभियान से पहले श्रीराम तथा वानर सेना ने यहां भगवान गणेश की आराधना की थी। इस परंपरा के कारण उप्पुर विनायक मंदिर को रामेश्वरम यात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव माना जाता है। नवग्रह मंदिर: रामसेतु निर्माण से पहले श्रीराम ने की थी ग्रहों की पूजा, समुद्र तट के तीर्थ मार्ग से जुड़ा है स्थान
रामेश्वरम की ओर जाने वाले दक्षिण भारत के प्राचीन तीर्थ मार्ग पर नवग्रह मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, श्रीराम ने लंका जाने और रामसेतु निर्माण से पहले इस क्षेत्र में पूजा-अनुष्ठान किए थे। इन अनुष्ठानों में नवग्रह पूजा का भी महत्व माना जाता है। इसी कारण इस क्षेत्र को श्रीराम के पदचिह्नों और उनकी पूजा परंपराओं से जोड़ा जाता है। राम वन गमन पथ में यह स्थान उस पड़ाव की स्मृति माना जाता है, जब श्रीराम समुद्र पार कर लंका पहुंचने की तैयारी कर रहे थे।
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