"मैं हाफिज सईद का दर्दनाक अंत अपनी आंखों से देखना चाहता हूं" – लश्कर के पूर्व आतंकी का खुलासा
दि राइजिंग न्यूज। नई दिल्ली। 9 मई 2025 । भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच आतंकवाद पर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के पूर्व आतंकी नूर दाहरी ने दुनिया के सामने हाफिज सईद और पाकिस्तान में पनप रहे आतंकी नेटवर्क का काला सच उजागर किया है।
आतंक की गलियों से निकलकर इंसानियत की राह पर लौटा 'नूर दाहरी'
दि राइजिंग न्यूज। नई दिल्ली। 9 मई 2025 ।
भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच आतंकवाद पर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के पूर्व आतंकी नूर दाहरी ने दुनिया के सामने हाफिज सईद और पाकिस्तान में पनप रहे आतंकी नेटवर्क का काला सच उजागर किया है।
नूर ने बताया कि कैसे हाफिज सईद ने इस्लाम के नाम पर हजारों युवाओं को मौत और बर्बादी के रास्ते पर भेजा। नूर का यह कबूलनामा न सिर्फ आतंक की क्रूरता को उजागर करता है, बल्कि यह दिखाता है कि आतंकी संगठन किस तरह युवाओं को गुमराह कर उनका जीवन तबाह करते हैं।
'मैं डॉक्टर बनना चाहता था, लेकिन बन गया आतंकी'
ब्रिटेन स्थित थिंक टैंक Islamic Theology of Counter Terrorism (ITCT) के संस्थापक और पूर्व आतंकी नूर दाहरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी आत्मकथा के कई हिस्से साझा किए। उसने लिखा:
“मेरी मां चाहती थीं कि मैं डॉक्टर बनूं, लेकिन मैंने यूनिवर्सिटी छोड़ दी और हाफिज सईद की बातों में आकर लश्कर-ए-तैयबा में शामिल हो गया।”
नूर ने बताया कि उसे हाफिज सईद की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी और वह खुद देखा करता था कि यह आतंकी सरगना मॉडिफाइड टोयोटा विगो में शानो-शौकत से यात्रा करता था, जबकि हजारों युवाओं को अफगानिस्तान और कश्मीर में मौत के मुंह में धकेलता था।
500 की भर्ती, 50 भी नहीं लौटते थे
नूर दाहरी ने बताया कि हर गुरुवार को पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों से 500 नए भर्ती आतंकियों को अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में स्थित मआसकर तैयबा नामक ट्रेनिंग कैंप में भेजा जाता था:
"उनमें से अधिकतर कभी लौटकर नहीं आते थे। वहां जाकर मुझे संगठन का असली चेहरा दिखा – धोखा, झूठ और सिर्फ मौत।"
जब नूर ने लश्कर छोड़ने का फैसला किया, तो कमांडरों ने उसे “कायर” कहकर तिरस्कृत किया। लेकिन उसने साहस दिखाया और आतंक के इस जाल से खुद को मुक्त कर लिया।
'लश्कर के पास हैं 10 लाख ट्रेंड आतंकी'
नूर के अनुसार, लश्कर-ए-तैयबा एक पूरी सेना की तरह काम करता है – 10 लाख प्रशिक्षित आतंकी, जो पाकिस्तान की सत्ता के इशारे पर राजनीतिक लक्ष्यों को साधने के लिए काम करते हैं। उसने कहा:
“लश्कर एक 'राख की जंग' लड़ रहा है जिसमें सिर्फ मासूम मारे जा रहे हैं। हाफिज सईद को उसका अंजाम भुगतना होगा।”
'आज मैं उससे बेहतर स्थिति में हूं जहां वह मुझे ले जाना चाहता था'
अब एक काउंटर-टेररिज़्म थिंक टैंक के प्रमुख के तौर पर काम कर रहे नूर दाहरी का कहना है कि वह अब खुद को एक मिशन पर मानते हैं:
"अल्लाह ने मुझे इस्लाम के नाम पर हो रहे इस धोखे को उजागर करने के लिए चुना है। आज मैं हाफिज सईद से कहीं बेहतर स्थिति में हूं।"
भारत के लिए क्यों अहम है ये कबूलनामा?
यह खुलासा भारत के लिए उस समय आया है जब पहलगाम हमले और पाकिस्तान से हो रही सीजफायर उल्लंघन की घटनाओं ने एक बार फिर पाकिस्तान की दोहरे चेहरे वाली नीतियों को उजागर कर दिया है।
नूर दाहरी जैसे पूर्व आतंकी की गवाही यह दिखाती है कि पाकिस्तान आतंकवाद को सिर्फ पनाह ही नहीं देता, बल्कि उसे राज्य की रणनीतिक नीति के रूप में उपयोग करता है।
यह सिर्फ एक कबूलनामा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है
नूर की कहानी सिर्फ एक व्यक्तिगत पश्चाताप नहीं है – यह आतंकवाद की भीतर से सड़ी हुई हकीकत का दस्तावेज़ है। यह हमें याद दिलाती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन वह धर्म के नाम पर सबसे ज़्यादा खून बहाता है।