सांसद सतीश पर धमकी देने के आरोप की याचिका खारिज:अलीगढ़ में निचली अदालत का आदेश बरकरार, मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाने और अपहरण कर हत्या की धमकी देने का था आरोप
अलीगढ़ के सांसद सतीश कुमार गौतम पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाने और अपहरण कर हत्या की धमकी देने के आरोप से जुड़े मामले में शिकायतकर्ता केशव देव गौतम को अदालत से झटका लगा है। विशेष न्यायालय (एमपी/एमएलए), अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पॉक्सो एक्ट कोर्ट संख्या-1 अनिल कुमार ने उनकी आपराधिक निगरानी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मजिस्ट्रेट न्यायालय के 17 जुलाई 2026 के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें परिवाद खारिज किया गया था। अदालत ने शिकायत और बयानों में विरोधाभास के साथ सांसद और घर पहुंचने वाले लोगों के बीच संबंध साबित करने वाले स्वतंत्र साक्ष्य की कमी को अहम माना। सांसद की ओर से अधिवक्ता योगेंद्र शर्मा लल्ला बाबू ने पैरोकारी की। उन्होंने ही आदेश की जानकारी दी।
केशव देव गौतम ने आरोप लगाया था कि सांसद के खिलाफ उनका एक मुकदमा विचाराधीन है, जिसे वापस लेने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा है। शिकायत के मुताबिक, 3 अक्टूबर 2023 की रात दो व्यक्ति काली गाड़ी से उनके घर पहुंचे और सांसद की ओर से आने की बात कहकर उन्हें बातचीत के लिए चलने को कहा। तबीयत खराब होने का हवाला देकर उन्होंने जाने से इनकार कर दिया। आरोप है कि 4 अक्टूबर की रात दोनों फिर पहुंचे और फोन पर सांसद से बात कराई। शिकायतकर्ता के अनुसार, सांसद ने मीडिया में उनके खिलाफ इंटरव्यू देने का हवाला देते हुए गाड़ी में बैठकर बात करने को कहा, वरना अपहरण कर ऐसी जगह मरवाने की धमकी दी, जहां नामोनिशान न मिले।
शिकायतकर्ता ने रंजिश की वजह बताते हुए कहा था कि उन्होंने शहर विधायक मुक्ता संजीव राजा के साथ सार्वजनिक मंच पर सांसद के कथित असंवैधानिक व्यवहार से जुड़े वीडियो की निंदा की थी। साथ ही, जनता से किए वादे पूरे नहीं करने को लेकर सांसद के खिलाफ मुकदमा विचाराधीन होने की बात भी कही थी।
बयानों में अलग-अलग वजह, पहचान पर भी सवाल
मामले में अदालत ने पाया कि परिवाद में घर पहुंचने वाले व्यक्तियों की पहचान स्पष्ट नहीं थी, जबकि धारा 200 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत दर्ज बयान में दीपक यादव व अन्य का नाम लिया गया। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि शिकायतकर्ता को उनके नाम कैसे पता चले। परिवाद में धमकी की वजह मीडिया में इंटरव्यू देना बताई गई, जबकि बयान में चुनाव लड़ने से रोकने के लिए धमकी देने की बात सामने आई। अदालत ने इस विरोधाभास को महत्वपूर्ण माना।
शिकायतकर्ता ने सीसीटीवी फुटेज और भ्रष्टाचार विरोधी सेना से जुड़े दस्तावेज दाखिल किए थे, लेकिन ऐसा कोई दस्तावेजी साक्ष्य या स्वतंत्र गवाह पेश नहीं हुआ, जिससे साबित हो कि घर पहुंचे लोग सांसद के कहने पर आए थे या उनके अधिकृत प्रतिनिधि थे।
निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार
शुरुआत में केशव देव गौतम ने धारा 156(3) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत प्रार्थना पत्र देकर पुलिस कार्रवाई की मांग की थी। मजिस्ट्रेट ने इसे परिवाद के रूप में दर्ज किया। साक्ष्यों और बयानों पर विचार के बाद विशेष न्यायालय/एमपी-एमएलए, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट संख्या-2 ने 17 जुलाई 2026 को धारा 203 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत परिवाद खारिज कर दिया।
इसे चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता ने निगरानी दाखिल की। उनकी ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत ने अभिलेखीय साक्ष्यों और बयानों का सही मूल्यांकन नहीं किया। यह आपत्ति भी उठाई गई कि सांसद ने खुद जवाब दाखिल करने के बजाय निजी सचिव उमेश उपाध्याय के माध्यम से वकालतनामा और अधिवक्ता का पर्चा दाखिल कराया।
विशेष न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के मैसर्स पैप्सी फूड लिमिटेड बनाम विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में तलब करना गंभीर प्रक्रिया है। मजिस्ट्रेट को उपलब्ध सामग्री पर न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और आपराधिक कानून को महज औपचारिकता के तौर पर आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
अदालत को निचली अदालत के आदेश में कोई विधिक अनियमितता नहीं मिली। आदेश में यह आशंका भी जताई गई कि शिकायतकर्ता का उद्देश्य विपक्षी पर दबाव बनाना हो सकता है। इसके साथ ही आपराधिक निगरानी संख्या 262/2026 खारिज कर दी गई और परिवाद खारिज करने का पुराना आदेश बरकरार रखा गया।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)