कार्डियोलॉजी सम्मेलन: युवा डॉक्टर्स के लिए लगी इको वर्कशॉप:दिल के वाल्व, खून के थक्के और जन्मजात दोष पहचानने का मिला प्रशिक्षण
दिल की बीमारी का समय पर पता चलने से मरीज को सही इलाज मिल सकता है और उसकी जान बचाई जा सकती है। इसके लिए इकोकार्डियोग्राफी जांच काफी अहम है। रविवार को होटल होलीडे इन में कार्डियोलॉजी आगरा लाइव 6.0 के दूसरे दिन आयोजित इको वर्कशॉप में मेडिकल छात्रों और युवा डॉक्टरों को इस जांच का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। आगरा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी सोसाइटी की ओर से आयोजित इस दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन की वर्कशॉप में डॉक्टरों को मशीन के जरिए दिल की जांच करना सिखाया गया। इसमें दिल के वाल्व की खराबी, मांसपेशियों की ताकत, दिल में खून का थक्का जमने, ट्यूमर और दिल के आसपास पानी जमा होने जैसी समस्याओं की पहचान करने का प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही दिल की पंप करने की क्षमता मापने और फेफड़ों तक खून पहुंचाने वाली नसों में थक्का फंसने की स्थिति का पता लगाने की जानकारी भी दी गई। सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ. सुवीर गुप्ता ने कहा कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों से डॉक्टरों को बीमारी की सही पहचान करने और मरीज को समय पर इलाज देने में मदद मिलेगी। इससे कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। दिल की जांच के क्षेत्र में 40 वर्षों से काम कर रहे डॉ. शरद पालीवाल ने कहा कि हृदय रोगों का पता लगाने में इकोकार्डियोग्राफी की अहम भूमिका है। इससे बच्चे के दिल में जन्म से मौजूद छेद, दिल के वाल्व की खराबी, मांसपेशियों को हुए नुकसान और दिल के आसपास पानी जमा होने का पता लगाया जा सकता है। जांच से यह तय करने में भी मदद मिलती है कि मरीज को दवाओं से ठीक किया जा सकता है या ऑपरेशन की जरूरत है। डॉ. राजकुमार गुप्ता, डॉ. अनुराग जैन और डॉ. जय बाबू ने कहा कि अस्पतालों के आपातकालीन विभागों और आईसीयू में इको मशीन के साथ इसे चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त स्टाफ भी होना चाहिए। इसी उद्देश्य से युवा डॉक्टरों को मशीन चलाने और जांच के नतीजों को समझने का अभ्यास कराया गया। वर्कशॉप में आगरा मेडिकल कॉलेज, फिरोजाबाद मेडिकल कॉलेज, एफएच मेडिकल कॉलेज, केडी मेडिकल कॉलेज और मथुरा सहित आसपास के मेडिकल कॉलेजों के एमडी के छात्र और डॉक्टर शामिल हुए। इस दौरान डॉ. जितेंद्र श्रीवास्तव, एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. टीपी सिंह, डॉ. सिद्धार्थ अग्रवाल और डॉ. चंदन कुमार मौजूद रहे। देवेंद्र ढल ने संचालन किया। सुरेश सिंह ने व्यवस्था संभाली। भूपेंद्र भदौरिया और बीएल राजपूत का विशेष सहयोग रहा।
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