जिस्म पर लिखा राम-राम, सांसों में बसी भक्ति:सांस्कृतिक संसद में सुनाई आस्था और संघर्ष की कहानी, अध्यक्ष बोले- अब लोग रामनाम लिखवाने से बच रहे

Nov 05, 2026 - 06:55
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जिस्म पर लिखा राम-राम, सांसों में बसी भक्ति:सांस्कृतिक संसद में सुनाई आस्था और संघर्ष की कहानी, अध्यक्ष बोले- अब लोग रामनाम लिखवाने से बच रहे
माथे से लेकर पैरों तक राम-राम। कपड़ों पर राम, शॉल पर राम, टोपी पर राम। घर की दीवारों और दरवाजों पर भी राम नाम की छाप। यह सिर्फ आस्था नहीं, सदियों पुराने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ खड़ा हुआ एक ऐसा विश्वास है, जो आज भी सांसों में बसा है। यह कहानी है छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज की। एक ऐसा समाज, जिसने मंदिर के दरवाजे बंद होने पर अपने शरीर को ही राम का मंदिर बना लिया। जिन लोगों को कभी मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया, उन्होंने अपने रोम-रोम में राम को बसा लिया। उनके लिए राम किसी मूर्ति या मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि निराकार हैं और हर जीव में मौजूद हैं। काशी में चल रहे सांस्कृतिक संसद में पहुंचे रामनामी समाज के अध्यक्ष कौशल रामनामी ने दैनिक भास्कर से बातचीत में इस परंपरा, इसके संघर्ष और बदलते समय में इसे बचाए रखने की कोशिशों को साझा किया… एक समय समाज के लोगों को मंदिर में प्रवेश से रोका गया कौशल रामनामी ने कहा- रामनामी समाज की परंपरा की जड़ें करीब 1860 के दौर में हुए जातिगत भेदभाव से जुड़ी हैं। उस समय समाज के लोगों को मंदिर में प्रवेश से रोका गया। इस अपमान के जवाब में उन्होंने अपने शरीर पर राम नाम गुदवाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह उनकी पहचान और आध्यात्मिक जीवन का हिस्सा बन गया। कौशल रामनामी बताते हैं कि उनके समाज में राम नाम को कलियुग में भगवान का नाम-स्वरूप माना जाता है। उनके अनुसार, राम नाम की यह परंपरा करीब 200 साल से चली आ रही है और वह इसकी पांचवीं पीढ़ी से जुड़े हैं। रामनामी समाज के लोग एक-दूसरे का अभिवादन राम-राम कहकर करते हैं। किसी को पुकारना हो, तब भी राम-राम ही कहते हैं। उनके लिए यह केवल संबोधन नहीं, बल्कि हर व्यक्ति में राम को देखने का भाव है। जन्म के छठे दिन से शरीर पर लिखवाते थे राम नाम पहले रामनामी समाज में बच्चे के जन्म के छठे दिन उसके शरीर पर राम नाम गुदवाने की परंपरा थी। समय के साथ इसमें बदलाव आया है। अब शरीर पर राम नाम लिखवाना पूरी तरह व्यक्ति की इच्छा और उसकी भक्ति पर निर्भर है। कौशल रामनामी बताते हैं कि आज समाज के कुछ लोग ही शरीर पर राम नाम गुदवाते हैं। नई पीढ़ी में भी कुछ लोग इस परंपरा को अपना रहे हैं, लेकिन पहले जैसी व्यापकता नहीं रही। रामनामी समाज छत्तीसगढ़ के रायगढ़, जांजगीर-चांपा, बिलासपुर और बलौदा बाजार सहित कई जिलों में रहता है। समाज की आबादी करीब पांच हजार बताई जाती है। राम नाम के साथ सादगी और संयम का जीवन रामनामी समाज में शरीर पर राम नाम गुदवाना केवल बाहरी पहचान नहीं है। इसके साथ जीवन में सादगी और संयम को भी महत्व दिया जाता है। समाज के लोग तंबाकू, बीड़ी और गांजा जैसे नशों से दूर रहते हैं। खानपान में भी शुद्धता का ध्यान रखते हैं। समाज के अध्यक्ष कौशल रामनामी बताते हैं कि राम नाम धारण करने वाले लोग अपनी दिनचर्या और आचरण में भी भक्ति को बनाए रखने का प्रयास करते हैं। मौत पर मातम नहीं, जीवन की तरह ही चलता है घर रामनामी समाज की सबसे अनूठी परंपराओं में से एक मृत्यु से जुड़ी है। आमतौर पर किसी की मौत के बाद घर में शोक का माहौल होता है। कई हिंदू परिवारों में सूतक माना जाता है और शुभ कार्य रोक दिए जाते हैं। लेकिन रामनामी समाज में मृत्यु को लेकर अलग दृष्टिकोण है। यहां किसी की मृत्यु होने पर घर के रोजमर्रा के काम नहीं रुकते। जिस कमरे में परिवार के लोग बैठते हैं, उसी कमरे में शव भी रखा जाता है। घर में भोजन बनता है और परिवार के लोग सामान्य रूप से भोजन करते हैं। मृत्यु को जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया माना जाता है। शादी में पंडित नहीं, रामचरितमानस बनता है साक्षी रामनामी समाज में विवाह की परंपरा भी उनकी आस्था से जुड़ी है। शादी के लिए पंडित को बुलाने की जरूरत नहीं होती। वर-वधू पक्ष के लोग जैतखांब के सामने खड़े होकर विवाह की रस्में निभाते हैं। जैतखांब समाज का प्रतीक है। यह चबूतरे पर बना लकड़ी या सीमेंट का स्तंभ होता है, जिसे सफेद रंग से पुता जाता है। इसके ऊपर सफेद ध्वजा लगी रहती है। विवाह में रामचरितमानस को साक्षी मानकर रस्में पूरी की जाती हैं।

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