आज संतान की लंबी उम्र के लिए व्रत रखेंगी महिलाएं:जानिए पूजन का शुभ मुहूर्त, तारों को अर्घ्य देकर खोलेंगी व्रत
संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ आज महिलाएं अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी। माताएं अपनी संतान की खुशहाली के लिए निर्जला व्रत रखकर अहोई माता की पूजा-अर्चना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की कृपा से संतान को सुख, सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है। महिलाएं दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को विधि-विधान से पूजा करेंगी और आसमान में तारे निकलने पर उन्हें अर्घ्य देकर संतान की लंबी उम्र की कामना करेंगी। पूजन का शुभ मुहूर्त बिलेश्वरनाथ मंदिर के पुजारी हरीशचंद्र जोशी ने बताया कि अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा। अष्टमी तिथि दोपहर 2:51 बजे से शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1:10 बजे तक रहेगी। पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक है। इस दौरान महिलाएं अहोई माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर व्रत कथा सुनेंगी। शाम को तारे निकलने पर उन्हें अर्घ्य देकर संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करेंगी। क्यों मनाते हैं अहोई अष्टमी? अहोई अष्टमी का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन अहोई माता की पूजा करने से संतान पर उनका आशीर्वाद बना रहता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। पहले यह व्रत मुख्य रूप से पुत्रों की लंबी उम्र के लिए रखा जाता था, लेकिन अब माताएं बेटों के साथ बेटियों की खुशहाली के लिए भी यह व्रत रखती हैं। अहोई अष्टमी की कथा पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार की पत्नी कार्तिक मास में घर की मरम्मत के लिए मिट्टी खोदने जंगल गई थी। वहां मिट्टी खोदते समय अनजाने में उससे एक साही के बच्चे को चोट लग गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद साहूकार के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। मान्यता है कि साही के बच्चे की मृत्यु के कारण उसके अपने बच्चों पर संकट आया। दुखी मां ने अहोई माता की पूजा-अर्चना और प्रार्थना की। उसकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर माता ने उसे आशीर्वाद दिया। तभी से संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई। अहोई अष्टमी का महत्व अहोई अष्टमी का व्रत ममता, संतान के लिए प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य, शिक्षा, तरक्की और सुखी जीवन की कामना करती हैं। व्रत में अहोई माता की पूजा, कथा सुन्ना और तारों को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं। ऐसे करें अहोई माता की पूजा - सुबह स्नान कर महिलाएं व्रत का संकल्प लेंगी।
- घर की दीवार पर अहोई माता और उनके बच्चों की आकृति बनाकर या तस्वीर स्थापित कर पूजा करेंगी।
- शाम को पूजा स्थल पर दीपक जलाकर रोली, अक्षत, फूल और मिठाई अर्पित करेंगी।
- अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनकर संतान की खुशहाली की कामना करेंगी।
- शाम को तारे निकलने पर उन्हें जल अर्पित कर व्रत खोलेंगी।
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